हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुत्वके तीन लक्षण [६६]
जबरदस्त है कि देश-काल और परिस्थितिसे अनेकों उलटफेर
होनेपर भी उसका मूल विशिष्टरूप ज्यों-का-त्यों स्थिर है। अमे-
रिका और ब्रिटिश कामनवेल्थके कानून बनानेवाले यंत्र यद्यपि
नित्य नये नये कानून निकालते जा रहे हैं तथापि हम लोग
अबतक अपने धर्मशास्त्रके मूलतत्त्वों और उसकी विशिष्ट विकास-
पद्धतिको ही मानते आ रहे हैं। मुसलमानी व्यवहार-पद्धति
भी अपनी विशिष्टता लिये हुई है, यद्यपि खोजा या बोहरा तथा
इसी मेलके अन्य मुसलमान भी अनेक बातोंमें मुसलमानी कानूनके
विपरीत हिन्दू-व्यवहार-शास्त्रको ही मानते हैं। महाराष्ट्रके कुछ
हिन्दू-व्यवहार पंजाबके हिन्दुओंके आचार-व्यवहारोंसे भिन्न हो
सकते हैं; पर पंजाब और महाराष्ट्र, सिन्ध और बङ्गाल आदि
सभी प्रदेशोंके हिन्दुओंमें व्यवहारोंकी समता इतनी अधिक है कि
महाराष्ट्रमें मानी जानेवाली स्मृतिका वचन बङ्गालमें मानी
जानेवाली स्मृतिके वचनकी प्रतिध्वनिमात्र होती है, बङ्गालमें
धर्मशास्त्रका जो विधान मिलता है वह महाराष्ट्रके धर्मशास्त्र-
विधानका प्रतिबिंबमात्र होता है। हिन्दू-जातिके सब समाजोंद्वारा
माने जानेवाले सब नियमों, रिवाजों और व्यवहारोंको एकत्र
करके देखा जाय तो यह तुरंत दिखायी देगा कि यह तो हिन्दू-
धर्मशास्त्रका ही एक सम्यक अध्याय है। परंतु ऐसी कोई
बात अंगरेजी, मुसलमानी या जापानी धर्मशास्त्र-संग्रहमें न
दिखायी देगी, चाहे कोई कितनी ही बुद्धि लगाकर खींच-तान या
अर्थका अनर्थ करके ऐसा दिखानेका प्रयत्न करे।