हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ हिन्दुत्व
संसारमें विख्यात हुई; और जो हिन्दुस्थानको अपनी पितृभूमि
और हिन्दू जातिको अपनी जाति माननेके कारण उस हिन्दू-
संस्कृतिको अपनी संस्कृति मानता है जो संस्कृति समान इतिहास,
समान पूर्व परंपरा और पूज्य पूर्वपुरुष, समान साहित्य, समान
शिल्पशास्त्र, समान धर्मशास्त्र, समान पर्व और उत्सवोंद्वारा
प्रकट होती है। प्रत्येक हिन्दू इन सब बातोंको अन्य सब हिन्दू-
ओंके साथ एक ही रूप और प्रकारसे मानता हो यह इसका
मतलब नहीं; बल्कि यह मतलब है कि हिन्दू-संस्कृतिकी इन
बातोंमें प्रत्येक हिन्दू अपने अन्य हिन्दू-भाइयोंके साथ ऐसा समान
भाव अनुभव करता है जैसा कोई अरब या अंगरेज नहीं करता।
कोई अहिन्दू भी इन बातोंमेंसे किसी किसी बातमें हिन्दुओंकासा
भाव रख सकता है, पर ऐसा समान भाव उसमें जितना हो
सकता है उससे हिन्दुओंसे विसदृश-विषम भाव ही उसमें
अधिक होता है। इसीलिये वे क्रिस्तान और मुसलमान, जो कुछ
काल पूर्व हिन्दू थे और धर्मान्तर होनेके बाद कमसे कम पहला
पीढ़ीमें अपने नये संप्रदायके लाचार अनुयायी ही थे, हिन्दु-
स्थानको अपना पितृदेश मानते और अपने शरीरमें शुद्ध रक्त
होनेका दावा कर सकते हैं पर वे हिन्दू नहीं कहला सकते;
कारण नया "धर्म" स्वीकार करके उन्होंने हिन्दू-संस्कृतिको
मानना छोड़ दिया। उनके पूर्वपुरुष, उनके पूर्वज-पूजनकी पद्धति,
उनके पर्व और उत्सव, उनके आदर्श और जीवन-संस्कार हिन्दु-
ओंके नहीं रहे ! इस तरह हिन्दुत्वकी जो तीसरी बात है कि