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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

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१६ हिन्दुत्व
विरोध हुआ, इन दो बातोंसे हमारा हिन्दू नाम फिर एक बार
आगे आया और इतने जोरसे आगे आया कि प्यारा “भरतखंड”
नाम भी उसके पीछे पड़ गया।
( ३ )
“हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान”
यों तो बौद्ध-धर्मका उदय होनेके पूर्व भी हिन्दुस्थानका अन्य
देशोंसे सम्बन्ध था और हिन्दुओंके सार्वभौम उद्योगका इतना
विस्तार हो गया था कि हमारे स्वदेश-भक्त कवि और धर्मशास्त्र-
वक्ता अधिकारके साथ यह कह सकते थे कि—
एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवाः ॥ ( मनु )
तथापि यहां जिस बातका हम विचार कर रहे हैं, उसके लिये
बौद्ध-धर्मके उदयके पश्चात् ही भारतके सार्वराष्ट्रीय जीवनका
विचार कर्तव्य है। कारण, इसी समयके लगभग राजनीतिक
उद्योगके विस्तारकी सीमा हो चुकी थी और देशके अन्दर कोई
ऐसा काम बाकी न था जो न किया गया हो; इसलिये
स्वभावतः ही इस उद्योगका स्रोत देशके बाहर भी प्रवाहित होने
लगा और भारतके बाहरके देशोंसे व्यवहार भी खूब बढ़ने
लगा। इसके पूर्व इतने जोरके साथ ऐसा प्रवाह नहीं हुआ था,