हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुत्वकी परिभाषा ११३
यह व्याख्या है वह इसी "सनातन" हिन्दूधर्मकी है। "चित्र-
मय जगत्" में एक ऐसा विद्वत्तापूर्ण लेख लिखकर कि जिसपर
उनके प्रचंड पाण्डित्य और प्रगाढ़ ज्ञानकी छाप लगी हुई
है, उन्होंने इस "नास्ति" पक्षकी व्याख्याको "अस्ति" पक्षमें
रूपान्तरित करनेका प्रयत्न किया था और उसमें उन्होंने यह बता
दिया था कि हमारी यह व्याख्या इस समय जिसे साधारणतः
हिन्दूधर्म मानते हैं उसीके विषयमें है—हिन्दुत्वके विषयमें नहीं।
यही नहीं, बल्कि उसी लेखमें उन्होंने यह भी कह दिया था कि
इस व्याख्यामें 'आर्यसमाजियोंका अन्तर्भाव नहीं किया जा
सकता, यद्यपि राष्ट्रीय और जातीय दृष्टिसे आर्यसमाजी भी
हिन्दू ही हैं। लोकमान्यकी यह व्याख्या अपने मर्यादित अर्थमें
उत्तम है, पर यह व्यापक हिन्दूधर्मकी वास्तविक व्याख्या नहीं
हो सकती—हिन्दुत्वकी तो है ही नहीं। वह केवल "श्रुतिस्मृति
पुराणोक्त" लक्षणोंसे युक्त जो "सनातनधर्म" है उसीकी
व्याख्या है, और यह धर्म-संप्रदाय अन्य सब संप्रदायोंकी
अपेक्षा अधिक लोकमान्य होनेके कारण इसीको लोग "हिन्दू-
धर्म" कहते हैं। परन्तु तत्वतः यह ठीक नहीं है।
इस प्रकार व्युत्पत्ति और प्रत्यक्ष व्यवहारकी दृष्टिसे और केवल
सांप्रदायिक बातोंमें ही "हिन्दू-धर्म" हिन्दुओंका धर्म होनेसे (और
धर्म शब्दका अर्थ केवल संप्रदाय ही न होनेसे) हिन्दू-धर्ममें उन
सब विशेषताओंका समावेश होता है जो प्रत्येक हिन्दूमें पायी
जाती हैं। हम पहले यह देख चुके कि हिन्दू होनेका सबसे मह-
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