हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ हिन्दुत्व
जितना जाना चाहिये। यहाँ विस्तारके साथ इस विषयकी
मीमांसा नहीं की जा सकती, पर संक्षेपमें कुछ साधारण बातें कहे
देते हैं, जिनका विस्तारके साथ विवेचन पीछे किसी अवसरपर
किया जायगा। हिन्दू बौद्धमतका बहिष्कार करनेके लिये जो
तैयार हो गये, उसका कारण क्या केवल दार्शनिक मतभेद ही
था ? केवल दार्शनिक मतभेदसे ही ऐसा हुआ हो, यह सम्भव
नहीं है; क्योंकि दार्शनिक मतभेद तो सदासे चले आते हैं और
दोनों प्रकारके मतोंका साथ-साथ ही प्रचार भी होता चला
आया है। तो क्या बौद्धोंके विहारोंमें पीछेसे जो अनाचार और
व्यभिचार होने लगा, उससे ऐसा हुआ ? यह भी एकमात्र कारण
नहीं हो सकता; क्योंकि यदि अनेक विहारोंमें उन व्यभिचारियोंका
जमावड़ा हुआ था, जो दूसरोंके परिश्रमसे उपार्जित वस्तुओंपर
जीवन निर्वाह करते और परायी सम्पत्ति अनाचारोंमें फूँक
डालते, तो उसके साथ-साथ उन महान् तपस्वी और ज्ञानी
अर्हतों और भिक्षुओंकी परम्परा भी तो अभीतक जारी थी। और
व्यभिचार केवल बौद्ध-विहारोंमें ही तो नहीं था। ऐसे-ऐसे दोषों-
का इतना भयानक परिणाम कि भारतवर्षसे बौद्धोंकी सत्ता ही उठ
गयी, कदापि न होता; यदि बौद्धोंके प्रचारका राजनीतिक परि-
णाम राष्ट्रकी जीवनीशक्ति, और तो क्या, हमारी जातिके अस्ति-
त्वके लिये इतना विघातक न होता। यह जैसा शोकपर्यव-
सायी नाटक हुआ है, उसके लिये शाक्यसिंहके जीवनकी ही
एक घटना जितनी उत्तमताके साथ विष्कंभकका काम देगी,