हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान १६
उतनी किसी कविकी कोई कल्पना नहीं दे सकती। शाक्यसिंह
जिस समय अपने बौद्ध-सम्प्रदायकी नींव दे रहे थे, उसो समय
उन्होंने यह खबर सुन ली कि शाक्योंके उस छोटेसे प्रजातन्त्र-
राजकी क्या गति हुई। वे अपनी जातिके भूषणभूत नरवीरोंको
अपने भिक्खू-सम्प्रदायकी दीक्षा दे चुके थे और शाक्य-प्रजा-
तन्त्र वीरोंसे विहीन होकर दूसरोंके अधीन हो गया और यह
घटना शाक्यसिंहके जीवनकालमें ही हुई ! उन्हें जब यह खबर
मालूम हुई, तब उसका उन 'बुद्ध' पर कोई असर नहीं हुआ !
शताब्दियां उलट गयीं; शाक्योंके राजा सब राजाओं के राजा-
लोकजित हो गये। छोटे शाक्यराजकी चतुःसीमा विस्तृत
हो गयी, वह भारतवर्ष की चतुःसीमा हो गयी; और कपिलवस्तु-
के छोटे प्रजातन्त्रकी जो दुर्गति हुई, वही भारतवर्षकी भी हुई-
भारतवर्ष आक्रमणकारी योद्धाओंका शिकार हुआ-शाक्य तो
अपने ही जातिभाइयोंके शिकार हुए, पर भारतवर्ष लीचियों
और हूणोंका शिकार हुआ। यदि बुद्ध-भगवानको इसकी खबर
मिले-किसी तरहसे उनके पास यह खबर पहुँचायी जा सके,
तो इससे भी वे वैसे ही उदासीन रहेंगे जैसे कपिलवस्तुकी
खबर सुनकर उनके चित्तपर कोई असर नहीं हुआ। पर सब
हिन्दू राजनीतिक दासत्वके जहरका प्याला शांतिके साथ अपने
होठों से कैसे लगा सकते हैं? जिन असभ्य और बर्बर जातियों-
की क्रूर हिंसावृत्तिका उन्हें सामना करना पड़ा, वे अहिंसा और
आध्यात्मिक बन्धु-भावकी मधुर बातोंसे शांत होनेवाले नहीं थे।