हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
१०४ हिन्दुत्व
फिर भी वे सब हिन्दू हैं। उसी प्रकार स्वदेशको स्वदेश मानने-
वाले बोहरा या खोजा या कोई ईसाई जिनमें हिन्दुत्वके ये तीनों
लक्षण इस हदतक मौजूद हों वे हिन्दू क्यों न माने जायँ ?
ऐसे लोग सचमुच हिन्दू माने जा सकते थे। परंतु हिन्दुत्व-
के एक विशिष्ट लक्षणकी कसौटीपर कसनेसे उनका हिन्दू कहा-
नेका अधिकार नष्ट हो जाता है। वह विशिष्ट लक्षण हिन्दू-
संस्कृतिके अन्दर आ जा सकता है। पर वह इतना महत्वपूर्ण है
कि हिन्दू-संस्कृतिकी अन्य बातोंमें वह लुप्त नहीं किया जा
सकता। इसीलिये उसका विशेष विवेचन करना आवश्यक है।
इस विवेचनमें हिन्दुत्वके धार्मिक स्वरूपकी ओर ध्यान देनेकी
आवश्यकता होगी। याहांतक हमने जो कुछ प्रतिपादन किया
उसमें इस बातका विचार नहीं किया, इसलिये नहीं कि ऐसा
करनेमें हम किसी प्रकार सकुचते थे, बल्कि इसलिये कि
हिंदुत्वके लक्षणोंका विवेचन अधिक सांगोपांग और परिणाम-
कारक करनेके लिये हमने धार्मिक पहलूके विचारके लिये एक
पृथक् अध्याय ही रख छोड़ा है। सब पहलुओंसे इस विषयका
विचार करनेकी सामग्री याहांतक पूरे तौरपर जुट गयी है और अब
“हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंके बीच क्या अन्तर है, यह
निश्चित करनेका काम अधिक सुलभ होनेवाला है।
( ६ )
हिन्दुत्वकी परिभाषा
“हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” ये दोनों शब्द “हिन्दू” शब्दसे
निकले हुए हैं, इसलिये उनका अर्थ समग्र हिन्दू-जातिसे सम्बन्ध
रखनेवाला होता है। हिन्दू-धर्मकी जिस किसी परिभाषामें
हमारी जातिका कोई भी अंग छूट जाय अथवा उसे अपने
धार्मिक संस्कारोंको छिपा रखना पड़े वह परिभाषा किसी काम-
की न होगी। हिन्दू-धर्म वह धर्म है जो सब हिन्दुओंका सामान्य
धर्म है। यह सामान्य हिन्दू-धर्म क्या है यह जाननेके लिये हमें
यह जानना होगा कि हम हिन्दू कहते किसको हैं—हिन्दू-शब्दकी
परिभाषा क्या है। परंतु इस बातको भूलकर कि हिन्दू कौन है
यह जाननेका मुक्त मनसे प्रयत्न किये बिना हिन्दू-धर्मकी
परिभाषा नहीं हो सकती, बहुतसे लोग हिन्दू-धर्मकी ही पहले
व्याख्या करने लग जाते हैं और हिन्दू-धर्मके कोई ऐसे लक्षण नहीं
पाते जिनमें अतिव्याप्तिका दोष न हो और जिनमें सब हिन्दू-
समाजोंका समावेश हो जाय। परिणाम यह होता है कि
उन्हें ऐसे सर्व सामान्य लक्षण नहीं मिलते और लाचार होकर वे
इस नतीजेपर पहुंचते हैं कि अमुक जातियां हिन्दू ही नहीं हैं!
“हिन्दू ही नहीं हैं” इसलिये नहीं कि जिन लक्षणोंकी कसौटी-
[१०६] हिन्दुत्व
पर इन्हें कसनेका प्रयत्न किया जाता है उनमें कोई अव्याप्ति दोष
हो, बल्कि इसलिये कि ये जातियां उन बातोंको धर्म ही नहीं
मानतीं जिनपर ये लोग अपने मनसे ही हिन्दू-धर्मकी छाप लगाना
चाहते हैं ! “हिन्दू कौन है ?” इस प्रश्नका उत्तर देनेकी यह
सचमुच ही उलटी रीति है और इससे सिख, जैन, देवसमाजी,
यहांतक कि देशाभिमानी और प्रगतिशील आर्य-समाजियोंको
भी मनःक्षोभ होता है ।
हिन्दू कौन है ? —वही जो हिन्दू-धर्म मानता है। बहुत ठीक।
पर हिन्दू-धर्म क्या है ? वे तत्व और नियम जिन्हें हिन्दू
मानते हैं ! परन्तु इस तरह इस प्रश्नको हल करना तो एक चक्कर-
के पीछे चक्कर लगाना है। इससे कोई निर्णय नहीं हो सकता ।
इस तरह भटके हुए बहुतसे लोग लौटकर आके कहते हैं, “हिन्दू
तो कोई है ही नहीं” ! जिस अंगरेजने ‘हिन्दूइज्म’ शब्द गढ़ा
वैसी ही बुद्धि रखनेवाला कोई अंगरेज यदि “इंग्लिशिज्म” शब्द
गढ़े और अंगरेज-जातिके अन्दर उस “इंग्लिशिज्म (आंग्ल-धर्मके)”
शब्दाधारपर अंगरेजोंके सर्वसामान्य धर्मसिद्धान्तोंकी जांच करने
निकले और त्रिमूर्तिके तत्वसे लेकर उपयुक्तताके तत्वज्ञानतक
और ज्यू लोगोंसे जैकोबिन लोगोंतक अनेक मतों और पंथोंको
देख घबरा जाय और निराश होकर यह कहे कि, “न ! अंगरेज
तो कोई इस पृथ्वी-तलपर है ही नहीं” ! ऐसा कहनेवाला
अंगरेज जितना हास्यास्पद होगा उतना ही हास्यास्पद वह
हिन्दू भी है जो कहता है कि, “हिन्दू तो कोई मनुष्य-समाज ही
हिन्दुत्वकी परिभाषा १०७
नहीं है !” इस चक्करमें भटकनेवालोंकी कैसी फजीहत होती
है और “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंका भेद ध्यानमें
न रखनेसे कैसी गड़बड़ मचती है यह जिस किसीको देखना हो
वह प्रकाशन-पराक्रम करनेवाली नटेशन कंपनीकी “हिन्दुइजमके
लक्षण” नामक अंगरेजी पुस्तक एक बार देख ले।
हिन्दू-धर्मका अर्थ है हिन्दुओंका धर्म; और हिन्दू-शब्द
“सिन्धु” से निकला हुआ होनेके कारण उसका मूल अर्थ उन
लोंगोसे है जो सिन्धु नदीसे सिन्धु-सागर पर्यन्तके देशमें बसते हैं
और इसलिये हिन्दू-धर्मका उसी धर्म या उन्हीं धर्मों से मतलब है
जो इस देश और इस जातिके सहजात धर्म हैं। यदि इन भिन्न-
भिन्न धर्मसिद्धान्तों और आचारोंके आधारभूत कोई समन्वय
हम न देख सकें तो हमें यह कहना होगा कि हिन्दू-धर्म कोई
सामान्य धर्म नहीं है, बल्कि यह कई ऐसे धर्म-सम्प्रदायोंका
समूह है जो संप्रदाय परस्परसे भिन्न अथवा परस्परके विरोधी
भी हैं। पर सामान्य हिन्दू-धर्मकी पहचान करनेमें असमर्थ
होकर कोई किसी भी हालतमें यह नहीं कह सकता कि हिन्दू तो
कोई राष्ट्र या मानव समाज ही नहीं है, न कोई किसी हिन्दू-संप्र-
दायको यह कहकर चोट पहुंचा सकता है कि अमुक संप्रदाय
हिन्दू ही नहीं है।
इस प्रबन्धकी मर्यादा हमें विस्तारसे हिन्दू-धर्मके लक्षणोंकी
चर्चा करनेका अवसर नहीं देती। हम ऊपर यह कह चुके हैं कि
“हिन्दू-धर्म क्या है ?” इसकी जांच तो तब आरम्भ हो सकती
१०८ . हिन्दुत्व
है जब हिन्दुत्वके लक्षण निश्चित करके यह सम्यक् रूपसे जाना
जाय कि “हिन्दू कौन है?” और यहां हमें हिन्दुत्वके उन लक्षणों-
को देखना है जिनसे हम यह जान सकें कि हिन्दू कौन है; अर्थात्
हिन्दू-धर्मके लक्षणोंकी चर्चा इस प्रबंधकी मर्यादाके बाहरका
विषय है। यहां उसका उतने ही अंशमें विचार करना होगा जितने
अंशमें प्रस्तुत प्रतिपाद्य विषयके साथ उसका संबंध है। हिन्दू-धर्म
किसी एक धर्म-सम्प्रदायका नाम नहीं प्रत्युत उन सब संप्र-
दायोंका समष्टिरूप नाम है जो संप्रदाय अपनेको हिन्दू मानते
हैं। परन्तु साधारणतः “हिन्दू-धर्म” इन शब्दोंका प्रयोग उस
धर्म-संप्रदायके लिये किया जाता है जिसे हिन्दुओंमेंसे अधि-
कांश लोग मानते हैं। यह स्वाभाविक है कि किसी धर्म-संप्रदाय,
देश या जातिका नाम उस धर्म, देश या जातिके किसी ऐसे
विशिष्ट स्वरूपपर रखा जाय जिस स्वरूपको अधिकांश लोग
मानते हैं। नित्यके व्यवहारमें इससे बड़ा सुभीता भी होता
है। परन्तु इस प्रकारसे कोई नाम सुभीतेका होनेपर भी यदि
उससे भ्रम फैलता हो, हानि होती हो तो केवल सुभीतेके ख्याल-
से अपनी न्यायान्याय-विवेक-बुद्धिको अन्ध न होने देना चाहिये।
हिन्दुओंमें अधिकांश लोग “श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म” अथवा
“सनातनधर्म” नामसे जो पुकारा जाता है उस धर्मके मानने-
वाले हैं। इस धर्मको यदि “वैदिकधर्म” कहें तो इसमें भी कोई
आपत्ति नहीं हो सकती। परन्तु, इस बहुजन-समाजके अतिरिक्त
ऐसे भी कुछ हिन्दू हैं जो कुछ पुराणोंको सर्वथा या अंशतः नहीं
हिन्दुत्वकी परिभाषा १०६
मानते, कुछ ऐसे हैं जो कुछ स्मृतियोंको नहीं मानते और कुछ
ऐसे हैं जो श्रुतियोंतकको नहीं मानते । परन्तु यदि आप बहुजन-
समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानते और उसका नाम "कट्टर
हिन्दू-धर्म" रखते हैं तो जो अन्य सद्भिन्न धर्म-संप्रदाय हैं उन्हें
इस तरह अपना हिन्दुत्वके दायरेसे अन्यायपूर्वक बाहर किया
जाना और बहुजन-समाजका हिन्दुत्वका इजारा ले लेना कभी
अच्छा नहीं लगता और यह ठीक भी है। अल्प-संख्यक संप्रदायों-
का भी कुछ नाम होना चाहिये । पर जब आप कट्टर सनातन-
धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानेंगे तो इसका यह मतलब होगा कि
जो कट्टर सनातनधर्म नहीं है वह हिन्दू-धर्म नहीं है ! और इसके
बाद फिर यह भी हुआ कि सनातनधर्मसे भिन्न संप्रदायवाले
हिन्दू ही नहीं हैं ! परन्तु यह निर्णय उन लोगोंको भी असह्य
मालूम होता है जो इस वादके पूर्व पक्षको मानकर उस निग्रह-
कोटिमें पहुंचते हैं जहां वे ठहरना नहीं चाहते, पर जहांसे निक-
लना भी नहीं जानते ! इस तरहसे हमारे लाखों सिख, जैन,
लिंगायत और आर्यसमाजी भाई, यदि उनसे कहा जाय कि
अब आप लोग हिन्दू नहीं रहे तो इसे अपना अपमान समझेंगे
और इससे उन्हें बड़ा क्रोध होगा । परन्तु इसके साथ ही इन्हीं
लोगोंमें कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि हिन्दू होना-
अपने बापदादोंकी जातिमें बने रहना यही है कि जिन अन्ध-
विश्वासकी बातोंको हम नहीं मानते उन्हें मानें अथवा अपनी
जातिसे अलग हो जायँ ।
११० हिन्दुत्व
इस प्रकार वैमनस्य उत्पन्न होनेका कारण अधिकांशमे यही
है कि बहुजन-समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म कहनेमें भूल हुई है।
या तो इस शब्दका अनुचित अर्थ करके हिन्दुओंके सब संप्रदा-
योंको ही हिन्दू-धर्म कहना चाहिये, या ऐसा न कर सकें तो इस
शब्दका व्यवहार ही बन्द कर देना चाहिये। बहुजन-हिन्दू-समा-
जके धर्मका परंपरासे चला आया हुआ जो "सनातनधर्म" या
"श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म" अथवा "वैदिक धर्म" नाम है वह
बहुत ठीक है; बाकी जो अन्य संप्रदाय हैं वे अपने नामसे प्रसिद्ध
हैं ही, जैसे सिख-धर्म, आर्य-धर्म, जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म इत्यादि।
जब इन सब धर्मोंका अन्तर्भाव एक ही नाममें करनेकी आवश्य-
कता होती है तभी उन सबको एक साथ उनके सर्वसामान्य
नाम "हिन्दू-धर्म" से अभिहित करना समुचित होता है। ऐसा
करनेसे अर्थ भी स्पष्ट होता है, छोटेसे नाममें अभिप्राय भी पूरा
व्यक्त हो जाता है और कोई संदिग्धता भी नहीं रह जाती। इससे
अल्पसंख्यक लोगोंके मनका सन्देह और बहुसंख्यक लोगोंके
चित्तका असन्तोष दोनोंका ही निवारण हो जाता है और वह
अवसर मिलता है जब हम सब हिन्दू एक प्राण होकर, एक
जाति और एक संस्कृतिकी पुराण-पवित्र वैभवसंपन्न विजयवै-
जयन्तीके नीचे बन्धु-बन्धुके नाते एक होकर रहते हैं।
अखिल मानव-जातिकी बात छोड़ दें और केवल हिन्दुओंका ही
विचार करें तौभी यह स्पष्ट है कि हिन्दू-जातिमेंसे किसी भी समाज
के धार्मिक विचारों और संस्कारोंके सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं।
हिन्दुत्वकी परिभाषा १११
सप्त सिन्धुओंका वैदिक राष्ट्र अनेक उपजातियों और श्रेणियोंमें
बँटा हुआ था। उस समय बहुजन-समाजका जो धर्म था, हम
उसे सुभीतेके खयालसे वैदिक धर्म कहते हैं, परन्तु उस समय
भी सप्तसिन्धुओंमें ही एक ऐसा अल्प-संख्यक समाज था
जो वैदिक धर्म नहीं मानता था। पण्णी, दास, व्रात्य तथा
और भी अनेक समाज ऐसे थे जो अनेक बार वैदिक धर्मको
माननेसे इन्कार करते थे और कोई कोई तो वैदिक धर्मके
माननेवाले कभी थे ही नहीं। तथापि उन्हें यह चैतन्य था कि
जाति और राष्ट्रके बन्धनसे हम सब एक हैं। वैदिक धर्म नामसे
पुकारा जानेवाला एक धर्म-संप्रदाय उस समय था। परन्तु वैदिक
धर्म और “सिन्धु-धर्म” दोनों चीजें एक नहीं थीं, कारण यदि
“सिन्धु-धर्म” इस नामकी सृष्टि उस समय की जाती तो उस
नाममें स्वभावतः ही केवल वैदिक धर्म नहीं, प्रत्युत उन सब
धर्मोंका अन्तर्भाव होता जो सप्तसिन्धु-प्रदेशमें उस समय विद्यमान
थे। इष्टका समावेश और अनिष्टका त्याग करनेकी रीतिसे
सिन्धुओंकी जाति बढ़ती-बढ़ती विशाल हिन्दू-जाति हुई और
सिन्धुओंका स्थान—सिन्धुस्थान—बढ़ता-बढ़ता हिन्दुओंका
स्थान-हिन्दुस्थान बन गया। इस जातिके वैदिक तथा अवैदिक
मतोंके प्रवर्तकोंने अनेक अनुभव प्राप्त करके अनेक तत्वोंका
आविष्कार करके और अनेक वस्तुओंका ज्ञान संपादन करके
निम्नतमसे उच्चतमतक, अणुसे आत्मातक, परमाणुसे पर-
ब्रह्मतक संपूर्ण चराचर सृष्टिकी तत्कालसंभव चिकित्सा और
११२ हिन्दुत्व
परीक्षा करके विचार-सृष्टिके गुह्यतम रहस्योंका पता लगाकर और
परमानंदके उच्चतम नभोमंडलमें विहार करके एक ऐसा समी-
करण ढूंढ़ निकाला जिससे सत्यकी खोजमें प्रवृत्त प्रत्येक सत्या-
न्वेषीके चित्तका समाधान होता है—चाहे कोई एकेश्वरवादी हो,
द्वैत विश्वासी या अनीश्वरवादी हो। उस समीकरणका ध्येय
सत्य है और उसका साधन आत्मानुभव। वह समीकरण केवल
वैदिक नहीं है, केवल अवैदिक भी नहीं है। वह दोनोंका मेल
है। वह प्रत्यक्ष धर्मका अनुभव-सिद्ध शास्त्र है और वही हिन्दू-
धर्म है। वैदिक, सनातनी, जैन, बौद्ध, सिख—इन सब मतमता-
न्तरोंका एकीकरण करके जो निर्णायक सत्य तत्व निकलते हैं
उन्हीं सत्य तत्वोंका सत्यत्व ही "हिन्दू-धर्म" है। जो जो धर्म-
सिद्धान्त और धर्म-संप्रदाय "सप्तसिन्धु" नामसे विख्यात
भूमिमें तथा भावी विराट् सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थानमें उत्पन्न
हुए उन सबका अन्तर्भाव हिन्दूधर्मके अन्दर होता है और वे सब
हिन्दू-धर्मके प्राणभूत अङ्ग हैं।
इस प्रकार "वैदिक धर्म" या "सनातनधर्म" हिन्दू-धर्मके
अन्तर्गत अन्य संप्रदायोंके समान एक संप्रदायमात्र है, फिर उस
संप्रदायको माननेवालोंकी संख्या चाहे कितनी ही बड़ी हो।
हिन्दू-धर्म-विषयक स्वर्गवासी लोकमान्य पण्डित बाल गंगाधर
तिलककी जो
प्रामाण्य बुद्धिर्वेदेषु साधनानामनेकता।
उपास्यानामनियम एतद्धर्मस्य लक्षणम् ॥
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११३
यह व्याख्या है वह इसी "सनातन" हिन्दूधर्मकी है। "चित्र-
मय जगत्" में एक ऐसा विद्वत्तापूर्ण लेख लिखकर कि जिसपर
उनके प्रचंड पाण्डित्य और प्रगाढ़ ज्ञानकी छाप लगी हुई
है, उन्होंने इस "नास्ति" पक्षकी व्याख्याको "अस्ति" पक्षमें
रूपान्तरित करनेका प्रयत्न किया था और उसमें उन्होंने यह बता
दिया था कि हमारी यह व्याख्या इस समय जिसे साधारणतः
हिन्दूधर्म मानते हैं उसीके विषयमें है—हिन्दुत्वके विषयमें नहीं।
यही नहीं, बल्कि उसी लेखमें उन्होंने यह भी कह दिया था कि
इस व्याख्यामें 'आर्यसमाजियोंका अन्तर्भाव नहीं किया जा
सकता, यद्यपि राष्ट्रीय और जातीय दृष्टिसे आर्यसमाजी भी
हिन्दू ही हैं। लोकमान्यकी यह व्याख्या अपने मर्यादित अर्थमें
उत्तम है, पर यह व्यापक हिन्दूधर्मकी वास्तविक व्याख्या नहीं
हो सकती—हिन्दुत्वकी तो है ही नहीं। वह केवल "श्रुतिस्मृति
पुराणोक्त" लक्षणोंसे युक्त जो "सनातनधर्म" है उसीकी
व्याख्या है, और यह धर्म-संप्रदाय अन्य सब संप्रदायोंकी
अपेक्षा अधिक लोकमान्य होनेके कारण इसीको लोग "हिन्दू-
धर्म" कहते हैं। परन्तु तत्वतः यह ठीक नहीं है।
इस प्रकार व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष व्यवहारकी दृष्टिसे और केवल
सांप्रदायिक बातोंमें ही "हिन्दू-धर्म" हिन्दुओंका धर्म होनेसे (और
धर्म शब्दका अर्थ केवल संप्रदाय ही न होनेसे) हिन्दू-धर्ममें उन
सब विशेषताओंका समावेश होता है जो प्रत्येक हिन्दूमें पायी
जाती हैं। हम पहले यह देख चुके कि हिन्दू होनेका सबसे मह-
८
११४ हिन्दुत्व
त्वका लक्षण यह है कि यह भूमि जो सिन्धु-नदीसे सिन्धु-सागर-
पर्यन्त फैली हुई है वह उसकी मातृभूमि और पितृभूमि हो--
उसके ऋषियों और पूर्वपुरुषोंकी भूमि हो । जिन सब धर्म-संप्रदा-
योंको हम वैदिक अथवा अवैदिक "हिन्दू-धर्म" कहते हैं वे सब
धर्म-संप्रदाय और उनके प्रवर्त्तक तथा उनके द्वारा "सत्तत्त्व"
के दर्शन करनेवाले उनके सब अनुयायी इसी भूमाताकी
सन्तान हैं। हिन्दू-धर्मके सब पंथों और संप्रदायोंके लिये
'सिन्धुस्थान' की भूमि दिव्यभूमि है। इसी भूमिमें उन्होंने ईश्वरीय
ज्ञान लाभ किया, इसी भूमिके मानवी मनमें वे सब पंथ
और संप्रदाय उदित हुए। जिस प्रकार स्वयं पतितपावनी
गंगानदी यद्यपि साक्षात् विष्णु-भगवान्के पद-कमलोंसे
निस्सरित होती है, तौभी कट्टरसे कट्टर कमठ हिन्दू भी सामान्य
विचारमें उसे हिमालयकी ही कन्या मानता है उसी प्रकार यह
भूमि जिसके तत्वज्ञानके धार्मिक रूपमें उसे हम "हिन्दू-धर्म"
कहते हैं, वह उस तत्वज्ञानकी मातृभू और पितृभू है। हिन्दुत्व-
का दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि हिन्दू अपने हिन्दू माता-
पिताका ही वंशज होता है, प्राचीन सिन्धुओं और उनसे निकली
हुई हिन्दू-जातिका रक्त अपने अन्दर होनेका दावा करता है ।
हिन्दू-धर्मके भिन्न-भिन्न धर्म-संप्रदायोंपर भी यह लक्षण पूरे तौर-
पर घटता है। कारण, ये सब पंथ और संप्रदाय हिन्दू-ऋषियों
और तत्वद्रष्टाओंने ही प्रस्थापित और आविष्कृत किये हैं। और
इसलिये ये सब पंथ और संप्रदाय सप्त-सिन्धुओंके तत्व-ज्ञान-तरु-
तृतीय खण्ड: सार्वभौम मानव-कल्याण एवं हिन्दुत्व उपसंहार
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११५,
; ही फल-फूल है। हिन्दू-धर्म हिन्दुओंकी नैसर्गिक परिस्थिति
और विचारप्रणालीका ही विकास नहीं बल्कि हिन्दू-संस्कृतिका
ही विकास है। वैदिक कालमें या बौद्ध, जैन आदि संप्रदा-
योंके उदयकालमें अथवा उससे भी आधुनिक चैतन्य, चक्रधर,
बसव, नानक, दयानन्द अथवा राजा राममोहनरायके समयमें
जब-जब जो-जो हिन्दू-धर्ममें विचार-क्रांति हुई, उस प्रत्येक क्रांति-
के समय ज्ञात हुई परमोच्च आनन्दकी अनुभूति जिस भाषा और
जिन लाक्षणिक शब्दोंद्वारा अभिव्यक्त हुई, वह भाषा और वे
शब्द, उनकी कथा और उनका तत्वज्ञान, उनके द्वारा विवादित
और स्वीकृत सिद्धान्त, इन सबपर हिन्दू-संस्कृतिकी ऐसी वज्र-
प्राय छाप लगी हुई है कि वह कभी मिट नहीं सकती। हिन्दू-
धर्मके सब संप्रदाय हिन्दू-संस्कृतिके ही वायुमण्डलमें जनमे हुए हैं
और उसीमें उनकी जीवन-रक्षा और वृद्धि हुई है; उसी प्रकार
प्रत्येक हिन्दूका धर्म उसकी जन्मभूमिसे इतना अभिन्न प्राण है
कि यह भूमि प्रत्येक हिन्दूके लिये केवल पितृभूमि ही नहीं प्रत्युत
पुण्यभूमि भी है।
हां, यह भारतभूमि, यह सिन्धुस्थान, यह हमारा देश
सिन्धुसे सिन्धुतक जो फैला हुआ है, हमारी पुण्यभूमि ही है,
कारण इसी भूमिमें हमारे धर्मप्रवर्त्तक उत्पन्न हुए, इसी भूमिमें
वे ऋषि उत्पन्न हुए जिन्हें वेदमंत्रोंके दर्शन हुए। उन वैदिक
ऋषियोंसे लेकर दयानन्दतक, जिनसे महावीरतक, बुद्धसे
नागसेनतक, नानकसे गोविन्दतक, बंदासे बसवतक; चन्द्र-
११६ हिन्दुत्व
धरसे चैतन्यतक, रामदाससे राममोहनतक हमारे सब गुरु
और महापुरुष इसी भूमिमें पैदा हुए और इसी भूमिमें पले और
फले फूले। इस भूमिकी रजके प्रत्येक कणसे उनके पदस्पर्शकी
ध्वनि प्रतिध्वनित होती है। इस भूमिकी सब नदियां पवित्र हैं
और उनसे इसकी वनश्री पावन हुई है; कारण, मानवी जीवन,
आत्मा और परमात्मा, ब्रह्म और माया—इन गूढ़तम प्रश्नोंका
परम विचार हमारे परम पूज्य ऋषियों और आचार्योंने इन्हीं
नदियोंके शीतल चन्द्रप्रकाशसे रम्य तटपर अथवा तरुलताओंके
कुञ्जमें बैठकर ही किया था। इस भूमिके प्रत्येक गिरि और
कन्दरामें कपिल और व्यास, बुद्ध और शङ्कराचार्य, शंकर
और रामदासकी स्मृति-समीर बह रही है। कहीं भगीरथने
राज्य किया है, कहीं कुरुक्षेत्र विद्यमान है। कहीं रामचन्द्रके
वनवासका प्रथम प्रस्थान है, कहीं जानकीके सुवर्णमृग-
दर्शनका स्थान है। इस यमुनातटपर खड़े गोपाल कृष्णने अपनी
विश्वविमोहिनी मधुर मुरली बजायी और वहां गोकुलके गोप
उसकी ध्वनिपर आनन्दोन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। यहां
बोधिवृक्ष खड़ा है, वहां वह तपोवन है। यहां महावीरने निर्वाण
लाभ किया। वहां गुरु नानककी संगत “गगन थाल रविचंद
दीपक बने” वाली आरती गा रही है। उस राजा गोपीचंदने
राजपाटपर लात मारकर यहीं योगीका वेश लिया और भिक्षा-
पात्र हाथमें ले भगिनीके द्वारपर “मैया, भिक्षा दे” की पुका .
की। यहां बन्दा बहादुरके पुत्रको बोटी बोटी काटकर उसने
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११७
बापके सामने उसका वध किया गया और मृतप्राय पिताने
भी हिन्दूधर्मको नहीं छोड़ा, इसलिये उसके मुखमें उसके वीर
तनयका रक्ताक्त हृदय क्रूरतासे ढूंसा गया। यहांके प्रत्येक
स्थान और पाषाणमें किसी न किसी हुतात्माकी पुण्यकथा
संचित हुई है। हे जननी जन्मभूमि ! तेरी प्रत्येक रजःकणिका
यज्ञभूमि हो गयी है। 'जहां कृष्णसार मिलता है', वहीं नहीं,
काश्मीरसे कन्याकुमारीतक समग्र भारतभूमि यज्ञभूमि है, जो
ज्ञानयज्ञ अथवा आत्मयज्ञसे पतितपावनी हुई है। इसलिये
यह भारतभूमि, यह सिन्धुस्थान प्रत्येक हिन्दूके लिये पितृभू है
और पुण्यभू भी।
इसलिये ऐसे मुसलमान और क्रिस्तान जो जबर्दस्ती धर्मच्युत
करके परधर्ममें मिलाये गये और इसलिये अन्य हिन्दुओंके साथ
जिनकी यही मातृपितृभूमि है, हिन्दू-संस्कृतिके अधिक भागको
जो अब भी मानते हैं—जिनकी भाषा, व्यवहार-शास्त्र, रीति-
रस्म, लौकिक मनःसंस्कार और इतिहास अनेकांशमें अन्य
हिन्दुओंके ही समान हैं—ऐसे मुसलमान और क्रिस्तान-“पुण्यभू”
की उपर्युक्त लक्षणमीमांसाके कारण कदापि हिन्दू नहीं
माने जा सकते। कारण अन्य हिन्दुओंके समान उनके लिये भी
हिन्दुस्थान पितृभूमि है पर पुण्यभूमि नहीं है। उनकी पुण्यभू
यहांसे बहुत दूर अरबमें या फिलस्तीनमें है। उनके पुराण और
अवतार, उनकी कथाएं और उनके धर्मवीर इस भूमिके जने
नहीं हैं। और इसलिये उनके नामों और उनकी आकांक्षाओंमें
११८ हिन्दुत्व
परायापनकी गन्ध आती है। उनकी निष्ठा बंटी हुई है। उनमें
कुछ लोग जैसा कि कहा करते हैं वैसी ही यदि उनकी निष्ठा हो
तो कोई चारा भी नहीं है—उन्हें अपनी पुण्यभूमि अपनी पितृ-
भूमिसे 'गरीयसी' मानना ही होगा और उसीकी अधिक भावना
औ भक्ति करनी होगी। यह बिलकुल स्वाभाविक है। हम इसी-
लिये उन्हें बुरा नहीं कहते, न इसपर अश्रुपात ही करते हैं। हम
जो बात है उसीको सामने रख रहे हैं। हिन्दुत्वके लक्षण क्या हैं
यह निश्चित करनेका यहां तक प्रयत्न किया। उससे यह मालूम
हुआ कि बोहरा और ऐसे ही अन्य मुसलमान या क्रिस्तानोंमें
हिन्दुत्व-के और सब लक्षण हैं पर एक लक्षण नहीं है—कि वे
हिन्दुस्थानको अपनी पुण्यभू नहीं मानते ।
यहां यह प्रश्न नहीं है कि कौन धर्म अच्छा है और किस
धर्मको मानना चाहिये और न यहां परमात्मा, आत्मा और जीव-
त्माके संबंधमें ही कोई नया सिद्धान्त प्रतिपादित करना है।
कारण, हमारा अन्तःकरणवृत्तिसे ही यह प्रामाणिक विश्वास
है कि हिन्दू तत्वज्ञान—हम किसी संप्रदाय विशेषकी बात नहीं
कहते—हिन्दू तत्वज्ञान—उस पराकाष्ठाको पहुंचा हुआ है कि
मानवी कल्पनाशक्तिमें अब कोई ऐसी बात नहीं रह गयी है कि
उससे अज्ञेयके संबंधमें तो क्या, अज्ञातके संबंधमें भी कोई नई
कल्पना निकल सके अथवा "तत्" और "त्वम्" की कोई नई
मीमांसा हो सके। आप कौन हैं ? एकेश्वरवादी, जगदीश्वरवादी,
निरीश्वरवादी, नास्तिक्यवादी; कौन हैं ? जो कोई हों, यह
हिन्दुत्वकी परिभाषा ११६
आपके लिये पूरा अवसर और अवकाश है, जिसमें हे आत्मन् !
सब मन्दिरोंके इस मन्दिरमें आकर जो किसी वैयक्तिक नींवपर
नहीं बल्कि अटल, अचल, व्यापक सत्यकी नींवपर उठा हुआ है,
तुम चाहे जितने ऊंचे उड़कर ऊंचेसे ऊंचे और परमसुखधामको
प्राप्त कर सकते हो । कहां अपनी छोटीसी सुराही लेकर जलके
लिये कुओंकी तलाशमें भटक रहे हो, जब खड़े हो स्फटिकसे
स्वच्छ सलिलकी स्रोतस्वती पतितपावनी महानदी गङ्गाके तटपर !
क्या तुम्हारी नसोंमें प्रवाहित होनेवाला हमारे तुम्हारे पूर्वजोंका रक्त
तुम्हें उन प्रिय दृश्यों और प्रेमबंधनोंका स्मरण नहीं कराता, जिन्हें
काटकर जबर्दस्ती खड्गकी धारपर तुम हमसे अलग किये गये ?
आओ भाई, अपने भाई-बहनोंमें लौट आओ, देखो, अपने बिछुड़े
हुए भाईका स्वागत करनेके लिये अपने हृदयका कपाट खोलकर
ये अपनी आलिङ्ग्नोत्सुक बाहें फैलाये हुए हैं। कहां तुम्हें उपा-
सना करनेकी इतनी स्वाधीनता मिलेगी जितनी इस पुण्यभूमिमें,
जहां महाकालके मन्दिरकी सीढ़ियोंपर खड़ा होकर चार्वाक भी
नास्तिक-दर्शनका उपदेश दे सकता है ? कहां इससे अधिक
समाज-संगठनकी स्वाधीनता पाओगे जितनी इस हिन्दू-समाजमें,
जहां विहारके पाटलीपुत्रसे काशीके पण्डितोंतक, सन्थालोंसे
राजपूतानेके राजाप्रासादोंतक, सबके अपने अपने विशिष्ट समाज
हैं—सब अपने अपने विशिष्ट समाज बना सकते और संघटित
कर सकते हैं। सच है—
'यदेहास्ति न सर्वत्र यन्नेहास्ति न कुत्र चित्।'
१२० हिन्दुत्व
यहां जो है वह सब जगह नहीं मिलेगा; यहां जो नहीं है वह
कहीं भी न मिलेगा। संसारमें जो कुछ है, वह यहां मौजूद है।
तुम जो जाति, रक्त, संस्कृति और राष्ट्रीयताके बन्धनोंसे हिन्दू
ही हो और जिसे हिंसाके हाथने ही अपने पितृ-गृहसे जबर्दस्ती
खींच लिया, तुम्हें यही करना है कि अपनी अनन्य भक्ति अपनी
इस माताको अर्पण करो और इसे केवल पितृ-भू नहीं, पुण्यभूमि
मानकर पूंजो और इस तरह फिरसे हिन्दूसंघमें आ जाओ।
हिन्दू-जाति अत्यन्त प्रसन्न चित्तसे तुम्हारा स्वागत करेगी।
बोहरा, खोजा, मेमन तथा अन्य मुसलमानों और ऐसे ही
क्रिस्तानोके लिये यही रास्ता खुला है और यह केवल उनकी
मर्जीपर है कि वे इसे स्वीकार करें या न करें। परन्तु जबतक
वे इस मार्गपर नहीं हैं तबतक हम उन्हें हिन्दू नहीं कह सकते।
यहां यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये कि हम हिन्दुत्वके लक्षणों-
की जांच कर रहे हैं और इसलिये किसी पक्ष या पूर्वाग्रहके अनु-
कूल अर्थ निकालनेके लिये विवेच्य विषयके विवेचनमें खींच-तान
करना केवल अन्याय होगा।
तात्पर्य, हिन्दू वही है जो सिन्धु नदीसे सिन्धु-समुद्र पर्यंत
विस्तृत इस देशको अपनी पितृ-भू मानता है; जो रक्त-संबंधसे
उस जातिका वंशधर है जिसका प्रथम उद्गम वैदिक सप्त-सिन्धु-
ओंमें हुआ और जो पीछे बराबर आगे बढ़ती अन्तर्भूतको
पचाती और उसे महनीय रूप देती हिन्दू-जातिके नामसे विख्यात
हुई; जो उत्तराधिकार सम्बन्धसे उसी जातिकी उस संस्कृतिको
हिन्दुत्वकी परिभाषा १२१
अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृति संस्कृत भाषामें संचित
और जातिके इतिहास, साहित्य, कला, धर्मशास्त्र, व्यवहारशास्त्र,
रीति-नीति, विधि-संस्कार, पर्व और त्योहार-इनके द्वारा अभि-
व्यक्त हुई है; और जो इन सब बातोंके साथ इस देशको अपनी
पुण्य-भू, अपने अवतारों और ऋषियोंकी, अपने महापुरुषों और
आचार्योंकी निवास-भूमि तथा सदाचार और तीर्थयात्राकी
भूमि मानता है। हिन्दुत्वके ये लक्षण हैं—एक राष्ट्र, एक जाति,
और एक संस्कृति। इन सब लक्षणोंका अन्तर्भाव करके संक्षेपमें
यों कहा जा सकता है कि हिन्दू वह है जो सिन्धुस्थानको केवल
पितृभू नहीं, पुण्य-भू भी मानता है। हिन्दुत्वके प्रथम दो लक्षण-
राष्ट्र और जाति—"पितृ-भू" शब्दमें आ जाते हैं, और तीसरा
लक्षण—एक संस्कृति—"पुण्य-भू" शब्दसे मुख्यतः प्रकट होता
है, क्योंकि संस्कृतिमें सब संस्कार आ जाते हैं और संस्कृति ही
किसी भूमिको पुण्य-भूमि बनाती है। यह परिभाषा और भी
संक्षिप्त निम्नलिखित अनुष्टुपमें की जा सकती है —
आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृ-भूः पुण्य-भूश्चैव स वै हिन्दुरितिस्मृतः ॥
( ७ )
परिभाषाकी जांच
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अबतक हिन्दुत्वका जो स्थूल विवेचन किया गया उससे
“हिन्दुत्व” के मुख्य लक्षणोंका बोध करानेवाली एक काम
चलाने लायक परिभाषा तैयार हो गयी । अब यह सर्वसामान्य
परिभाषा किस प्रकार सर्वत्र घटती है यह देखना बाकी है । यह
काम कुछ खास उदाहरण लेकर और जिन उदाहरणोंके कारण
यह परिभाषा करनेकी आवश्यकता पड़ी ऐसे ही उदाहरण लेकर
किया जा सकता है । इस परिभाषाको निश्चित करते हुए, हमने
इस बातकी सावधानी रखी है कि इसमें अतिव्याप्तिका दोष न
आने पावे। अब कुछ खास उदाहरण लेकर उनपर इस परि-
भाषाको हम यथार्थमें घटा सके तो यह निश्चय हो जायगा कि
इसमें जैसे अति-व्याप्तिका दोष नहीं है, वैसे ही अव्याप्तिका भी
दोष नहीं है ।
हिन्दुओंमें जो दैशिक विभाग हुए हैं वे इस परिभाषासे पूर्ण
सुसंगत हैं, यह उन विभागोंको देखनेके साथ ही प्रतात हो
जायगा । हमारी परिभाषाका मूलतत्त्व “आसिन्धु सिन्धु-
पर्यन्ता” भूमि है । हमलोगोंमेंसे बहुतसे लोग सिन्धु नदीके उस
पारकी भूमिमें वास करते हैं । तथापि जब किसी नदीके तटका
परिभाषाकी जांच १२३
उल्लेख किया जाता है तब उसमें दोनों ही तट आ जाते हैं और
इसलिये सिन्धु नदीके पश्चिम तटका सारा प्रदेश निसर्गतः ही
“सिन्धुस्थान” का ही अंश है और इसलिये वह हमारी परि-
भाषाके अन्दर आ जाता है। सिंधु नदीके इस पश्चिम तटप्रदेश-
पर जो लोग रहते हैं वे निःसन्देह प्राचीन सिंधुओंके वंशज हैं
और उन्होंने आजतक अपना और अपनी भूमिका प्राचीन नाम
नहीं बदला है-वे आज भी सहस्रों वर्ष पूर्वकी तरह "सिंधुदेश"
की संतान "सिन्धी" ही कहलाते हैं। दूसरी बात यह है कि मुख्य
भूमिके आस-पासकी भूमि भी मुख्य भूमिके नामसे ही पुकारी
जाती है और तीसरी बात यह है कि सिंधुके उस पार रहनेवाले
ये हिन्दू परम्परासे इस हिन्दुस्थानको ही अपनी पितृ-भू और
पुण्य-भू मानते आये हैं। उन्होंने कभी अपने रहनेके छोटेसे
प्रदेशको ही “पितृ-भू” और “पुण्य-भू” मान बैठनेकी मातृ-
घातक कल्पना करनेका पाप नहीं किया। प्रत्युत हमारी जो
काशी, कैलास और गंगोत्री है वही काशी, कैलास और गंगोत्री
उनकी भी है। वैदिक कालसे ही वे भारतवर्षके एक प्रधान अंग
हैं। रामायण और महाभारतमें “सिन्धु शिविसौवीरों” का उल्लेख
है और वे महान् हिन्दू जातीय संघ और राष्ट्रके अंग ही हैं। वे
हमारे राष्ट्र, जाति और संस्कृतिके ही हैं; इसलिये वे हिन्दू हैं
और हमारी परिभाषाके अन्दर आते हैं।
परन्तु यदि कोई इस बातको न भी माने कि किसी नदीका
अपनी हदके अन्दर होना उसके दोनों तटोंका उस सीमाके अंदर