हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुत्वकी परिभाषा १०६
मानते, कुछ ऐसे हैं जो कुछ स्मृतियोंको नहीं मानते और कुछ
ऐसे हैं जो श्रुतियोंतकको नहीं मानते । परन्तु यदि आप बहुजन-
समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानते और उसका नाम "कट्टर
हिन्दू-धर्म" रखते हैं तो जो अन्य सद्भिन्न धर्म-संप्रदाय हैं उन्हें
इस तरह अपना हिन्दुत्वके दायरेसे अन्यायपूर्वक बाहर किया
जाना और बहुजन-समाजका हिन्दुत्वका इजारा ले लेना कभी
अच्छा नहीं लगता और यह ठीक भी है। अल्प-संख्यक संप्रदायों-
का भी कुछ नाम होना चाहिये । पर जब आप कट्टर सनातन-
धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानेंगे तो इसका यह मतलब होगा कि
जो कट्टर सनातनधर्म नहीं है वह हिन्दू-धर्म नहीं है ! और इसके
बाद फिर यह भी हुआ कि सनातनधर्मसे भिन्न संप्रदायवाले
हिन्दू ही नहीं हैं ! परन्तु यह निर्णय उन लोगोंको भी असह्य
मालूम होता है जो इस वादके पूर्व पक्षको मानकर उस निग्रह-
कोटिमें पहुंचते हैं जहां वे ठहरना नहीं चाहते, पर जहांसे निक-
लना भी नहीं जानते ! इस तरहसे हमारे लाखों सिख, जैन,
लिंगायत और आर्यसमाजी भाई, यदि उनसे कहा जाय कि
अब आप लोग हिन्दू नहीं रहे तो इसे अपना अपमान समझेंगे
और इससे उन्हें बड़ा क्रोध होगा । परन्तु इसके साथ ही इन्हीं
लोगोंमें कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि हिन्दू होना-
अपने बापदादोंकी जातिमें बने रहना यही है कि जिन अन्ध-
विश्वासकी बातोंको हम नहीं मानते उन्हें मानें अथवा अपनी
जातिसे अलग हो जायँ ।