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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 167 में से

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पृष्ठ 130

११४ हिन्दुत्व
त्वका लक्षण यह है कि यह भूमि जो सिन्धु-नदीसे सिन्धु-सागर-
पर्यन्त फैली हुई है वह उसकी मातृभूमि और पितृभूमि हो--
उसके ऋषियों और पूर्वपुरुषोंकी भूमि हो । जिन सब धर्म-संप्रदा-
योंको हम वैदिक अथवा अवैदिक "हिन्दू-धर्म" कहते हैं वे सब
धर्म-संप्रदाय और उनके प्रवर्त्तक तथा उनके द्वारा "सत्तत्त्व"
के दर्शन करनेवाले उनके सब अनुयायी इसी भूमाताकी
सन्तान हैं। हिन्दू-धर्मके सब पंथों और संप्रदायोंके लिये
'सिन्धुस्थान' की भूमि दिव्यभूमि है। इसी भूमिमें उन्होंने ईश्वरीय
ज्ञान लाभ किया, इसी भूमिके मानवी मनमें वे सब पंथ
और संप्रदाय उदित हुए। जिस प्रकार स्वयं पतितपावनी
गंगानदी यद्यपि साक्षात् विष्णु-भगवान्के पद-कमलोंसे
निस्सरित होती है, तौभी कट्टरसे कट्टर कमठ हिन्दू भी सामान्य
विचारमें उसे हिमालयकी ही कन्या मानता है उसी प्रकार यह
भूमि जिसके तत्वज्ञानके धार्मिक रूपमें उसे हम "हिन्दू-धर्म"
कहते हैं, वह उस तत्वज्ञानकी मातृभू और पितृभू है। हिन्दुत्व-
का दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि हिन्दू अपने हिन्दू माता-
पिताका ही वंशज होता है, प्राचीन सिन्धुओं और उनसे निकली
हुई हिन्दू-जातिका रक्त अपने अन्दर होनेका दावा करता है ।
हिन्दू-धर्मके भिन्न-भिन्न धर्म-संप्रदायोंपर भी यह लक्षण पूरे तौर-
पर घटता है। कारण, ये सब पंथ और संप्रदाय हिन्दू-ऋषियों
और तत्वद्रष्टाओंने ही प्रस्थापित और आविष्कृत किये हैं। और
इसलिये ये सब पंथ और संप्रदाय सप्त-सिन्धुओंके तत्व-ज्ञान-तरु-