हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुत्वके तीन लक्षण ६३
है, वह पातुआ जातिकी स्त्रियोंके नंगे कमरबन्दमें लटकनेवाले
पत्तोंके नोमलहंगेकी ही नकल है।
पर इसपर भी डुंगी डुंगी ही है और ड्रेडनाट ड्रेडनाट ही
है। इन दोनोंमें सादृश्यकी अपेक्षा वैदृश्य ही अधिक है और इस-
लिये वह सादृश्य जो है नहींके बराबर हो जाता है। उसी प्रकार
अन्य देशवासियोंके समान हिन्दुओंने भी संसारको बहुतसी
बातें दी हैं और बहुतसी ली भी हैं, तथापि अन्य देशवासियोंकी
संस्कृतिकी अपेक्षा उनकी संस्कृति इतनी भिन्न है कि हिन्दू-
संस्कृतिको देखकर दर्शकको किसी अन्य संस्कृतिका भ्रम नहीं हो
सकता। और दूसरी बात यह है कि हिन्दुओंमें परस्पर चाहे
जितने भेद हों, उन भेदोंकी अपेक्षा उनकी परस्परसे मिलनेवाली
बातें ही अधिक हैं और इसलिये कोई भी इस बातको अस्वीकार
नहीं कर सकता कि हिन्दुओंका भी सर्वसामान्य एक इतिहास
है, एक साहित्य है और एक संस्कृति है।
"हिन्दुओंका कोई इतिहास नहीं" यह जो अज्ञान-जन्य या
स्वार्थमूलक शंखनाद वर्तमान संसारको सुननेका अभ्यास हो गया
है उससे भरमाये गये लोगोंको यह बात कुछ विपरीतसी प्रतीत
होगी, पर इसमें जरा भी सन्देह करनेका कोई कारण नहीं कि
संसारमें हिन्दू ही एक जाति हैं जिन्होंने अनेक भूदोलोंके धक्के
खाकर और जलप्रलयोंमेंसे होकर भी अपने इतिहासको सुरक्षित
रखा है। यह इतिहास वेदोंसे आरंभ होता है। ये वेद हमारे
जातिके इतिहासका प्रथम अध्याय हैं। प्रत्येक हिन्दू पलनेमें जो