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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

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हिन्दुत्वकी परिभाषा ११६
आपके लिये पूरा अवसर और अवकाश है, जिसमें हे आत्मन् !
सब मन्दिरोंके इस मन्दिरमें आकर जो किसी वैयक्तिक नींवपर
नहीं बल्कि अटल, अचल, व्यापक सत्यकी नींवपर उठा हुआ है,
तुम चाहे जितने ऊंचे उड़कर ऊंचेसे ऊंचे और परमसुखधामको
प्राप्त कर सकते हो । कहां अपनी छोटीसी सुराही लेकर जलके
लिये कुओंकी तलाशमें भटक रहे हो, जब खड़े हो स्फटिकसे
स्वच्छ सलिलकी स्रोतस्वती पतितपावनी महानदी गङ्गाके तटपर !
क्या तुम्हारी नसोंमें प्रवाहित होनेवाला हमारे तुम्हारे पूर्वजोंका रक्त
तुम्हें उन प्रिय दृश्यों और प्रेमबंधनोंका स्मरण नहीं कराता, जिन्हें
काटकर जबर्दस्ती खड्गकी धारपर तुम हमसे अलग किये गये ?
आओ भाई, अपने भाई-बहनोंमें लौट आओ, देखो, अपने बिछुड़े
हुए भाईका स्वागत करनेके लिये अपने हृदयका कपाट खोलकर
ये अपनी आलिङ्ग्नोत्सुक बाहें फैलाये हुए हैं। कहां तुम्हें उपा-
सना करनेकी इतनी स्वाधीनता मिलेगी जितनी इस पुण्यभूमिमें,
जहां महाकालके मन्दिरकी सीढ़ियोंपर खड़ा होकर चार्वाक भी
नास्तिक-दर्शनका उपदेश दे सकता है ? कहां इससे अधिक
समाज-संगठनकी स्वाधीनता पाओगे जितनी इस हिन्दू-समाजमें,
जहां विहारके पाटलीपुत्रसे काशीके पण्डितोंतक, सन्थालोंसे
राजपूतानेके राजाप्रासादोंतक, सबके अपने अपने विशिष्ट समाज
हैं—सब अपने अपने विशिष्ट समाज बना सकते और संघटित
कर सकते हैं। सच है—
'यदेहास्ति न सर्वत्र यन्नेहास्ति न कुत्र चित्।'