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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

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पृष्ठ 126, कुल 167 में से

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पृष्ठ 126

११० हिन्दुत्व
इस प्रकार वैमनस्य उत्पन्न होनेका कारण अधिकांशमे यही
है कि बहुजन-समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म कहनेमें भूल हुई है।
या तो इस शब्दका अनुचित अर्थ करके हिन्दुओंके सब संप्रदा-
योंको ही हिन्दू-धर्म कहना चाहिये, या ऐसा न कर सकें तो इस
शब्दका व्यवहार ही बन्द कर देना चाहिये। बहुजन-हिन्दू-समा-
जके धर्मका परंपरासे चला आया हुआ जो "सनातनधर्म" या
"श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म" अथवा "वैदिक धर्म" नाम है वह
बहुत ठीक है; बाकी जो अन्य संप्रदाय हैं वे अपने नामसे प्रसिद्ध
हैं ही, जैसे सिख-धर्म, आर्य-धर्म, जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म इत्यादि।
जब इन सब धर्मोंका अन्तर्भाव एक ही नाममें करनेकी आवश्य-
कता होती है तभी उन सबको एक साथ उनके सर्वसामान्य
नाम "हिन्दू-धर्म" से अभिहित करना समुचित होता है। ऐसा
करनेसे अर्थ भी स्पष्ट होता है, छोटेसे नाममें अभिप्राय भी पूरा
व्यक्त हो जाता है और कोई संदिग्धता भी नहीं रह जाती। इससे
अल्पसंख्यक लोगोंके मनका सन्देह और बहुसंख्यक लोगोंके
चित्तका असन्तोष दोनोंका ही निवारण हो जाता है और वह
अवसर मिलता है जब हम सब हिन्दू एक प्राण होकर, एक
जाति और एक संस्कृतिकी पुराण-पवित्र वैभवसंपन्न विजयवै-
जयन्तीके नीचे बन्धु-बन्धुके नाते एक होकर रहते हैं।
अखिल मानव-जातिकी बात छोड़ दें और केवल हिन्दुओंका ही
विचार करें तौभी यह स्पष्ट है कि हिन्दू-जातिमेंसे किसी भी समाज
के धार्मिक विचारों और संस्कारोंके सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं।