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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 167 में से

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पृष्ठ 119

हिन्दुत्वके तीन लक्षण [१०३]

वह हिन्दू-जातिकी संस्कृतिको माननेवाला हो उससे हम हिन्दुत्व-
का ऐसा लक्षण बांध सकते हैं जिसमें अतिव्याप्तिका जरा भी
दोष न हो ।
अब किसी ऐसे बोहरा या खोजा मुसलमानका उदाहरण
लीजिये जो देशभक्त हो । वह उस हिन्दुस्थानको अपना पितृ-
देश मानकर पूजता है जो वास्तवमें उसके पूर्वजोंका देश था ।
उसमें शुद्ध हिन्दू-रक्त भी है जैसे अनेक मुसलमानोंमें होता
है, खासकर ऐसे मुसलमानोंमें जो नये नये मुसलमान बने हों ।
इस तरह यह भी मान लें कि उसमें शुद्ध हिन्दू-रक्त भी है । अब
यह भी मान लीजिये कि वह आदमी समझदार है और इस देश-
के इतिहासको ही अपना इतिहास और हमारे पूर्वजोंको अपने
पूर्वज मानता है (और सचमुच ही बोहरे और खोजे दशमहा-
वतारोंको मानते हैं और ग्यारहवाँ अवतार महम्मदका कह कर
उसमें जोड़ते हैं)। उनका दायविभाग हिन्दूधर्मशास्त्रके अनु-
सार ही होता है। इस प्रकार राष्ट्र, जाति और संस्कृति ये जो
तीन बातें हिन्दुत्वकी हैं उन तीनोंमें वह हिन्दू है। कुछ पर्व और
उत्सव उसके भिन्न हैं; उसके देवताओं और महापुरुषोंमें कुछ नये
देवता और महापुरुष आकर और जुट गये होंगे । पर, हम बराबर
यह कहते आये हैं कि छोटी-छोटी बातोंमें यत्र-तत्र कुछ भिन्नता
हो जानेसे कोई हिन्दू-संस्कृतिके मंडलसे बहिष्कृत नहीं हो जाता।
हिन्दू-जातिके अन्दर अनेक ऐसी उपजातियां हैं जिनके अनेक
रिवाज परस्परसे भिन्न ही नहीं बल्कि परस्पर विरुद्ध भी हैं।