हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
हिन्दुत्वके तीन लक्षण , ६१
भी तो इस बातको नहीं भूल सकते कि उनके अन्दर भी हिन्दू-
रक्त ही दौड़ रहा है। परन्तु हम जो इस बातकी जांच कर रहे हैं
क वस्तुस्थित क्या है, न कि वस्तुस्थिति क्या होनी चाहिये, क्या
यह कह सकते हैं कि ये मुसलमान हिन्दू हैं? काश्मीर तथा
हिन्दुस्थानके अन्य अनेक भागोंमें ऐसे मुसलमान हैं और दक्षिण
भारतमें ऐसे क्रिस्तान हैं जो जातिभेदके नियमोंको यहां तक
मानते हैं कि अपनी बिरादरीके अन्दर ही शादी ब्याह करते हैं।
इससे यह स्पष्ट है कि उनका हिन्दू-रक्त ज्यों-का-त्यों बना हुआ है;
उनमें विदेशी रक्तका मिश्रण नहीं हुआ है। फिर भी हिन्दू
शब्दका प्रयोग जिस अर्थमें होता है उस अर्थमें उन्हें हिन्दू तो नहीं
कह सकते। कारण, हम हिन्दू जो एक जाति हैं उसका कारण
केवल यही नहीं है कि हम एक पितृभूमिके उपासक और एक ही
रक्तके उत्तराधिकारी हैं; बल्कि इसके साथ ही एक बात है जो
हिन्दूके हिन्दुत्वका वैसा ही महान् लक्षण है जैसे पूर्वकथित ये
दो लक्षण। वह बात यह है कि हम हिन्दू एक संस्कृतिके मानने-
वाले हैं। वह हिन्दू-संस्कृति महान् संस्कृति है जिसका भाव
प्रकट करनेके लिये संस्कृत शब्द ही अत्यन्त उपयुक्त और सार्थ
है। कारण, इस शब्दसे "संस्कृत" भाषा भी सूचित होती है
जिस संस्कृत भाषामें वह संस्कृति संरक्षित है, जिसमें हिन्दू-
जातिके इतिहासमें जो जो कुछ संग्राह्य और उत्तम है उसका
प्रकाश हुआ और जिसमें यह संपूर्ण ज्ञान संचित भी हुआ। हम
हिन्दू एक हैं, कारण हम लोग एक राष्ट्र हैं, एक जाति हैं और
हमारी एक संस्कृति है।
६२ • हिन्दुत्व
पर संस्कृति आखिर क्या वस्तु है ? संस्कृति मानवी मनकी
अभिव्यक्ति है । संस्कृति प्रकृतिके मानवी रूपान्तर और विस्तार-
का इतिहास है । यदि प्रकृति परमात्मा द्वारा निर्मित हुई है तो
संस्कृति मनुष्य द्वारा उसोकी अनुकृति है । इस संस्कृतिका
सर्वोत्तम रूप प्रकृति और मनुष्यपर मनुष्यकी आत्माकी पूर्ण
विजय है । जहां कहीं और जहांतक मनुष्य प्रकृतिको इस प्रकार
बना लेता है जिससे आत्माको आनन्द हो वहीं उसी हदतक
संस्कृतिका आरम्भ होता है । और जहां सामर्थ्य, सौंदर्य और
प्रेम, इनके सम्बन्धमें मनुष्य अपनी स्वर्गीय आकांक्षाएं पूर्ण करके
परमानन्दके सब मार्ग ढूंढकर जीवनका पूर्ण विकास और
उसका ऐश्वर्य अनुभव कर लेता है, वहां संस्कृतिकी पूर्ण विजय
होती है ।
किसी राष्ट्रकी संस्कृतिका इतिहास उस राष्ट्रके विचार,
आचार और पुरुषार्थ-सिद्धिका इतिहास होता है । काव्य और
कलासे उसके विचारोंका पता लगता है, इतिहास और सामा-
जिक संस्थाओंसे उसके आचार और सम्पादित पुरुषार्थ मालूम
होते हैं । इनमेंसे किसी भी बातमें मनुष्य अन्य मनुष्योंसे अलग
नहीं रह सकता । अंदमानकी आदिम वन्य जातिकी काठकी
पटियोंको जोड़-जाड़कर भद्दोसी शकलकी डोंगीमें बैठकर ( जिसे
वहां डुं'गी कहते हैं ) उसका अनुकरण बिलकुल आधुनिक अमे-
रिकन ड्रे टनाटके तैयार करनेमें कुछ न कुछ होता ही है । पेरि-
सकी नवयुवतियोंकी पोशाकमें जो बिलकुल नयी फैशन निकली
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ६३
है, वह पातुआ जातिकी स्त्रियोंके नंगे कमरबन्दमें लटकनेवाले
पत्तोंके नोमलहंगेकी ही नकल है।
पर इसपर भी डुंगी डुंगी ही है और ड्रेडनाट ड्रेडनाट ही
है। इन दोनोंमें सादृश्यकी अपेक्षा वैदृश्य ही अधिक है और इस-
लिये वह सादृश्य जो है नहींके बराबर हो जाता है। उसी प्रकार
अन्य देशवासियोंके समान हिन्दुओंने भी संसारको बहुतसी
बातें दी हैं और बहुतसी ली भी हैं, तथापि अन्य देशवासियोंकी
संस्कृतिकी अपेक्षा उनकी संस्कृति इतनी भिन्न है कि हिन्दू-
संस्कृतिको देखकर दर्शकको किसी अन्य संस्कृतिका भ्रम नहीं हो
सकता। और दूसरी बात यह है कि हिन्दुओंमें परस्पर चाहे
जितने भेद हों, उन भेदोंकी अपेक्षा उनकी परस्परसे मिलनेवाली
बातें ही अधिक हैं और इसलिये कोई भी इस बातको अस्वीकार
नहीं कर सकता कि हिन्दुओंका भी सर्वसामान्य एक इतिहास
है, एक साहित्य है और एक संस्कृति है।
"हिन्दुओंका कोई इतिहास नहीं" यह जो अज्ञान-जन्य या
स्वार्थमूलक शंखनाद वर्तमान संसारको सुननेका अभ्यास हो गया
है उससे भरमाये गये लोगोंको यह बात कुछ विपरीतसी प्रतीत
होगी, पर इसमें जरा भी सन्देह करनेका कोई कारण नहीं कि
संसारमें हिन्दू ही एक जाति हैं जिन्होंने अनेक भूदोलोंके धक्के
खाकर और जलप्रलयोंमेंसे होकर भी अपने इतिहासको सुरक्षित
रखा है। यह इतिहास वेदोंसे आरंभ होता है। ये वेद हमारे
जातिके इतिहासका प्रथम अध्याय हैं। प्रत्येक हिन्दू पलनेमें जो
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गीत सुनता है वह सती सीताका गीत है। हमलोगोंमें कुछ
लोग रामचन्द्रको ईश्वरका अवतार मानते हैं, कुछ उन्हें एक
महापुरुष और वीराग्रणी मानते हैं और सब लोग उन्हें अपनी
जातिका अत्यन्त प्रसिद्ध सार्वभौम राजा मानते हैं। हनुमान और
भीमसेन प्रत्येक युवकके लिये अखंड बलदायी और शारीरिक
उन्नतिके आदर्श देवता हैं। सावित्री और दमयन्ती प्रत्येक हिन्दू
स्त्रीके अखंड पातिव्रत और अकलंक प्रेमके ध्येय हैं। गोकुलके
उस ग्वालपर राधाने जो प्रेम किया उसकी प्रतिध्वनि, जहां जहां
हिन्दू-प्रेमी अपनी प्रेमिकाको आलिङ्गन करता है, वहां वहां
उत्थित होती है। कौरव-पांडवोंका महायुद्ध, कर्णार्जुन और
भीम-दुश्शासनके तुमुल द्वंद्व हजारों वर्ष पहले कुरुक्षेत्रमें हुए थे,
पर आज भी एक झोपड़ीसे लेकर महान् राजप्रासादतक हृदयको
विचलित कर देनेवाले रसोंके साथ उन युद्धोंके गीत गाये जाते
हैं। अभिमन्यु अर्जुनको जितना प्रिय चाहे न भी हो, उतना प्रिय
आज हम लोगोंमेंसे प्रत्येक व्यक्तिको है। कन्याकुमारीसे काश्मी-
रतक, उस कमलनेत्र बालवीरके युद्धमें पतन होनेकी वार्ता सुन-
कर अर्जुनने जिस व्याकुलताके साथ क्रन्दन किया होगा, उसी
व्याकुलताके साथ आज भी समग्र हिन्दुस्थान रोकर अश्रुपात
करता है। इससे अधिक और क्या कहें ? मुट्ठीभर बालूके कणों-
की तरह हमें यदि कोई दशों दिशाओंमें फेंककर तितर-बितर कर
दे तौभी अकेले रामायण और महाभारत ये दोही ग्रन्थ हमें
फिरसे एकत्र करके एक जाति बना सकते हैं। हम मेजिनीका
हिन्दुत्वके तीन लक्षण ६५
जीवनचरित पढ़ते हैं तो मुंहसे यह उद्गार निकलता है कि
“देखिये, कैसे देशभक्त हैं ये लोग !” पर जब माधवाचार्यका
जीवनचरित पढ़ते हैं तो यही कह उठते हैं, "हमलोगोंमें इतनी
देशभक्ति और इतनी प्रचण्ड शक्ति है।" पृथ्वीराजकी हारपर
बङ्गाल विलाप करता है; गुरु गोविन्द सिंहके शहीद बच्चोंका हाल
पढ़कर महाराष्ट्रका कंठ रूध जाता है ! उत्तर भारतका आर्य-
समाजी इतिहासकार यह अनुभव करता है कि हरिहर और बुक्क
हमारे लिये लड़े थे; वैसे ही दक्षिण भारतका सनातनी यह अनु-
भव करता है कि गुरु तेगबहादुरने हमारे लिये अपनी जान दी
थी । हमारे राजा एक थे, हमारे राज्य एक थे ; हमारी स्थिति
एक थी, हमारी गति एक थी ; हमारी हार एक थी, हमारी जीत
एक थी । मोकाबसय्या और पिसाल, जयचंद और कालापहाड़
हम लोगोंमें पैदा हुए इससे हम सबकी ही एक साथ गर्दन
झुकती है । अशोक, भास्कराचार्य्य, पाणिनी और कपिलके नाम
हम सबमें चैतन्य उत्पन्न कर देते हैं, उनसे हम अपनेको धन्य
समझते हैं ।
इसपर, कहनेवाले कहेंगे कि हिन्दू हिन्दुओंके बीच आपसकी
लड़ाइयां भी होती रही हैं ! हमारा जवाब यह है कि आपसकी
लड़ाइयां नहीं हुईं किस जातिके अन्दर ? क्या अङ्गरेजोंमें आप-
सकी लड़ाइयां नहीं हुईं ? इटली, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका आदि
देशोंमें एक राज्य दूसरे राज्यसे, एक पन्थ दूसरे पन्थसे, एक
श्रेणीके लोग दूसरी श्रेणीके लोगोंसे जो अभीतक लड़ते-भिड़ते
६६ हिन्दुत्व
चले आ रहे हैं उनका क्या जवाब है ? फिर भी ये एक एक राष्ट्र
हैं और इनका एक एक ही इतिहास है। यदि इनके लिये यह बात
है तो हिन्दुओंकी भी वही बात है। और यदि हिन्दुओंका एक
इतिहास न हो तो संसारमें किसीका भी एक इतिहास नहीं है।
जिस प्रकार इतिहाससे हमें अपनी जातिके पराक्रमोंका
पता चलता है उसी प्रकार अपने साहित्यके सायन्त इतिहास-
से अपनी जातिके विचारोंका आदर्श सामने उपस्थित होता है।
विचार शब्दसे अभिन्न कहा जाता है, और हमारा साहित्य
संस्कृत भाषासे अभिन्न है और इसलिये संस्कृत ही हमारी जन्म-
भाषा है। इसी भाषामें हमारी माताएं बोलती थीं और इसी
भाषासे हमारी सभी वर्तमान भाषाएं निकली हुई हैं। हमारे
देवता संस्कृतमें बोलते थे, हमारे ऋषि संस्कृतमें विचार करते
थे, हमारे कवि संस्कृतमें काव्य करते थे। हम लोगोंमें जो जो
कुछ उत्तम है—उत्तम विचार, उत्तम कल्पना, उत्तम सुभाषित—
वह सब संस्कृतमें ही प्रकट होना चाहता है। करोड़ों मनुष्य अब
भी यही समझते हैं कि हमारे देवता सदा इसी भाषामें बोलते
हैं; अन्य लोग यह समझते हैं कि यह हमारे पूर्वजोंकी भाषा है;
और सब लोग एक मत होकर यही मानते हैं कि यह सर्वोत्तम
भाषा है, यह हम सबकी परम्परासे प्राप्त संपत्ति है, यही हमारी
जमा है और इसीसे गुजराती और गुरुमुखी, सिन्धी और हिन्दी,
तामिल और तेलगु, मराठी और मलयालम्, बङ्गाली और सिंहाली
ये सब एक ही जननीके उदरसे निकली हुई भाषाएं, संपन्न हुई
हिन्दुत्वके तीन लक्षण
६७
। हम सबके मनोविकारों और आकांक्षाओंको स्फूर्त्ति और
प्रोत्साहन देकर एक ही आदर्शकी ओर गति देनेवाली यही
मर्मस्थ ज्ञानशलाका है। यह केवल भाषा नहीं है, बहुतोंके लिये
यह मंत्र है और सबके लिये यह सङ्गीत है। सब जैन वेदोंको
सर्वथा प्रमाण नहीं मानते। पर वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ और
जैनोंकी जननि-जातिके इतिहास होनेसे, उन वेदोंको अपने कहने-
का जितना अधिकार अन्य हिन्दुओंको है उतना ही जैनोंको भी
है। आदिपुराण किसी सनातनी कविका लिखा नहीं है, पर जैन
और सनातनी दोनोंकी यह समान संपत्ति है। बसव पुराण
लिंगायतोंका मुख्य धर्मग्रन्थ है; पर यह कन्नड़ भाषाका सर्वश्रेष्ठ
तथा ऐतिहासिक ग्रन्थ होनेसे इसपर जितना लिङ्गायतोंका
अधिकार है उतना ही अन्य हिन्दुओंका भी। गुरु गोविन्दसिंहके
"विचित्र नाटक" पर बङ्गालके हिन्दुओंका जितना अधिकार है
उतना ही “चैतन्यचरितामृत” पर सिक्खोंका अधिकार है। कालि-
दास और भवभूति, चरक और सुश्रुत, आर्यभट्ट और वराहमिहिर,
भास और अश्वघोष, जयदेव और जगन्नाथ—इन्होंने जो रचनाएं
कीं वे हम सबके लिये कीं, वे हम सबका हृदय अपनी ओर खींचती
हैं और वे हम सबकी संपत्ति हैं। बंगालके किसी हिन्दूके
सामने तमिल भाषाके कवि कंबकी कोई रचना रखिये और
साथ ही हाफिजकी कोई किताब रखिये और उससे पूछिये कि
इन दोनोंमें तुम्हारी चीज कौनसी है तो वह कहेगा, "कंब कवि
मेरे हैं।" महाराष्ट्रके किसी हिन्दूके सामने रवीन्द्रनाथकी रचना
रखिये, साथ ही शेक्सपियरकी; और उससे पूछिये कि इनमें
तुम्हारा कौन है । वह यही कहेगा कि, “रवीन्द्र ! रवीन्द्र मेरे हैं।”
कलाकौशल और वास्तुविद्याके जितने काम हैं वे सब भी
हमारी जातिकी समान संपत्ति हैं, चाहे उनमेंसे कोई वैदिक काल-
के कलादर्शका द्योतक हो या कोई अवैदिक आदर्शका । कारण
जिन मजूरों द्वारा ये तैयार कराये गये, जिन मालिकोंने उनसे ये
काम कराये, जिन करदाताओंने इनके लिये धन दिया और जिन
राजाओंने इन कामोंको आरंभ कराया और उनका प्रबंध किया,
वे वैदिक रहे हों या अवैदिक, थे इसी महान् हिन्दू-जातिके
जिसका वासस्थान सिन्धुसे सिन्धुपर्यन्त यह सारा हिन्दुस्थान
है । आज जो सनातनी हैं उन्होंने ही बौद्धकालमें बौद्धोंके:
स्तूप, विहार और भवन निर्माण करनेमें मिहनत-मजूरी और
धनसे सहायता की; और उस समय जो बौद्ध थे उन्होंने ही अब
सनातनधर्मकी मूर्तियां और मन्दिर निर्माण करनेमें हाथ
लगाया ।
छोटी छोटी बातोंमें चाहे परस्पर कितनी ही भिन्नता क्यों न
हो, हम सब हिन्दुओंके समान संस्कार और आचार-विचार रहे
हैं और उनका नियामक नियम भी एक ही रहा है। ये संस्कार-
आचार-विचार और यह नियम ये ही दो बातें हम सब हिन्दुओं-
की मूलभूत एकताके कार्य और कारण दोनों हैं। हिन्दू-व्यवहार-
शास्त्रके आधारपर बना हुआ हिन्दू-धर्मशास्त्र, आपाततः
उसमें अनेक भेद और यत्र-तत्र परस्पर विरोध होनेपर भी, इतना
हिन्दुत्वके तीन लक्षण [६६]
जबरदस्त है कि देश-काल और परिस्थितिसे अनेकों उलटफेर
होनेपर भी उसका मूल विशिष्टरूप ज्यों-का-त्यों स्थिर है। अमे-
रिका और ब्रिटिश कामनवेल्थके कानून बनानेवाले यंत्र यद्यपि
नित्य नये नये कानून निकालते जा रहे हैं तथापि हम लोग
अबतक अपने धर्मशास्त्रके मूलतत्त्वों और उसकी विशिष्ट विकास-
पद्धतिको ही मानते आ रहे हैं। मुसलमानी व्यवहार-पद्धति
भी अपनी विशिष्टता लिये हुई है, यद्यपि खोजा या बोहरा तथा
इसी मेलके अन्य मुसलमान भी अनेक बातोंमें मुसलमानी कानूनके
विपरीत हिन्दू-व्यवहार-शास्त्रको ही मानते हैं। महाराष्ट्रके कुछ
हिन्दू-व्यवहार पंजाबके हिन्दुओंके आचार-व्यवहारोंसे भिन्न हो
सकते हैं; पर पंजाब और महाराष्ट्र, सिन्ध और बङ्गाल आदि
सभी प्रदेशोंके हिन्दुओंमें व्यवहारोंकी समता इतनी अधिक है कि
महाराष्ट्रमें मानी जानेवाली स्मृतिका वचन बङ्गालमें मानी
जानेवाली स्मृतिके वचनकी प्रतिध्वनिमात्र होती है, बङ्गालमें
धर्मशास्त्रका जो विधान मिलता है वह महाराष्ट्रके धर्मशास्त्र-
विधानका प्रतिबिंबमात्र होता है। हिन्दू-जातिके सब समाजोंद्वारा
माने जानेवाले सब नियमों, रिवाजों और व्यवहारोंको एकत्र
करके देखा जाय तो यह तुरंत दिखायी देगा कि यह तो हिन्दू-
धर्मशास्त्रका ही एक सम्यक अध्याय है। परंतु ऐसी कोई
बात अंगरेजी, मुसलमानी या जापानी धर्मशास्त्र-संग्रहमें न
दिखायी देगी, चाहे कोई कितनी ही बुद्धि लगाकर खींच-तान या
अर्थका अनर्थ करके ऐसा दिखानेका प्रयत्न करे।
१०० हिन्दुत्व
हम हिन्दुओंके उत्सव और त्योहार एक हैं। हमारे विधि
और संस्कार एक हैं। दशहरा और दिवाली, रक्षा-बन्धन और
होलीका, जहां जहां हिन्दू हैं, वहां वहां सानन्द स्वागत है।
दिवालीके दिन, चाहे कोई सिख हो या जैन, ब्राह्मण हो या पंचम,
समग्र हिन्दू-जाति आनन्दोत्फुल्ल हो उठती है; और यह केवल
हिन्दुस्थानमें ही नहीं, बल्कि उस बृहत् हिन्दुस्थानमें भी जो
संसारके सब देशोंमें अपने पैर फैला रहा है। तराईके जंगलतकमें
एक कुटी भी ऐसी दिखायी न देगी जिसने उस दिन दीप-
दान न किया हो। उसी प्रकार राखीबन्धनके दिन पंजाबकी
प्रसन्नवदना कुमारिकाओंसे लेकर मद्रासके कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंतक
सबके हृदयमें प्रेमका समुद्र उमड़ आता है और एक दूसरेके हाथ-
में राखी बांधते हुए वे सच ही कहते हैं, "भाई भाई एक ठाईं।
भेद नाई भेद नाई ॥" फिर भी हमने उन धार्मिक मनःसंस्कारों-
का यहां उल्लेख भी नहीं किया जो हम सबके समान मनः-
संस्कार हैं, अथवा किसी रीति-नीतिका भी धार्मिक विशिष्टताकी
दृष्टिसे विचार नहीं किया; कारण, हिन्दुत्वके मूलभूत तत्वोंका
विचार किसी धार्मिक दृष्टिसे नहीं बल्कि जातीय दृष्टिसे ही
करना था, तथापि राष्ट्रीय अथवा जातीय दृष्टिसे भी हमारे ये
भिन्न भिन्न तीर्थस्थान हमारी जातिकी सर्वसामान्य परंपरागत
संपत्ति हैं यह स्पष्ट है। जगन्नाथकी रथ-यात्रा, अमृतसरकी
वैशाखी, कुंभ और अर्धकुंभी ये सब हम लोगोंके सच्चे और
जीवित महासम्मेलन ही थे और उनसे हमारे जीवन और विचारों-
हिन्दुत्वके तीन लक्षण १०१
का प्रवाह राष्ट्र-शरीरमें सदा ही प्रवाहित रहा करता था।
इन यात्राओं और मेलोंमें बहुतसी ऐसी बातें हैं जिन्हें कुछ लोग
शास्त्र और धर्म समझकर और कुछ लोग सामाजिक उत्सवके
प्रसङ्ग जानकर पालन करते हैं। पर सबके हृदयपर इन मेलों
और यात्राओंके जिस तत्वकी छाप लग जाती है वह तत्व यही
है कि हमारा जीवन सर्वसम्पन्न होनेके लिये यदि कोई बात
अत्यन्त प्रयोजनीय है तो वह इस समय हिन्दू-जातिके अखण्ड
और एकीभूत जीवनका ही अस्तित्व है।
संक्षेपमें ये ही बातें हैं—प्रतिपाद्य विषय इसके आगे बढ़ने भी
नहीं देता—जो हमारी संस्कृतिके आधारभूत तत्वकी बातें हैं और
जिनके कारण हमारी सांस्कृतिक एकता सिद्ध है। हम हिन्दू
केवल एक राष्ट्र और केवल एक जाति ही नहीं हैं, बल्कि इन
दोनों बातोंके फलस्वरूप हमारी एक ही संस्कृति भी है जिसकी
अभिव्यक्ति और रक्षा, मुख्यतः और मूलतः, संस्कृतके द्वारा हुई है,
जो संस्कृत हमारी जातिकी सच्ची जन्मभाषा है। प्रत्येक मनुष्य
जो हिन्दू है इस संस्कृतिका उत्तराधिकारी है, और उसका
आध्यात्मिक जन्म इसी संस्कृतिसे होता है जैसे उसका भौतिक
जन्म उसकी जन्मभूमि और पूर्वजोंके रक्तसे होता है।
अतएव हिन्दू वह है जो सिन्धुसे सिन्धुपर्यन्त फैले हुए इस
देशको अपना पितृदेश मानकर पूजता हो; जिसके शरीरमें उस
महान् जातिका रक्त प्रवाहित हो रहा हो जिसका मूल वैदिक
सप्तसिन्धुओंमें सर्वप्रथम देख पड़ता है और जो “हिन्दू” नामसे
१०२ हिन्दुत्व
संसारमें विख्यात हुई; और जो हिन्दुस्थानको अपनी पितृभूमि
और हिन्दू जातिको अपनी जाति माननेके कारण उस हिन्दू-
संस्कृतिको अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृति समान इतिहास,
समान पूर्व परंपरा और पूज्य पूर्वपुरुष, समान साहित्य, समान
शिल्पशास्त्र, समान धर्मशास्त्र, समान पर्व और उत्सवोंद्वारा
प्रकट होती है। प्रत्येक हिन्दू इन सब बातोंको अन्य सब हिन्दू-
ओंके साथ एक ही रूप और प्रकारसे मानता हो यह इसका
मतलब नहीं; बल्कि यह मतलब है कि हिन्दू-संस्कृतिकी इन
बातोंमें प्रत्येक हिन्दू अपने अन्य हिन्दू-भाइयोंके साथ ऐसा समान
भाव अनुभव करता है जैसा कोई अरब या अंगरेज नहीं करता।
कोई अहिन्दू भी इन बातोंमेंसे किसी किसी बातमें हिन्दुओंकासा
भाव रख सकता है, पर ऐसा समान भाव उसमें जितना हो
सकता है उससे हिन्दुओंसे विसदृश-विषम भाव ही उसमें
अधिक होता है। इसीलिये वे क्रिस्तान और मुसलमान, जो कुछ
काल पूर्व हिन्दू थे और धर्मान्तर होनेके बाद कमसे कम पहला
पीढ़ीमें अपने नये संप्रदायके लाचार अनुयायी ही थे, हिन्दु-
स्थानको अपना पितृदेश मानते और अपने शरीरमें शुद्ध रक्त
होनेका दावा कर सकते हैं पर वे हिन्दू नहीं कहला सकते;
कारण नया "धर्म" स्वीकार करके उन्होंने हिन्दू-संस्कृतिको
मानना छोड़ दिया। उनके पूर्वपुरुष, उनके पूर्वज-पूजनकी पद्धति,
उनके पर्व और उत्सव, उनके आदर्श और जीवन-संस्कार हिन्दु-
ओंके नहीं रहे ! इस तरह हिन्दुत्वकी जो तीसरी बात है कि
हिन्दुत्वके तीन लक्षण [१०३]
वह हिन्दू-जातिकी संस्कृतिको माननेवाला हो उससे हम हिन्दुत्व-
का ऐसा लक्षण बांध सकते हैं जिसमें अतिव्याप्तिका जरा भी
दोष न हो ।
अब किसी ऐसे बोहरा या खोजा मुसलमानका उदाहरण
लीजिये जो देशभक्त हो । वह उस हिन्दुस्थानको अपना पितृ-
देश मानकर पूजता है जो वास्तवमें उसके पूर्वजोंका देश था ।
उसमें शुद्ध हिन्दू-रक्त भी है जैसे अनेक मुसलमानोंमें होता
है, खासकर ऐसे मुसलमानोंमें जो नये नये मुसलमान बने हों ।
इस तरह यह भी मान लें कि उसमें शुद्ध हिन्दू-रक्त भी है । अब
यह भी मान लीजिये कि वह आदमी समझदार है और इस देश-
के इतिहासको ही अपना इतिहास और हमारे पूर्वजोंको अपने
पूर्वज मानता है (और सचमुच ही बोहरे और खोजे दशमहा-
वतारोंको मानते हैं और ग्यारहवाँ अवतार महम्मदका कह कर
उसमें जोड़ते हैं)। उनका दायविभाग हिन्दूधर्मशास्त्रके अनु-
सार ही होता है। इस प्रकार राष्ट्र, जाति और संस्कृति ये जो
तीन बातें हिन्दुत्वकी हैं उन तीनोंमें वह हिन्दू है। कुछ पर्व और
उत्सव उसके भिन्न हैं; उसके देवताओं और महापुरुषोंमें कुछ नये
देवता और महापुरुष आकर और जुट गये होंगे । पर, हम बराबर
यह कहते आये हैं कि छोटी-छोटी बातोंमें यत्र-तत्र कुछ भिन्नता
हो जानेसे कोई हिन्दू-संस्कृतिके मंडलसे बहिष्कृत नहीं हो जाता।
हिन्दू-जातिके अन्दर अनेक ऐसी उपजातियां हैं जिनके अनेक
रिवाज परस्परसे भिन्न ही नहीं बल्कि परस्पर विरुद्ध भी हैं।
१०४ हिन्दुत्व
फिर भी वे सब हिन्दू हैं। उसी प्रकार स्वदेशको स्वदेश मानने-
वाले बोहरा या खोजा या कोई ईसाई जिनमें हिन्दुत्वके ये तीनों
लक्षण इस हदतक मौजूद हों वे हिन्दू क्यों न माने जायँ ?
ऐसे लोग सचमुच हिन्दू माने जा सकते थे। परंतु हिन्दुत्व-
के एक विशिष्ट लक्षणकी कसौटीपर कसनेसे उनका हिन्दू कहा-
नेका अधिकार नष्ट हो जाता है। वह विशिष्ट लक्षण हिन्दू-
संस्कृतिके अन्दर आ जा सकता है। पर वह इतना महत्वपूर्ण है
कि हिन्दू-संस्कृतिकी अन्य बातोंमें वह लुप्त नहीं किया जा
सकता। इसीलिये उसका विशेष विवेचन करना आवश्यक है।
इस विवेचनमें हिन्दुत्वके धार्मिक स्वरूपकी ओर ध्यान देनेकी
आवश्यकता होगी। याहांतक हमने जो कुछ प्रतिपादन किया
उसमें इस बातका विचार नहीं किया, इसलिये नहीं कि ऐसा
करनेमें हम किसी प्रकार सकुचते थे, बल्कि इसलिये कि
हिंदुत्वके लक्षणोंका विवेचन अधिक सांगोपांग और परिणाम-
कारक करनेके लिये हमने धार्मिक पहलूके विचारके लिये एक
पृथक् अध्याय ही रख छोड़ा है। सब पहलुओंसे इस विषयका
विचार करनेकी सामग्री याहांतक पूरे तौरपर जुट गयी है और अब
“हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंके बीच क्या अन्तर है, यह
निश्चित करनेका काम अधिक सुलभ होनेवाला है।
( ६ )
हिन्दुत्वकी परिभाषा
“हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” ये दोनों शब्द “हिन्दू” शब्दसे
निकले हुए हैं, इसलिये उनका अर्थ समग्र हिन्दू-जातिसे सम्बन्ध
रखनेवाला होता है। हिन्दू-धर्मकी जिस किसी परिभाषामें
हमारी जातिका कोई भी अंग छूट जाय अथवा उसे अपने
धार्मिक संस्कारोंको छिपा रखना पड़े वह परिभाषा किसी काम-
की न होगी। हिन्दू-धर्म वह धर्म है जो सब हिन्दुओंका सामान्य
धर्म है। यह सामान्य हिन्दू-धर्म क्या है यह जाननेके लिये हमें
यह जानना होगा कि हम हिन्दू कहते किसको हैं—हिन्दू-शब्दकी
परिभाषा क्या है। परंतु इस बातको भूलकर कि हिन्दू कौन है
यह जाननेका मुक्त मनसे प्रयत्न किये बिना हिन्दू-धर्मकी
परिभाषा नहीं हो सकती, बहुतसे लोग हिन्दू-धर्मकी ही पहले
व्याख्या करने लग जाते हैं और हिन्दू-धर्मके कोई ऐसे लक्षण नहीं
पाते जिनमें अतिव्याप्तिका दोष न हो और जिनमें सब हिन्दू-
समाजोंका समावेश हो जाय। परिणाम यह होता है कि
उन्हें ऐसे सर्व सामान्य लक्षण नहीं मिलते और लाचार होकर वे
इस नतीजेपर पहुंचते हैं कि अमुक जातियां हिन्दू ही नहीं हैं!
“हिन्दू ही नहीं हैं” इसलिये नहीं कि जिन लक्षणोंकी कसौटी-
[१०६] हिन्दुत्व
पर इन्हें कसनेका प्रयत्न किया जाता है उनमें कोई अव्याप्ति दोष
हो, बल्कि इसलिये कि ये जातियां उन बातोंको धर्म ही नहीं
मानतीं जिनपर ये लोग अपने मनसे ही हिन्दू-धर्मकी छाप लगाना
चाहते हैं ! “हिन्दू कौन है ?” इस प्रश्नका उत्तर देनेकी यह
सचमुच ही उलटी रीति है और इससे सिख, जैन, देवसमाजी,
यहांतक कि देशाभिमानी और प्रगतिशील आर्य-समाजियोंको
भी मनःक्षोभ होता है ।
हिन्दू कौन है ? —वही जो हिन्दू-धर्म मानता है। बहुत ठीक।
पर हिन्दू-धर्म क्या है ? वे तत्व और नियम जिन्हें हिन्दू
मानते हैं ! परन्तु इस तरह इस प्रश्नको हल करना तो एक चक्कर-
के पीछे चक्कर लगाना है। इससे कोई निर्णय नहीं हो सकता ।
इस तरह भटके हुए बहुतसे लोग लौटकर आके कहते हैं, “हिन्दू
तो कोई है ही नहीं” ! जिस अंगरेजने ‘हिन्दूइज्म’ शब्द गढ़ा
वैसी ही बुद्धि रखनेवाला कोई अंगरेज यदि “इंग्लिशिज्म” शब्द
गढ़े और अंगरेज-जातिके अन्दर उस “इंग्लिशिज्म (आंग्ल-धर्मके)”
शब्दाधारपर अंगरेजोंके सर्वसामान्य धर्मसिद्धान्तोंकी जांच करने
निकले और त्रिमूर्तिके तत्वसे लेकर उपयुक्तताके तत्वज्ञानतक
और ज्यू लोगोंसे जैकोबिन लोगोंतक अनेक मतों और पंथोंको
देख घबरा जाय और निराश होकर यह कहे कि, “न ! अंगरेज
तो कोई इस पृथ्वी-तलपर है ही नहीं” ! ऐसा कहनेवाला
अंगरेज जितना हास्यास्पद होगा उतना ही हास्यास्पद वह
हिन्दू भी है जो कहता है कि, “हिन्दू तो कोई मनुष्य-समाज ही
हिन्दुत्वकी परिभाषा १०७
नहीं है !” इस चक्करमें भटकनेवालोंकी कैसी फजीहत होती
है और “हिन्दुत्व” और “हिन्दू-धर्म” इन दोनोंका भेद ध्यानमें
न रखनेसे कैसी गड़बड़ मचती है यह जिस किसीको देखना हो
वह प्रकाशन-पराक्रम करनेवाली नटेशन कंपनीकी “हिन्दुइजमके
लक्षण” नामक अंगरेजी पुस्तक एक बार देख ले।
हिन्दू-धर्मका अर्थ है हिन्दुओंका धर्म; और हिन्दू-शब्द
“सिन्धु” से निकला हुआ होनेके कारण उसका मूल अर्थ उन
लोंगोसे है जो सिन्धु नदीसे सिन्धु-सागर पर्यन्तके देशमें बसते हैं
और इसलिये हिन्दू-धर्मका उसी धर्म या उन्हीं धर्मों से मतलब है
जो इस देश और इस जातिके सहजात धर्म हैं। यदि इन भिन्न-
भिन्न धर्मसिद्धान्तों और आचारोंके आधारभूत कोई समन्वय
हम न देख सकें तो हमें यह कहना होगा कि हिन्दू-धर्म कोई
सामान्य धर्म नहीं है, बल्कि यह कई ऐसे धर्म-सम्प्रदायोंका
समूह है जो संप्रदाय परस्परसे भिन्न अथवा परस्परके विरोधी
भी हैं। पर सामान्य हिन्दू-धर्मकी पहचान करनेमें असमर्थ
होकर कोई किसी भी हालतमें यह नहीं कह सकता कि हिन्दू तो
कोई राष्ट्र या मानव समाज ही नहीं है, न कोई किसी हिन्दू-संप्र-
दायको यह कहकर चोट पहुंचा सकता है कि अमुक संप्रदाय
हिन्दू ही नहीं है।
इस प्रबन्धकी मर्यादा हमें विस्तारसे हिन्दू-धर्मके लक्षणोंकी
चर्चा करनेका अवसर नहीं देती। हम ऊपर यह कह चुके हैं कि
“हिन्दू-धर्म क्या है ?” इसकी जांच तो तब आरम्भ हो सकती
१०८ . हिन्दुत्व
है जब हिन्दुत्वके लक्षण निश्चित करके यह सम्यक् रूपसे जाना
जाय कि “हिन्दू कौन है?” और यहां हमें हिन्दुत्वके उन लक्षणों-
को देखना है जिनसे हम यह जान सकें कि हिन्दू कौन है; अर्थात्
हिन्दू-धर्मके लक्षणोंकी चर्चा इस प्रबंधकी मर्यादाके बाहरका
विषय है। यहां उसका उतने ही अंशमें विचार करना होगा जितने
अंशमें प्रस्तुत प्रतिपाद्य विषयके साथ उसका संबंध है। हिन्दू-धर्म
किसी एक धर्म-सम्प्रदायका नाम नहीं प्रत्युत उन सब संप्र-
दायोंका समष्टिरूप नाम है जो संप्रदाय अपनेको हिन्दू मानते
हैं। परन्तु साधारणतः “हिन्दू-धर्म” इन शब्दोंका प्रयोग उस
धर्म-संप्रदायके लिये किया जाता है जिसे हिन्दुओंमेंसे अधि-
कांश लोग मानते हैं। यह स्वाभाविक है कि किसी धर्म-संप्रदाय,
देश या जातिका नाम उस धर्म, देश या जातिके किसी ऐसे
विशिष्ट स्वरूपपर रखा जाय जिस स्वरूपको अधिकांश लोग
मानते हैं। नित्यके व्यवहारमें इससे बड़ा सुभीता भी होता
है। परन्तु इस प्रकारसे कोई नाम सुभीतेका होनेपर भी यदि
उससे भ्रम फैलता हो, हानि होती हो तो केवल सुभीतेके ख्याल-
से अपनी न्यायान्याय-विवेक-बुद्धिको अन्ध न होने देना चाहिये।
हिन्दुओंमें अधिकांश लोग “श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म” अथवा
“सनातनधर्म” नामसे जो पुकारा जाता है उस धर्मके मानने-
वाले हैं। इस धर्मको यदि “वैदिकधर्म” कहें तो इसमें भी कोई
आपत्ति नहीं हो सकती। परन्तु, इस बहुजन-समाजके अतिरिक्त
ऐसे भी कुछ हिन्दू हैं जो कुछ पुराणोंको सर्वथा या अंशतः नहीं
हिन्दुत्वकी परिभाषा १०६
मानते, कुछ ऐसे हैं जो कुछ स्मृतियोंको नहीं मानते और कुछ
ऐसे हैं जो श्रुतियोंतकको नहीं मानते । परन्तु यदि आप बहुजन-
समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानते और उसका नाम "कट्टर
हिन्दू-धर्म" रखते हैं तो जो अन्य सद्भिन्न धर्म-संप्रदाय हैं उन्हें
इस तरह अपना हिन्दुत्वके दायरेसे अन्यायपूर्वक बाहर किया
जाना और बहुजन-समाजका हिन्दुत्वका इजारा ले लेना कभी
अच्छा नहीं लगता और यह ठीक भी है। अल्प-संख्यक संप्रदायों-
का भी कुछ नाम होना चाहिये । पर जब आप कट्टर सनातन-
धर्मको ही हिन्दू-धर्म मानेंगे तो इसका यह मतलब होगा कि
जो कट्टर सनातनधर्म नहीं है वह हिन्दू-धर्म नहीं है ! और इसके
बाद फिर यह भी हुआ कि सनातनधर्मसे भिन्न संप्रदायवाले
हिन्दू ही नहीं हैं ! परन्तु यह निर्णय उन लोगोंको भी असह्य
मालूम होता है जो इस वादके पूर्व पक्षको मानकर उस निग्रह-
कोटिमें पहुंचते हैं जहां वे ठहरना नहीं चाहते, पर जहांसे निक-
लना भी नहीं जानते ! इस तरहसे हमारे लाखों सिख, जैन,
लिंगायत और आर्यसमाजी भाई, यदि उनसे कहा जाय कि
अब आप लोग हिन्दू नहीं रहे तो इसे अपना अपमान समझेंगे
और इससे उन्हें बड़ा क्रोध होगा । परन्तु इसके साथ ही इन्हीं
लोगोंमें कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह मान बैठे हैं कि हिन्दू होना-
अपने बापदादोंकी जातिमें बने रहना यही है कि जिन अन्ध-
विश्वासकी बातोंको हम नहीं मानते उन्हें मानें अथवा अपनी
जातिसे अलग हो जायँ ।
११० हिन्दुत्व
इस प्रकार वैमनस्य उत्पन्न होनेका कारण अधिकांशमे यही
है कि बहुजन-समाजके धर्मको ही हिन्दू-धर्म कहनेमें भूल हुई है।
या तो इस शब्दका अनुचित अर्थ करके हिन्दुओंके सब संप्रदा-
योंको ही हिन्दू-धर्म कहना चाहिये, या ऐसा न कर सकें तो इस
शब्दका व्यवहार ही बन्द कर देना चाहिये। बहुजन-हिन्दू-समा-
जके धर्मका परंपरासे चला आया हुआ जो "सनातनधर्म" या
"श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्म" अथवा "वैदिक धर्म" नाम है वह
बहुत ठीक है; बाकी जो अन्य संप्रदाय हैं वे अपने नामसे प्रसिद्ध
हैं ही, जैसे सिख-धर्म, आर्य-धर्म, जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म इत्यादि।
जब इन सब धर्मोंका अन्तर्भाव एक ही नाममें करनेकी आवश्य-
कता होती है तभी उन सबको एक साथ उनके सर्वसामान्य
नाम "हिन्दू-धर्म" से अभिहित करना समुचित होता है। ऐसा
करनेसे अर्थ भी स्पष्ट होता है, छोटेसे नाममें अभिप्राय भी पूरा
व्यक्त हो जाता है और कोई संदिग्धता भी नहीं रह जाती। इससे
अल्पसंख्यक लोगोंके मनका सन्देह और बहुसंख्यक लोगोंके
चित्तका असन्तोष दोनोंका ही निवारण हो जाता है और वह
अवसर मिलता है जब हम सब हिन्दू एक प्राण होकर, एक
जाति और एक संस्कृतिकी पुराण-पवित्र वैभवसंपन्न विजयवै-
जयन्तीके नीचे बन्धु-बन्धुके नाते एक होकर रहते हैं।
अखिल मानव-जातिकी बात छोड़ दें और केवल हिन्दुओंका ही
विचार करें तौभी यह स्पष्ट है कि हिन्दू-जातिमेंसे किसी भी समाज
के धार्मिक विचारों और संस्कारोंके सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं।