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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 167 में से

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हिन्दू नामकी उत्पत्ति १५
विदेशियोंने हमारे पालनेका नाम भुलाकर नये नाम “भारत” का
प्रयोग किया हो । आज भी सारा संसार हमें “हिन्दू” और हमारे
देशको “हिन्दुस्थान” ही जानता है, मानो हमारे वैदिक पूर्वजों-
द्वारा स्वीकृत नामकी रक्षा कर रहा है ।
पर नामका तो दस्तूर ही यह है कि जिस किसीका नाम हो
वह उसकी इच्छापर नहीं बल्कि दूसरोंकी इच्छापर निर्भर करता
है । हम अपना चाहे जो नाम रखना पसन्द करें, नाम माना जायगा
वही जो और लोग पसन्द करेंगे । नामका प्रयोजन भी तो यही
है । हम अपने आपको बिना नाम और रूपके जानते ही हैं। पर
जब हमारा सम्बन्ध दूसरोंके साथ होता है, स्नेह-सम्बन्ध हो
या विरोध-सम्बन्ध, तब नामकी जरूरत होती है। इसमें दोका
सम्बन्ध होता है। यदि संसार किसी आचार्यका नाम “अष्टावक्र”
और किसी मसखरेका नाम “मुल्ला दोप्याजा” रखना ही पसन्द
करता है, तो नामवालेकी चाहे जो इच्छा हो, संसारको तो वही
नाम स्मरण रहेगा जो उसने पसन्द किया है । इस तरह संसार
हमारा जो नाम रखता है, वह यदि हमारी रुचिके विरुद्ध न हो
तो ऐसे नामका अन्य सब नामोंको दबा देना बहुत ही अधिक
संभवनीय है । परन्तु यदि संसार ऐसा नाम रखता है, जिससे
हमारा पूर्व गौरव और प्रेम सूचित होता है तो ऐसा नाम
निश्चय ही हमारे अन्य नामोंको भुलाकर बना रह सकता है । यह
बात और इसके साथ वह अवस्था जिसमें बाहरी संसारके साथ
पहले-पहल हमारा सम्बन्ध हुआ और पीछे उसके साथ घोर