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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 167 में से

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पृष्ठ 123

हिन्दुत्वकी परिभाषा १०७
नहीं है !” इस चक्करमें भटकनेवालोंकी कैसी फजीहत होती
है और “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंका भेद ध्यानमें
न रखनेसे कैसी गड़बड़ मचती है यह जिस किसीको देखना हो
वह प्रकाशन-पराक्रम करनेवाली नटेशन कंपनीकी “हिन्दुइजमके
लक्षण” नामक अंगरेजी पुस्तक एक बार देख ले।
हिन्दू-धर्मका अर्थ है हिन्दुओंका धर्म; और हिन्दू-शब्द
“सिन्धु” से निकला हुआ होनेके कारण उसका मूल अर्थ उन
लोंगोसे है जो सिन्धु नदीसे सिन्धु-सागर पर्यन्तके देशमें बसते हैं
और इसलिये हिन्दू-धर्मका उसी धर्म या उन्हीं धर्मों से मतलब है
जो इस देश और इस जातिके सहजात धर्म हैं। यदि इन भिन्न-
भिन्न धर्मसिद्धान्तों और आचारोंके आधारभूत कोई समन्वय
हम न देख सकें तो हमें यह कहना होगा कि हिन्दू-धर्म कोई
सामान्य धर्म नहीं है, बल्कि यह कई ऐसे धर्म-सम्प्रदायोंका
समूह है जो संप्रदाय परस्परसे भिन्न अथवा परस्परके विरोधी
भी हैं। पर सामान्य हिन्दू-धर्मकी पहचान करनेमें असमर्थ
होकर कोई किसी भी हालतमें यह नहीं कह सकता कि हिन्दू तो
कोई राष्ट्र या मानव समाज ही नहीं है, न कोई किसी हिन्दू-संप्र-
दायको यह कहकर चोट पहुंचा सकता है कि अमुक संप्रदाय
हिन्दू ही नहीं है।
इस प्रबन्धकी मर्यादा हमें विस्तारसे हिन्दू-धर्मके लक्षणोंकी
चर्चा करनेका अवसर नहीं देती। हम ऊपर यह कह चुके हैं कि
“हिन्दू-धर्म क्या है ?” इसकी जांच तो तब आरम्भ हो सकती