घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
७८ / घट रामायण
सीता दसरथ राम कहाये। ये सब घट भीतर दरसाये॥
सरजू सुरति अवध दस द्वारा। ये घट भीतर देखि निहारा॥
रावन कुम्भ लंकपति राई। त्रिकुटी ब्रह्म बसे तेहि माहीं॥
रावन ब्रह्म कहा हम जोई। त्रिकुटी लंक ब्रह्म है सोई॥
मन्दोदरी भभीषन भाई। इन्द्रजीत सुत त्रिकुटी माहीं॥
ये संबाद कहा घट माहीं। रामायन घट माहिं बनाई॥
जो कोइ अंध जीव नहिं मानै। पुनि पुनि परै नरक की खानै॥
संतन की गति कोइ न जानै। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखानै॥
उनकी गति मति कोइ कोइ जानै। बिन सतसंग नहीं पहिचानै॥
उनकी कृपा दृष्टि जब होइ। तब अदृष्ट को बूझै सोई॥
पिंड ब्रह्मांड सैल कोइ पावै। तब सतगुरु सत दया लखावै॥
अब ब्रह्माण्ड की कहौं लखाई। कोइ कोइ साधू बिरले पाई॥
जो कोइ भये अधर में लीना। जिन को आया संत अकीना॥
जिन जिन सुरति सैल घट कीन्हा। ता की गति मति बिरलै चीन्हा॥
अब मैं अपनी कहौं दृढ़ाई। सुरति सैल घट माहिं लखाई॥
रावन राम सकल परिवारा। ये घट भीतर चुनि चुनि मारा॥
और अनेक कहे बहु भाँती। ये सब माया की उतपाती॥
ये मत सत्त सत्त जिन माना। उनका आवागवन नसाना॥
या में कोई भर्म जो लावै। बार-बार चौरासी पावै॥
मैं अपने अस देख बखानी। संत कृपा से महुँ पुनि जानी॥
अब ब्रह्मांड पिंड कर लेखा। भाखा जोड़ निज नैनन देखा॥
अर्थ-अब मैं उस निष्कामी तथा अक्षर शून्य परम तत्त्व का वर्णन करता हूँ। अपनी सुरति ज्ञान से
जुड़े नाम का वर्णन करता हूँ। जिसको समझने या साधना करने से जीव माया से मुक्त हो कर इस
भवसागर से पार हो उठता है॥
संतों की कृपा से सत्संगति होती है और वह सतगुरु से मिलकर 'राम' नाम का स्नेही हो उठता है।
अब मैं उस आदि ब्रह्म की विलक्षण गति का वर्णन करता हूँ जो स्वयं पिंड देखकर (उसमें स्थित ब्रह्म
का) स्वयं विचार कर लेता हूँ॥
मैं जीव से सम्बद्ध सम्पूर्ण गतियों का भिन्न-भिन्न रूप से वर्णन कर रहा हूँ ताकि जीव उन्हें समझ
ले और उसकी भौतिक अभिलाषाएँ समाप्त हो उठें। अब मैं पिंड में स्थित ब्रह्मांड का वर्णन करता हूँ
और भिन्न-भिन्न रूप में उसे दिखाऊँगा॥
जो पिंड के बाहर है, वह पिंड के अन्तर्गत दिखाई पड़ता है, मैंने तो स्वयं समझकर सब कुछ पिंड
के अन्तर्गत देखा है। तुलसी साहब कहते हैं कि उसे पाकर पिंड में प्रविष्ट होकर (अनुभूति द्वारा उसे)
देखा है। इस पिंड के भीतर भिन्न-भिन्न अनेक सारे विवेक हैं॥
जैसे-जैसे संतों ने पिंड (घट) के विषय में जानकारी दी हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि वैसा-वैसा
घट रामायण / ७२
मैंने उन्हें अपने नेत्रों से देखा है। अब मैं इसकी दृश्य रचना ( लखाई ) के बारे में कहता हूँ, जो घट के
भीतर मुझे दिखाई पड़ा है ॥
मैं तो निष्काम ब्रह्म ( गुरु ) का शिष्य हूँ। जिधर-जिधर विचार करके देखता हूँ, यह संसार अंधा ही
दिखाई पड़ता है। मेरी सच्ची बात कोई नहीं मानता है और वह पुनः पुनः भवसागर में कर्मबन्धन की
बेड़ी में फँसता जाता है ॥
भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के सन्तों को मैंने बुलाया, और उन्हें समझाया ) किन्तु किसी के हृदय में ज्ञान
नहीं आया। स्वयं कागभुशुण्डि ने ऐसा बताया है कि पिंड में ही सुरति ने ज्ञान का सैल ( आश्रय ) बना
रखा है॥
कागभुशुंडि कोई नहीं हुआ था। स्वयं तुलसी ने इस शरीर को सुरति ज्ञान का विश्राम गृह बताया है।
कागभुशुण्डि श्रीराम की काया के मध्य गया और वह श्रीराम के मुख द्वारा प्रविष्ट हुआ था ॥
उसके ज्ञान और उसकी बुद्धि को तुलसी ने समझा था और उसका वर्णन रामायण में किया है। इस
माया संसक्त जीव को अन्त में ले जाकर यह सब ( पिंड में ब्रह्मांड रहस्य ) घट के भीतर ही कहकर
बताया है॥
सुमित्रा, कैकेई एवं कौसल्या ये सभी इस पिंड के भीतर मिली हैं। जो सीता, दशरथ तथा राम कहे
गए हैं, ये सभी घट के भीतर दिखाए गए हैं ॥
सरयू नदी और सुरति रूपी अयोध्या के दसों दरवाजे, मैंने सभी को घट के भीतर निहार कर देख
लिया है। कुंभकर्ण एवं लंका के स्वामी रावण ब्रह्म के पास त्रिकुटी में निवास करते हैं॥
हमने जिसे रावण कहा है वह त्रिकुटी रूपी लंका में स्थित ब्रह्म है। मंदोदरी तथा रावण का भाई
विभीषण, पुत्र मेघनाद सभी इसी त्रिकुटी में हैं ॥
मैं यह सब संवाद घट के बीच का कहता हूँ। रामायण तो घट के मध्य की कथा की ही बनी है।
यदि कोई व्यक्ति अंधा है तो वह इसे न स्वीकार करे और न स्वीकार करने के कारण पुनः नरक में
पड़ेगा ॥
सन्तों की गति कोई नहीं जानता। वे इसी पिंड में ही ब्रह्मांड बखानते हैं। उनके ज्ञान और उनकी
बुद्धि को कोई नहीं जानता क्योंकि बिना सत्संग के यह नहीं पहचाना जा सकता ॥
जब प्रभु की कृपा होती है तभी अदृष्ट ( अंधे ) को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है। तभी कोई
साधक इस पिंड में ब्रह्मांड एवं सुरति शैल पा लेता है क्योंकि तभी ( पाने के क्षण ही ) सत्गुरु की कृपा
होती है ॥
अब मैं ब्रह्मांड के दृश्य का वर्णन करता हूँ जो किसी-किसी विरले संत को दिखाई पड़ता है। ये
सन्त अन्तरात्मा में लीन हो जाते हैं, इन्हीं सन्तों पर विश्वास होता है॥
जिन्होंने घट की सुरति शैल पर विश्रामालय बना लिया है, उनके ज्ञान तथा उनकी मति की पहचान
बिरले ही करते हैं। अब मैं घट में सुरति के शैल को दिखाकर अपनी चिन्तनगत दृढ़ता को स्पष्ट करता हूँ।
राम और रावण घट के भीतर सभी परिवार के रूप में हैं और उन्होंने इस घट के भीतर ही उनको
चुन-चुन कर मारा है और रावण की भांति इसी घट में ही अनेक उत्पाती राक्षस हुए हैं (और वे भी मारे
गए हैं) ॥
हमारे इस सत्य मत को जिसने सत्य माना है, उनका इस लोक में आवागमन समाप्त हो उठा है। इस
तथ्य में जो व्यक्ति भ्रम उत्पन्न करता है, वह बार-बार नरक की चारों योनियों में पड़ता है॥
मैंने उसे इस प्रकार स्वयं देखा है, और उन्हें मैंने सन्तों की कृपा से जाना भी है। अब इस पिंड तथा
ब्रह्मांड का वर्णन वही-वही करता है-जिसको अपने नेत्रों से देख लिया है॥
॥ दोहा ॥
पिंड सैल ब्रह्माण्ड की, जस जस गति मति मोर।
जो सत मत संतन कही, देखा घट गढ़ तोर॥
८० / घट रामायण
अर्थ-पिंड ही ब्रह्मांड का पर्वत शिखर है, जैसी कि मेरी समझ है, सत्य के मत का जो वर्णन सन्तों
: किया है, उसे इस घट के अन्दर मैंने देखा है॥
॥ छन्द ॥
गाया घट लेखा अगम अलेखा। जिन जिन देखा सार सही॥
महुँ पुनि भाखी देखा आँखी। सूरति धसि दस द्वार गई॥ १॥
संतन जोइ गाई महुँ पुनि पाई। आदि अंत गति कहनि कही॥
जो जो घट माहीं सब दरसाई। जो रचना ब्रह्मांड मई॥ २॥
जिन जिन निज जानी देख बखानी। जिन नहिं मानी भर्म सही॥
पंडित गति ज्ञानी भर्म भुलानी। भेष भेद भौ माहिं कही॥ ३॥
छत्री और ब्राह्मन बैस अपावन। सूद्र मती छर छार भई॥
का को गोहराई आदि न पाई। तुलसी सब देखा भर्म मई॥ ४॥
अर्थ-मैंने यहाँ अगम तथा न दिखाई पड़ने वाले अलक्ष्य घट के प्रकरण (लेखा) का वर्णन किया।
जिन-जिन महात्माओं ने उसे देखा है (अनुभव किया है) वही उसका सही निचोड़ है। मैंने उसका पुनः
आँखों से देखकर वर्णन किया है, और मेरी सुरति (ज्ञान) दसों द्वारों में प्रविष्ट होकर वहाँ पहुंची
हैं॥ १॥
जिसे सन्तों ने गाया है (बताया है, वर्णन किया है) मैंने भी उसी को प्राप्त किया है और उसकी
आदि अन्त का उस रूप में वर्णन किया है। जो-जो घट के अन्तर्गत है, मैंने सबके विषय में बताया है,
यह सारी रचना ब्रह्मांडमयी है॥ २॥
जिन-जिन ने इसे जाना है, उसको देखकर वर्णित किया है-जिन्होंने नहीं माना है, वह पूरी तरह से
भ्रम में हैं। पंडित तथा ज्ञानी (ज्ञान एवं पांडित्य के गर्वभ्रम में) अपने भ्रम में भुलाए रहे और ईश्वर के
वेष तथा भेद को संसार (सृष्टि) के अन्तर्गत बताया (ब्रह्मांड के अन्तर्गत नहीं) ॥ ३॥
क्षत्रिय तथा ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र सभी की मति (ज्ञान) जलकर राख हो गई। इस मनुष्य समाज
में किसको बुलावें किन्तु वे इसके मूल रहस्य का ज्ञान नहीं प्राप्त कर रखा है, तुलसी साहब कहते हैं
कि सभी को मैंने भ्रम में पड़ा हुआ देखा है॥
॥ सोरठा ॥
ब्राह्मन अरु पुनि सूद्र, ये बूड़े सब उद्र को।
बैस्य बसा भौ बास, कस अकास डोरी गहै॥
अर्थ-ब्राह्मण तथा दलित ये सभी अपने पेट भरने में ही डूब गए। वैश्य का निकृष्ट स्थान पर
निवास हो उठा और शून्याकाश की डोर को ये तीनों किस प्रकार पकड़ सकते हैं सम्भव नहीं हैं॥
॥ चौपाई ॥
सब ये घट की सैल बखाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड दिखाना॥
आगे घट का भेद बताई। अब जो सुनो कहों समझाई॥ १॥
तिल परमाने लगे कपाटा। मकर तार जहाँ जिव की बाटा॥
इतना भेद जानि जिन कोई। तुलसीदास साध है सोई॥ २॥
आगे अदबुद ज्ञान अपारा। पिरथम घट का कहों बिचारा॥
घट रामायण / ८१
अर्थ—यह सब मैंने घट की यात्रा (सैल) वर्णन किया और मुझे पिंड में ही ब्रह्मांड दिखाई दिया।
आगे, घट के भेदों को बताऊँगा—मैं समझाकर कहता हूँ—अब उसे सुनो॥
चित्त की चेतना के द्वार पर तिल के समान छोटा कपाट लगा हुआ है। जीव का रास्ता वहाँ मकर
तार जैसा सूक्ष्म है। जिसने इतना भेद समझ लिया है—तुलसीदास कहते हैं, वही साधु है॥ २॥
आगे अपार अद्भुत ज्ञान है, अब इस पृथ्वी घट पर विचार कह रहा हूँ॥
॥ अर्थ घट का भेद और ठिकाना ॥
( सवाल )
१. पृथ्वी का माथा कहाँ है?
२. सुर का तेज कहाँ है?
३. चंद्र की जोति कहाँ है?
४. पानी का मूल कहाँ है?
५. कँवल का फूल कहाँ है?
६. वायु की नाभि कहाँ है?
७. गनेस की स्वाबी कहाँ है?
८. समुद्र का सोत कहाँ है?
९. आकाश का पोत कहाँ है?
१०. सुरति सहदानी कहाँ है?
११. जीव की बानी कहाँ है?
१२. जीव का नाम कहाँ है?
१३. सुरति का ठाम कहाँ है?
१४. ध्यान की सुरति कहाँ है?
१५. ज्ञान की मूरति कहाँ है?
१६. सुरति की निरति कहाँ है?
१७. सुमेर की जड़ कहाँ है?
१८. तिल भर हाड़ काया में कहाँ
है?
१९. गगन का कलेजा कहाँ है?
२०. मन का मुख कहाँ है?
२१ काम का आदि कहाँ है?
२२. देही का नूर कहाँ है?
२३. बदन का पिंजर कहाँ है?
२४. सिव का ध्यान कहाँ है?
२५. बेद का भेद कहाँ है?
२६. गुनी का गुन कहाँ है?
२७. राग का रस कहाँ है?
२८. सुर का आकार कहाँ है?
२९. आकार का आदि कहाँ है?
३०. अंत की समाधि कहाँ है?
३१. माया की धुनि कहाँ है?
३२. धुनि की सुन्न कहाँ है?
३३. सुन्न का शब्द कहाँ है?
३४. ज्ञान का मूल कहाँ है?
॥ जबाब ॥
१. पृथ्वी का माथा मैनागिरी पर्वत में है।
२. सूर का तेज उदयागिरि पर्वत पर हैं।
३. चंद्र का तेज चंदागिरि पर्वत पर हैं।
४. पानी का मूल निरंजन की दीपें में है।
५. कमल का फूल अछेद्दीप में है।
६. वायु की नाभि रंभा के पेड़ में हैं।
७. गणेश की स्वाबी मानसरोवर में है।
८. समुद्र का स्त्रोत समीवृक्ष में है।
९. आकाश का पोत वाराह के माथे पर है।
१०. सुरति सहदानी शब्द में हैं।
११. जीव (हंस) की बानी अष्ट कमल में है—
जीव अरूपी द्वादश कमल में है।
१२. जीव का नाम शून्य कमल में है।
१३. सुरति का स्थान दो दल वाले कमल में
है।
१४. ध्यान की सुरति गगन के ऊपर नयन
नासिका के अग्रवीच में हैं।
१५. ज्ञान की मूर्ति ब्रह्मांड कमल में है।
८२ / घट रामायण
१६. सुरति की निरति साहब (परमात्मा के २६. गुनी का गुन षटदल कमल में है।
शब्द) में है। २७. राग का रस पुरुष के शब्द में है।
१७. सुमेर की जड़ नाग के कलेजे में है। २८. सुर का आकार शून्य में है।
१८. तिल भर हाड़ पाँच इन्द्रियों में है। २९. आकार का आदि अनाहत नाद में है।
१९. गगन का कलेजा राग के आकार में है। ३०. अन्त की समाधि ब्रह्मलोक (साहब के
२०. मन का मुख षट्दल कमल में है। लोक) में है।
२१. काम की आदि शिव (शंकर) की सुरति ३१. माया की ध्वनि चतुर्दल कमल में है।
में है। ३२. ध्वनि की शून्य वे ज्ञान के मूल में है।
२२. देही का नूर हरि के पास है। ३३. शून्य का शब्द निरन्तर में है।
२३. बदन का पिंजर पृथ्वी के भीतर है। ३४. ज्ञान का मूल नाम में है।
२४. शिव का ध्यान हरि के शब्द कमल में है।
२५. वेद का भेद चार दल कमल में है।
॥ सोरठा ॥
इतना देहु बताइ, जीव कहों समझाइ कै।
अगम निगम घर पाइ, तब तुलसी सब बिधि लखै॥
अर्थ-मैं जीवों को समझा कर कहता हूँ कि तुम इतने प्रश्नों का उत्तर दे दो। इस अगम्य एवं अज्ञेय
का घट पाकर तुम इसे भलीभाँति देखते, तुलसीदास कहते हैं कि (इस शरीर को) इन प्रश्नों के प्रकाश
में इसे भलीभाँति क्यों नहीं देखते?
॥ जवाब चौपाई ॥
आगे उलटा भेद बताऊँ। अगम निगम घट भेद सुनाऊँ॥
अब या का अरथंत सुनाऊँ। घट में टीका ठौर बताऊँ॥
जो कोई साध सैल घट कीन्हा। सुन करि अर्थ होइ लौ लीना॥
अर्थ-आगे अब मैं इसका उल्टा भेद बता रहा हूँ। इससे सम्बद्ध इसे अगम्य एवं अज्ञेय तत्त्व का मैं
भेद बताऊँगा। अब मैं इसका अर्थान्तर (प्रश्नों का अर्थ) सुनाता हूँ। इसी घट में इनका उचित निवास
तथा पहचान (टीका ठौर) बताता हूँ। जिस साधु ने इस पिंड (घट) में शैल (विश्रान्ति स्थली) कर ली
है-इसके अर्थ को सुनकर वही उसकी समाधि में लीन हो उठेगा॥
॥ दोहा ॥
ये अस्थान बताइया, साधू सुनौ बखान।
कहै तुलसी घट भीतरे, सूरति से पहिचान॥
अर्थ-मैंने वर्णन करके इन स्थानों के विषय में बतला दिया, हे साधु जन! इस वर्णन को सुनें।
तुलसी साहब कहते हैं कि इस शरीर के भीतर सुरति ज्ञान द्वारा इनकी पहचान करो।
॥ सोरठा ॥
रामायण घट सार सुरति शब्द में लखि परै।
गगन कँज कर बास ऊपर चढ़ि जिन देखिया॥
अर्थ-यह मेरी रामायण पिंड का निचोड़ तत्त्व है और इसे सुरति समाधि से ही देखा जा सकता है।
सुरति में स्थित कमल दल पर निवास करते हुए उसके ऊपर चढ़कर जिन्होंने इसे देखा है (वही इसके
प्रमाण हैं।)॥
घट रामायण / ८३
॥ चौपाई ॥
अब सुनियौ ब्रह्मंडी लेखा। कोटिन परलै घट बिच देखा॥
भीतर गुफा एक जो कीन्हा। कोटि प्रलै उबार जिव लीन्हा१॥
सब्द निरंतर सत है भाई। गहै जीव पहुँचे जब जाई॥
घट का मथन सुरति से१ साधै। बा को काल कभी नहिं बाँधै॥
कोटिन सूर ब्रह्मांड के माहीं। कोटिन कोटि देखि सब ठाहीं॥
घट बिचार घट ही के माहीं। ता में ब्रह्मा बिस्नु रहाई॥
सिव संकर सब घट में फंदा। घट में नदी अठारा गंडा॥
घट में देखे सात समुन्दर। जिन से जल पहुँचे नभ अंदर॥
घट में तीरथ बरत मँझारी। घट में देखा कृष्न मुरारी॥
घट में जोधा सामन्त होई। घट में राजा परजा सोई॥
घट में हिंदू तुर्क दोइ जाती। घट में कुला कर्म की पाती॥
घट में नेम दया अरु धर्मा। घट में पाप पुन्य बहु कर्मा॥
घट में डंड बंध दोउ भाई। जो कछु बाहिर सो घट माई॥
घट में बास बसन जग लागा। घट में कामिनि खेलै फागा॥
घट में षट पलास सोइ फूला। घट में लोग प्रजा झकझूला॥
घट में स्वर्ग नर्क हैं दोई। घट में जनम मरन पुनि होई॥
घट में कथा पुरान सुनावै। घट में माया करम करावै॥
घट में चोरी चोर अपारा। घट में करता सिरजनहारा॥
घट में राजा राज कराई। घट में चौकी पहरा भाई॥
घट ही में सब न्याव चुकावै। घट में रागी तान सुनावै॥
घट में नाच कूद रे भाई। घट में राग अलाप सुनाई॥
घट में साह महाजन होई। घट में सब्द सुन्न है सोई॥
घट में राजा है बलि बावन। घट में सीता रघुपति रावन॥
घट में लंका सा गढ़ भाई। घट में छानवे मेघा छाई॥
घट में बैठे पाँचौ नादा। घट में लागी सहज समाधा॥
ऊँच नीच परबत झक झाई। निस दिन झरना बहत रहाई॥
मगरमच्छ घट माहिं मँझारा। घट में बस्ती और उजारा॥
घट में सुकदेव ब्यास अरु नारद। घट में ऋषी मुनी अरु सारद॥
घट में राजा बरन कुबेरू। घट में माँडे आठ समेरू॥
१. मुं० दे० प्र० की पुस्तक में दूसरी चौपाई इस तरह है—''भीतर गुफा एक है भाई। उबरे जीव पार जब
जाई''; और चौथी चौपाई में 'सुरति से' की जगह 'जीव कोइ' है।
८४ / घट रामायण
कहँ लगि घट का कहौं पसारा। घट में अनेक बिधान सँवारा॥
जो सब घट कहि बरनि सुनाई। जौ जग कागद मिलै न स्याही॥
अर्थ-अब ब्रह्मांड का वृत्तान्त सुनिये। इस पिंड (घट) के बीच करोड़ों प्रलय देखा है। अपने पिंड
के भीतर जो एक विशिष्ट गुफा है, उसने जीव को उन कोटि प्रलयों से बचा लिया है॥
हे भाई! शब्द (निरंकार) निरन्तर सत्य है। जीव जब वहाँ पहुँचता है तो वह उसको ग्रहण कर लेता
है (उसकी रक्षा करने लगता है)। इस घट का मंथन सुरति समाधि से साधो-सुरति से शब्द (निरंकार)
को साधने वालों को काल कभी भी नहीं बाँध पाता॥
ब्रह्माण्ड के बीच कोटि-कोटि सूर्य हैं। इन कोटि-कोटि सूर्यों को देखकर सभी स्थिर हो जाते हैं।
घट का विचार घट के मध्य ही किया जा सकता है, बाहर नहीं-जिसके अन्दर ब्रह्मा, विष्णु आदि रहा
करते हैं॥
शिवशंकर तो इस घट के फंदे हैं। इस घट के अन्दर ९० नदियाँ ( १८ × ५ = ९० = एक गंडा
पाँच के बराबर होता है) हैं। इस घट में मैंने सात समुद्रों को देखा है, जिनका जल शून्याकाश के बीच
पहुँचता है॥
इस घट में तीर्थ एवं व्रत के स्थान हैं और इसी घट में मैंने मुरारी कृष्ण को भी देखा है। इसी घट
के अन्तर्गत समस्त योद्धागण एवं सामन्तगण हैं-लोक में दिखाई पड़ने वाले राजा प्रजा सभी घट में
हैं॥५॥
इसी घट में हिन्दू-तुर्क (मुसलमान) दो जातियाँ हैं-इस घट में सम्पूर्ण कर्मों की पंक्तियाँ
(स्थितियाँ) हैं। इसी घट में ही नियम, दया एवं धर्म हैं। इसी घट के अन्तर्गत पाप-पुण्य से संयुक्त
समस्त कर्म हैं॥
इस घट के दो भाई है-एक दण्ड है और दूसरा बंधन है। इसलिए जो कुछ बाहर है, वही यहाँ भी
है। इसी घट में ही लोगों के सारे निवास हैं, और इसी घट में नवयुवतियाँ होली खेलती हैं॥
इसी घट के अन्तर्गत छः दलों का पलास फूला हुआ है-इसी घट में ही लोग प्रजा को झकझोरते
रहते हैं। इसी घट में स्वर्ग तथा नरक दोनों हैं और इसी घट में जन्म और जन्म के बाद पुनः मरण होता
है॥
इसी घट के अन्दर ही साधु जन कथा-पुराण सुनाते हैं और इसी घट में ही माया नाना प्रकार के
कर्मों को कराती रहती है। घट में ही चोरी करने वाले अनन्त चोर हैं। इसी घट में ही संसार का
रचनाकर्त्ता सृजनहार ईश्वर भी है॥
इसी घट में राजा राज्य करता है, इसी घट में चौकी और पहरा भी है? इसी घट में ही सारे न्याय
चुकाए जाते हैं इसी घट में ही राग रागिनियों का ज्ञाता (रागी) नाना प्रकार की संगीत की ताने सुनाता
रहता है॥
सम्पूर्ण नाच-कूद इसी घट में है-इसी घट में ही राग तथा आलाप सुनाई पड़ता है। इसी घट में साहु
तथा महाजन रहते हैं और इसी घट में ही वह शून्य शब्द भी है॥
इसी घट में राजा बलि और वामनावतार भी हैं, इसी घट में सीता, रावण तथा राम है। इसी घट में
वह घट लंका भी है, इसी घट में ९६ प्रकार के मेघ छाये रहते हैं॥
इसी घट में पाँचों प्रकार के नाद स्थित हैं और इसी घट में ही सहज समाधि लगी रहती है। इसे घट
में चारों वेद रह रहे हैं और इसी घट में असंख्य ब्रह्म समाविष्ट हैं॥
घट में ही सन्तों का स्वर्ग तथा पाताल हैं, इसी घट में भयंकर काल बैठा हुआ है-जो सब बाहर है,
वही सब अन्दर भी है-घट का भेद घट के ही अन्दर है॥
इसी घट में सारे अड़सठ तीर्थ हैं और इसी घट में गंगा की धारा भी बहती है। इसी घट में ही लोग
स्नान करते हैं और इसी घट में ही तीनों लोक समाये रहते हैं॥
घट रामायण / ८५
घट की थाह कोई नहीं जान पाया—इसी घट में पिंड तथा ब्रह्मांड समाये हुए हैं। इसी घट में ही
हाट-बाजार लगाया हुआ है-घट में ही वह दामिनि (विद्युत लेखा) है और यही मन अपने पति को प्राप्त
करता है॥
इस घट में अपार पर्वत तथा वृक्ष हैं और घट में ही विष्णु के दशावतार बैठे हुए हैं। इसी घट में
हाथी और घोड़े हैं और इसी में समस्त हिरण स्थित हैं॥
इसी घट में ऊँचे, नीचे, पर्वत, खोह (झल) और झाड़ियाँ (झाईं) हैं और यहीं रात-दिन झरने बहते
रहते हैं। इसी घट के अन्दर ही मगरमच्छ है-इसी घट में बस्तियाँ तथा उजाले हैं॥
घट में ही शुकदेव, व्यास, एवं मुनि नारद हैं-इसी घट में ऋषि, मुनि एवं सरस्वती देवी रहती है।
इसी घट में वरुण राजा (बरन) एवं कुबेर रहते हैं और इसी घट में आठों सुमेरु पर्वत सुशोभित
(मौडे-मण्डित) होते हैं॥
इस घट के विस्तार का कहाँ तक वर्णन करूँ। घट में अनेक प्रकार की रचनाएँ सजाई गई हैं। उन
सम्पूर्ण बातों का जो घट में स्थित है, मैं उल्लेख कर चुका हूँ। यह वर्णन इतना अधिक है कि उसके
निमित्त स्याही और कागज भी कम पड़ गए है॥
॥ दोहा ॥
घट भीतर जो देखिया सो भाखा विस्तार।
बेदी भेद जनाइया तुलसी देखि विचार॥
अर्थ—घट के भीतर जो देखा, उसका मैंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। तुलसी साहब कहते है कि
मैंने भेद का कारण एवं उसके अनेक भेदरूपों का अन्तर स्पष्ट कर दिया-उसे तुम देखो तथा विचार
करो॥
॥ छन्द ॥
सब ठीक बखाना घट परमाना। घट घट में सब ठाम ठई॥
बाहिर सोइ अंदर सब घट मन्दर। देखि हिये बस बास कही॥ १॥
बूझै कोई ज्ञानी अंतरजामी। मूरख मूढ़ न चेत भई॥
आगे पुनि गाऊँ बरनि सुनाऊँ। इन सब के अस्थान मई॥ २॥
तुलसी तन तारा खोलि किवारा। पैठि मँझारा सार लई॥
अर्थ—घट को प्रमाण के रूप में रखकर मैंने सारी बातें ठीक-ठीक कही हैं। घट में ही सभी के होने
के ठीक-ठीक स्थान हैं। जो बाहर है, वह सब घट रूपी मन्दिर के अन्दर है, हृदय के निवास को वहाँ
देखकर ये बातें कही हैं॥ १॥
इसे कोई अर्न्तयामी ज्ञानी ही बूझ सकते है-मूढ़ एवं मूर्ख के मन में इसका ख्याल नहीं आता। मैं
पुनः इस प्रसंग का आगे गान करके वर्णन करके सुनाता हूँ-जहाँ इनके स्थान हैं।
तुलसी साहब कहते हैं-इस शरीर के किवाड़ों के ताले को खोलो और सार तत्त्व को ग्रहण करके
इसी में बैठो॥ २॥
॥ सोरठा ॥
या विधि तन मन ग्यान भीतर देखा जोड़ कै।
साधू करौ प्रमान भिन्न भिन्न तत मत कहा॥
अर्थ—इस प्रकार, शरीर और मन का ज्ञान मैंने घट के भीतर जाकर देखा और अब साधु जन इस
भिन्न-भिन्न शरीर की कथाओं के प्रमाण हैं॥
८६ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
अब उनके अस्थान बताऊँ। भिनि भिनि ग्रंथन में समझाऊँ ॥
अर्थ-अब उनका स्थान मैं बताता हूँ तथा यह भिन्न-भिन्न ग्रंथों से लेकर समझाता हूँ॥
॥ कोठों के नाम ॥
कोठा प्रथम उतेसुर नाईं। बैठे ब्रह्मा बेद पढ़ाई॥
दूसर धरम-गंध दरसाई। बैठे बिस्नू ज्ञान सुनाई॥
तीसर कोठा धुन-धर भाई। बैठे संकर जोग कराई॥
चौथा कोठा रक्तमनि गाई। बरुन बैठि जहँ राज कराई॥
हरि संग्रह पचम बतलाऊँ। आठ सुमेर बसैं तहि ठाऊँ॥
बिजै-धुंध षष्टम कहलाई। मन की कला फिरै तेहिं ठाईं॥
कोठा सतवाँ नगरा नाऊँ। अन्नदेव बैठे तेहि ठाऊँ॥
कोठा अठवाँ रुकमन ताला। जहाँ बैठे मदन गोपाला॥
नौवाँ कोठा गौड़ मन माली। दुरमति माया करै बिहाली॥
दसवाँ कोठा उघडू नावाँ। सहस कोटि ऊगैं तेहि ठावाँ ॥
करभौनी एकादस नाऊँ। तीनि लोक में जोति समाऊँ॥
द्वादस कोठा बिषमदे गावा। सुर नर मुनि जहँ ध्यान लगावा॥
कोठा त्रयोदस मलदू द्वारे। जोगिनि चौंसठ लाख निहारे॥
चौधा कोठा गगनधर नाऊँ। लच्छ अलच्छ बैठि तेहि ठाऊँ॥
हमसुन्दर पन्द्रा कर नावाँ। बास सुगंध बसै तेहि ठावाँ ॥
कोठा सोला अतिसुर नाऊँ। पाँच बजार बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा सत्रा सिषरचल नाऊँ। अठरा गंडा नदी तेहि ठाऊँ॥
अठरा कोठा कड़ेसुर नाऊँ। जीव को तेज बसै तेहि ठाऊँ॥
कोठा उनीस बंकचल नाऊँ। मुरली सुहावन बजै तेहि ठाऊँ॥
बिसवाँ कोठा कुलँग कहाई। सुकृत बाजा बजै सुहाई॥
इकइस कोठा भानसुर नाऊँ। अलख निरंजन है तेहि ठाऊँ॥
बाइस कोठा धुँधेसुर नाऊँ। मन को ध्यान बसै तेहि ठाऊँ॥
तेइस कोठा तरंगी ताला। बिछई जे जग में जमजाला॥
चौबिस कोठा कंठसुर नाऊँ। सुमति बिचार बसै तेहि ठाऊँ॥
पच्चिस कोठा प्रकृति१ नाऊँ। मल को पती बसै तेहि ठाऊँ॥
छब्बिस कोठा मुदापल नाऊँ। पवन प्रधान बसै तेहि ठाऊँ॥
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में 'परकुटी' है।
घट रामायण / ८७
सताइस कोठा सुताचल नाऊँ। मन अलीप बैठे तेहि ठाऊँ॥
अठाइस कोठा धरनीधर नाऊँ। माया मोह बसै तेहि ठाऊँ॥
उंतिस कोठा कमची नाऊँ। बादल मेघ उठै तेहि ठाऊँ॥
तिसवाँ कोठा निरमल नामूँ। साहिब पलँग बिछा तेहि ठामूँ॥
इकतिस कोठा करोमल नामूँ। नवो नाथ बसते तेहि ठामूँ॥
बत्तिस कोठा बनासुर नामा। नौ कुत्ते बैठे तेहि ठामा॥
तेंतिस कोठा अनधू नामूँ। जम का तेज बसै तेहि ठामूँ॥
चौंतिस कोठा जमाउत नामा। जमुना नदी बसै तेहि ठामा॥
पैंतिस कोठा सकरदू१ सेता। कामदेव जहँ झरि झरि बहता॥
छत्तिस कोठा गनक नामूँ। क्रोध कलेस बसै तेहि ठामूँ॥
सैंतिस कोठा अवर धुर धुंधा। बैठ कृष्न जहँ डारै फंदा॥
अरतिस कोठा बँसबल नाऊँ। चौधा कामिनि हैं तेहि ठाऊँ॥
उन्तालिस करियाधर नाऊँ। बैठे दया धरम तेहि ठाऊँ॥
चालिस कोठा किरिकोता नामूँ। सात समुद्र बसै तेहि ठामूँ॥
इकतालीस भौरादे नामा। नवौ कुली नाग तेहि ठामा॥
बयालिस कुम्भेसुर नाऊँ। बारह कुम्भ बसैं तेहि ठाऊँ॥
तेंतालिस भगताधर नावाँ। भय और त्रास बसै तेहि ठावाँ॥
चवालिस कुसमाधर नाऊँ। चारों बेद बसै तेहि ठाऊँ॥
पैंतालिस मायारट नाऊँ। रोग अरु दोष बसै तेहि ठाऊँ॥
छेयालीस मलया गिरि नावाँ। हंस बिहंग बसै तेहि ठावाँ॥
सैंतालीस हलासुर२ नामा। तीरथ अरसठ हैं तेहि ठामा॥
अरतालिस कुकरंदर न्यारा। जहँ है सत्त सुकृत३ का द्वारा॥
कोठा उंचास मरमो नाऊँ। पवन अकास उठै तेहि ठाऊँ॥
कोठा पचास घूघर नामूँ। हरि को तेज बसै तेहि ठामूँ॥
कोठा इक्यावन मजकुर नामा। सहस कँवल फूला तेहि ठामा॥
बावन कोठा जरादे नामूँ। अगिनी जरै ऊँच तेहि ठामूँ॥
त्रेपन कोठा तेराधर नामूँ। धीर गंभीर बसै तेहि ठामूँ॥
चौवन कोठा सिसंधर नावाँ। सत संतोष बसै तेहि ठावाँ॥
१ एक लिपि में 'सरंदू' नाम लिखा है।
२. एक लिपि में 'कोलाहर' नाम दिया है।
३. मुं० दे० प्र० की पुस्तक 'सुकृत' की जगह "मुक्त" है।
८८ / घट रामायण
पचपन कोठा हिंडोला नामूँ। नारी नवो बसै तेहि ठामूँ॥
छप्पन कोठा निरधर नाऊँ। अठारा भार बसै तेहि ठाऊँ॥
सतावन कोठा कफादे नावाँ। जीव की मीच बसै तेहि ठावाँ ॥
अट्ठावन सुमेरबल नावाँ। मङ्गल पुरुष चरित्तर गावाँ ॥
उनसठ कोठा छैसुन्दर नाँमा। आतम रूप बसै तेहि ठामाँ ॥
साठ कोठा धौलाधर नाऊँ। तीनों लोक मही तेहि ठाऊँ ॥
इकसठ कोठा जैसुन्दर नामूँ। बलधर पुरुष बसै तेहि ठामूँ ॥
बासठ कोठा हीरापुर नामूँ। नीर चुवै झरि झरि तेहि ठामूँ ॥
त्रेसठ कोठा कलाकर नावाँ। चौंधा भवन बसै तेहि ठावाँ ॥
चौंसठ तिल बिक्रम कहलावै। जलथल कुम्भ बसै तेहि ठाँवै ॥
पैंसठ कोठा सुरतसर नामूँ। जप तप जज्ञ करै तेहि ठामूँ ॥
छासठ कोठा सिखरिचल नाऊँ। जोगी असंखन जोग कराऊँ ॥
सरसठ कोठा अनन्दी भाई। जहँवाँ काल बसन नहिं पाई ॥
अरसठ कोठा चितादे नाऊँ। चित का चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
उन्हत्तर कोठा सनीता नाऊँ। ज्ञानी बुद्ध बसै तेहि ठाऊँ ॥
सत्तर कोठा सलीका नाऊँ। सुन्न की धुन उठै तेहि ठाऊँ ॥
इखत्तर कोठा उदाधर नाईं। जहँ जग पालक बैठि रहाई ॥
बहत्तर कोठा गंजधर नाऊँ। करनी मूल बसै तेहि ठाऊँ ॥
कोठा बहत्तर कहेउ बखानी। ले लख भीतर जो पहिचानी ॥
यह घट देखि देखि सोइ भाखा। बूझि बूझि साधू मन राखा॥
रामायन घट कहि समझाई। काया भीतर कथि दरसाई ॥
काया खोज मुक्ति जब होई। बिन खोजे सब गये बिगोई ॥
काया भीतर सब की पूजा। सिव सनकादि आदि नहिं सूझा ॥
बाहिर कथि कथि रहे भुलाई। काया भीतर वस्तु न पाई ॥
कोठा बहत्तरि हम कहि दीन्हा। कोऊ न काया भीतर चीन्हा ॥
सास्तर संसकिरत में फूले। ऋषी मुनी जोगेसुर भूले ॥
या से राह घाट नहिं पाई। बहे कर्म भौजल के माई ॥
अर्थ-प्रथम कोठा उतेसुर के नाम का है-जहाँ ब्रह्मा बैठकर वेद पढ़ाते हैं। दूसरा कोठा धर्म गंध
है, जहाँ विष्णु बैठकर ज्ञानचर्चा सुनाते रहते हैं॥
तीसरा कोठा धनुधर है, जहाँ शंकर बैठ कर योग कराते रहते हैं। चौथा कोठा रक्तमणि कहा
गया है-जहाँ वरुण बैठकर राज्य करते रहते हैं ॥
पाँचवाँ कोठा 'हरिसंग्रह' है-उस स्थान पर आक सुमेर पर्वत हैं। 'विजय धुंध' छठाँ कोठा कहा
जाता है, मन की सम्पूर्ण कलाएँ उस स्थान की परिक्रमा करती रहती हैं॥
घट रामायण / ८९
सातवें कोठे का नाम नगरा है—वहाँ अन्नदेव निवास करते हैं। आठवाँ कोठा 'रुक्मनताल' है, जहाँ
मदन गोपाल बैठे हैं॥
नवाँ कोठा गौड़ मनमानी है—जहाँ यह दुर्गति से माया बेहाल किए हुए है। दसवें कोठे का उघडू
नाम है—जहाँ सहस्र कोटि प्रकाश उत्पन्न होता है॥
ग्यारहवें कोठे का नाम 'करमीनी है-जिसकी ज्योति तीनों लोकों में समाई रहती है। बारहवें कोठे
का नाम 'विषमदेव' है—जहाँ देवता एवं मुनि ध्यान लगाए रहते हैं॥
पन्द्रहवें कोठे का नाम 'हम सुन्दर' है-जिस स्थान पर सुगंध निवास करती रहती है। सोलहवाँ
कोठा। अति सुर नाम का है, जिस स्थान पर पाँच बाजारें लगती हैं॥
सत्रहवें कोठे का नाम 'सिखर जल' है—जिस स्थान पर अठरा गंडक नदी है। अट्ठारहवें कोठे का
नाम कड़ेसुर है-जिस स्थान पर जीव के तेज का निवास है॥
उन्नीसवें कोठे का नाम बंक चल है, जहाँ सुहावती मुरली (निरन्तर) बजा करती है। बीसवाँ कोठा
'कुलंग' कहा जाता है-जहाँ पुष्य का सुहावना बाज बजता रहता है॥
इक्कीसवें कोठा का नाम भानसुर है, उस स्थान पर अचल निरंजना है। बाइसवें कोठे का नाम
'धुंधेसर' है। इसी स्थान पर मन का ध्यान निवास करता है॥
तेईसवाँ कोठा तरंगी ताल है, जिसने इस संसार में यम का जाल फैला रखा है। चौबीसवें कोठे का
नाम कंठसुर है-जहाँ सुमति एवं सुविचार निवास करते हैं॥
पच्चीसवें कोठे का नाम प्रकृति है, वहाँ मल के पति का स्थान है। छब्बीसवें कोठे का नाम मुदापल
है और प्रधान पवन वहाँ निवास करते हैं॥
सत्ताइसवें कोठे का नाम सुताचल है—अलीप (अनिलिप्त-निर्मल मन उस स्थान पर बैठा है।
अट्ठाइसवें कोठे का नाम धरनीधर है—वहाँ माया मोह निवास करते हैं॥
उन्नीसवें कोठे का नाम कमची है, उस स्थान पर बादल मेघ उठा करते हैं। तीसवाँ कोठा निर्मल
नाम का है—उस स्थान पर साहब का पलंग बिछा हुआ है॥
एकतीसवें कोठे का नाम करोपल है—उस स्थान पर नवों नाथ निवास करते हैं।। बत्तीसवें कोठे का
नाम बकासुर है—उस स्थान पर नौ कुत्ते बैठे हैं॥
तैतीसवें कोठे का नाम अनधू है, उस स्थान पर यम के तेज का निवास है। चौंतीसवें कोठे का नाम
'जमाउत' है—उस स्थान पर यमुना नदी निवास करती है॥
पैंतीसवाँ कोठा सकरदू सेतु है, जहाँ कामदेव झर-धर कर निवास करते हैं। छत्तीसवाँ कोठे का
नाम गनकूं है, उस स्थान पर क्रोचन तथा क्लेश दोनों बहते हैं॥
सैंतीसवाँ कोठा, अवधधुर धुंध है, जहाँ श्रीकृष्ण बैठकर फंदे डालते रहते हैं। अड़त्तीसवें कोठे का
नाम बाँसबल है, उस स्थान पर चौदह कामिनियाँ हैं॥
उन्तालिसवाँ करियाघर नाम का कोठा है-जहाँ दया तथा धर्म दोनों बैठे हैं। चालसवें कोठे का नाम
किरिकोता है—और उस स्थान पर सात समुद्र बहते हैं॥
एकतालीसवें कोठे का नाम भौंरा दे है—जहाँ नवों कुलों के नाग निवास करते हैं। बयालिसवें का
नाम कुम्भेसुर है जिस स्थान पर बारह कुम्भ निवास करते हैं॥
तैंतालिसवा भगताधर नाम का कोठा है—वहाँ भय तथा त्रास दोनों का निवास स्थान है। चौवालिसवें
का नाम कुसमाधर है—जहाँ चारों वेद निवास करते हैं॥
पैंतालिसवें का नाम मायारट है—जहाँ रोग और दोष निवास करते हैं। छियालिसवें कोठे का नाम
मलयागिरि है—जहाँ हंस तथा बिहंग दोनों निवास करते हैं॥
सैंतालीसवें का नाम हलासुर है—जहाँ अड़सठ तीर्थों का स्थान है। अड़तालिसवें का नाम कुकरेदर
है—इस विलक्षण कोठ में सत्य एवं पुण्य निवास करते हैं॥
९० / घट रामायण
उनचासवाँ मर्मों नाम का है-जिस स्थान पर पवन निरन्तर आकाश की ओर उठता रहता है।
पचासवें कोठे का नाम घूघर है और उस स्थान पर श्रीहरि का तेज निवास करता है॥
इक्यावनवाँ कोठे का नाम मजकूर है-उस स्थान पर सहस्रार कमल खिला हुआ है। बावनवे कोठे
का नाम जरा दे है-उस स्थान पर उच्च शिखा वाली अग्नि जलती रहती है॥
तिरपनवें कोठे का नाम तेराधर है, जहाँ धीर गम्भीर निवास किया करते हैं। चौवनवाँ कोठा सिसंदर
नाम का है-उस स्थान पर सत्य तथा सन्तोष निवास करते हैं॥
पचपनवें कोठे का नाम हिंडोला है, नवों नाड़ियाँ उस स्थान पर निवास करती हैं। छप्पनवें कोठे का
नाम निरधर है-जहाँ अठ्ठारहों भार निवास करते हैं॥
सत्तावनवें कोठे का नाम कफा दे है-जीव की मृत्यु वहाँ निवास करती है। अट्ठावनवें का नाम सुमेर
बल है-जहाँ मंगल नाम का पुरुष निरन्तर चरित्र गायन करता रहता है॥
उनसठवें कोठे का नाम 'छे सुन्दर' है-जहाँ स्वयं आलस्य निवास करता है। साठवाँ कोठा धौलासुर
है-तीनों लोकों की पृथ्वी वहाँ निवास करती है॥
इकंसठवें कोठे का नाम जैसुन्दर है-शक्तिशाली पुरुष वहाँ निवास करते हैं। बासठवाँ कोठा हीरापुर
नाम का है-वहाँ निरन्तर झर झर कर जल चूता रहता है॥
तिरसठवें कोठे का नाम कलाकर है-जिस स्थान पर चौदहों भुवन निवास करते रहते हैं। चौसठवाँ
कोठा तिल विक्रम कहलाता है, उस स्थान पर जल, स्थल तथा कुम्भ तीनों का निवास है॥
पैंसठवें कोठे का नाम सुरत सर है-जहाँ सभी जप, तप एवं यज्ञ करते हैं। छियाछठवाँ कोण
शिखरिकल है-जहाँ असंख्य योगी योग करते हैं॥
सरसठवाँ कोठा आनन्दी माँ का है-वहाँ काल निवास नहीं करने पाते। अड़सवें कोठे का नाम
'चिता दे' है-उस स्थान पर चित्त का चक्र निरन्तर घूमा करता है॥
उनहत्तरवें कोठे का नाम सनीता है, जहाँ ज्ञानी बुद्ध निवास किया करते हैं। सत्तरवाँ कोठा सलीका
नाम का है जहाँ शून्य की धुन निरन्तर उठती रहती है॥
इकहत्तरवाँ कोठा उदाधर नाम का है, जहाँ संसार के पालन कर्त्ता ईश्वर बैठे रहते हैं। बहत्तरवें
कोठे का नाम गंजधर है जिस स्थान पर मूल कर्म (करनी) बैठी रहती है॥
मैंने इस प्रकार, बहत्तर कोठों का बखान करके वर्णन किया है-जो पहचान में आए उसे हे
साधुजन! तू अपने घर में (भीतर) पहचान ले। इस घट को देख-देखकर इसके विषय में वही कह
सकता है-जिसने समझ-समझ कर साधुजन की रक्षा की है॥
इस प्रकार, मैंने घट रामायण कहकर समझाया है और उसे कह करके घट के भीतर दिखाया भी
है॥ काया में ही इन सबको खोजकर मुक्ति प्राप्त करो क्योंकि बिना खोज सब विनष्ट हो उठते ॥
शरीर (घट) के भीतर ही सबकी पूजा है-शिव-सनकादि बिना साधना एक सूझते नहीं (अतः
साधना करके) उन्हें समझो। उनको बाहर मानकर कहते-कहते सब भूल गए किन्तु काया के भीतर
उन्हें मूलतत्त्व (वस्तु) नहीं दिखा॥
हमने बहत्तर कोठों में उन्हें बताकर कह दिया है और किसी ने भी उन्हें शरीर के भीतर नहीं पहचाना
है। विद्वान अपने संस्कृत के शास्त्र ग्रंथों में गर्व से फूले रहते हैं, और ऋषि, मुनि तथा योगेश्वर भी
अहम्भाव में भूले हुए दिखते हैं॥
इसी कारण उन्होंने न अध्यात्म का मार्ग प्राप्त किया और न उसका कोई घाट तथा वे भवजल के
बीच कर्म के भ्रम तथा अहम् में बह गए॥
॥ दोहा ॥
सत्तनाम सुरति गहै सत गुरु सरन निवास।
तुलसी तरंग तरास ज्यों लखि पहुँचे तेहिं पास ॥
घट रामायण / ९१
अर्थ-सुरति समाधि द्वारा सत्य के नाम का ग्रहण करके जो सतगुरु की शरण में निवास करता है-
जैसे तरंगों की लहरें अन्ततः उसको देखती हुई। वह सभी समुद्र-ब्रह्म के पास पहुँच जाती हैं॥
॥ छन्द ॥
घट की गति गाई भाखि सुनाई। लखि पाई पद पार कही॥
जो जो परमाना घट मठ जाना। ठाम ठिकाना ठौर मई॥ १॥
तुलसी तस देखा घट बिच लेखा। पेखा तत मत पूर जही॥
आगे जस होई भाखौं सोई। जो जो सिद्ध समाधि लई॥ २॥
अर्थ-घट के ज्ञान को गाकर तथा कहकर सुना दिया और उसे मैं उस पार पाकर देखा और उसके
विषय में कहा। मैं घट के मठ का जो-जो प्रमाण, स्थान, ठिकाना ठौर जानता था (वर्णन किया) ॥ १॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने इस पिंड के बीच जैसा देखा था, वैसा-वैसा पूरी तरह से बता दिया।
आगे उसका जो अन्य रूप होगा, उसका वैसा ही वर्णन करूँगा, जिन रूपों में सिद्धों ने समाधि में देखा
है (प्राप्त किया है)-उसको भी उसी रूप में वर्णित करूँगा॥ २॥
॥ सोरठा ॥
सिध चौरासी नाम, घट भीतर सब देखिया।
ता कर कहों बखान, जस जस ठीका नाम गुन॥
अर्थ-सिद्धों के चौरासी नाम (रूप) हैं-जिन्हें मैंने घट के भीतर देखा है। उनके नाम तथा गुण
जिस-जिस प्रकार से ठीक लगेंगे, मैं उनका इस प्रकार वर्णन करूँगा॥
॥ चौपाई ॥
सिध चौरासी घट में होई। ता को देखा सुरति बिलोई॥
ता कर ठौर ठिकाना भाखों। आदि अंत ठीक कर ताकों॥
सिद्ध सिद्ध के नाम बताओं। छानि भेद सूच्छम दरसाओं॥
अर्थ-चौरासी सिद्ध घट के भीतर हैं, जिनको मैंने सुरति समाधि में खोकर (निमग्न होकर) मैंने
देखा है अब उनके ठौर तथा ठिकानों का वर्णन कर रहा हूँ और आदि से अन्त तक उसे सुधार कर
भी॥
सिद्धों के सिद्ध नाम कहता हूँ, उनके भेदों को छानकर (निचोड़कर) उनके सूक्ष्म संदर्भों का भी
वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ सिद्धों के नाम ॥
१. अजोनी सिद्ध १०. जैदेव "
२. अजर दया " ११. नलमोवर "
३. पवनगिरि " १२. परसोतम "
४. उचंद कँवल " १३. त्रिकुटीकमल "
५. उदद कँवल " १४. पुरुषोपत "
६. पेषनादार " १५. नलवोती "
७. नालीवर " १६. बाझभक्ष "
८. कोमार " १७. नाल पाजरी "
९. बालागिर " १८. पायापाल "
९२ / घट रामायण
१९. जैपाल ” ५२. सुचलेन ”
२०. अजया काल ” ५३. मजा गुनी ”
२१. केदारली ” ५४. तानी गंभीर ”
२२. रतनागिरि ” ५५. जगपती ”
२३. मेलमहंत ” ५६. गंधर्व सूत ”
२४. उदया ” ५७. रतनागिरि ”
२५. झकझेला ” ५८. सरोज मल ”
२६. उषमजार ” ५९. कुल कुम्भ ”
२७. मनउतगिरि ” ६०. पिगोभ ”
२८. सरपसोष ” ६१. गौड़ आसन ”
२९. जंभीर नागर ” ६२. पक्ष पती ”
३०. हंस मोह ” ६३. भाठ नाद ”
३१. बिराज ” ६४. गोहप माल ”
३२. ललित दया ” ६५. नरदया ”
३३. करुनामय ” ६६. इंद्र मनी ”
३४. बाष जार ” ६७. हंभीर ”
३५. जीव भूषन ” ६८. कहूक्तितोहल ”
३६. उदीत साह ” ६९. जंभीर नाद ”
३७. जगतधार ” ७०. द्याल पती ”
३८. साह पाल ” ७१. नेनौगार ”
३९. परन पोष ” ७२. काल मुनी ”
४०. नौनागर ” ७३. प्रेम मुनी ”
४१. ज्ञानपती ” ७४. हंस करनाग ”
४२. साधगिरि ” ७५. मल मोद ”
४३. नलदेव ” ७६. कूर नाकर ”
४४. सहस अपढ़ ” ७७. सुधन सरीष ”
४५. सुकृत जीव ” ७८. सुरति लोक ”
४६. ऊँच माया ” ७९. साध बाच ”
४७. सिंह नाद ” ८०. सुख बाच ”
४८. सहज तेज ” ८१. नेह नाच ”
४९. बेरंग नाद ” ८२. बस करन ”
५०. फूल काज ” ८३. भय मेटन ”
५१. केदार कोठ ” ८४. सुच भाव ”
॥ चौपाई ॥
चौरासी सिधि कथि बतलाई। सिधि इतने घट भीतर छाई॥
साधू कोइ करै परमाना। जिन घट के अंदर पहिचाना॥
अर्थ—चौरासी सिद्धों का कथन करके बतला दिया, यही इतने ही सिद्ध घट के भीतर स्थित
(छाये) हैं। जिन्होंने घट के अन्दर पहचान कर ली है, ऐसा ही कोई साधु ही उनका प्रमाण देगा॥
घट रामायण / ९३
॥ सोरठा ॥
चौरासी सिधि देख, घट रामायन में कहे।
अंतर काया पेखि, भिन्न भिन्न दरसाइया॥
अर्थ-चौरासी सिद्धों को घट के भीतर देखकर मैं घट रामायण में उन्हें कहता हूँ। शरीर के अन्दर
इन सिद्धों को देखकर कोई अन्य इन्हें भिन्न-भिन्न ढंग से कह सकता है॥
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस कहौं अनुसारी। ये सब घट के माहिं बिचारी॥
काया भेद देखि हम चीन्हा। ता कर लच्छ भाखि सब दीन्हा॥
अर्थ-पच्चीस प्रकृति अपनी बुद्धि के अनुसार बताता हूँ। इन सभी को घट के बीच विचार करो।
इनके स्वरूप भेद को देखकर हमने पहचान लिया और उनका लक्षण भी हमने बतला दिया है।
॥ सोरठा ॥
प्रकृती भेद बिचार, नाम नीक सबकी कही।
तुलसी तनहिं निहार, मन इस्थिर जब होइ जेहि॥
अर्थ-प्रकृति भेद को विचार करके उनका ठीक-ठीक नाम भी मैंने बताया है जब जिस क्षण मन
स्थिर हो, उस समय उनकी ओर देखकर (उन्हें पहचानो)॥
॥ चौपाई ॥
कौन कौन प्रकृति रे भाई। ता कर घर मैं देंव बताई॥
अर्थ-हे भाई! कौन कौन प्रकृति हैं उनको तुम घट के भीतर आकर देखो॥
॥ प्रकृतियों के नाम ॥
१. भाव प्रकृति १३. चंचलराज "
२. क्रता " १४. मजा गुन "
३. देंहधर " १५. मजा नन्द "
४. उषमजार " १६. अभयानन्द "
५. इद्रजै " १७. चतुरदया "
६. मोहदधि " १८. कजाकोग "
७. सुषम जार " १९. उचालम्भ "
८. मोह धन " २०. दया भवन "
९. केदार खंड " २१. ईस भोग "
१०. सफाकन्द " २२. कामिनि जोग "
११. नलदया " २३. मोहजार "
१२. उदासमुद्र " २४. नौ जोग "
२५. भँवर सोग "
२४ / घट रामायण
प्रकृतियों के नाम
१. भाव प्रकृति १४. भजा गुन "
२. क्रता " १५. मजानन्द "
३. देंहधर " १६. अभयानन्द "
४. उषमजार " १७. चतुरदया "
५. इंद्रजै " १८. कजाकोग "
६. मोहदधि " १९. उचालम्भ "
७. सुषम जार " २०. दया भवन "
८. मोह धन " २१. ईस भोग "
९. केदार खण्ड " २२. कामिनि जोग "
१०. सफाकन्द " २३. मोहजार "
११. नलदया " २४. नौ जोग "
१२. उदासमुद " २५. भँवर सोग "
१३. चंचलराज "
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस यही हैं साधौ। सब जीवन को इन्हीं बाँधौ ॥
सत्य सत्य मैं भाखों भाई। इन कर भेद कहौं समझाई ॥
पच्चीसों का घर हम भाखा। सत्य सब्द हिरदे में राखा॥
प्रकृति पचीस कहौं समझाई। मूढ़ जीव ज्ञानी होइ जाई ॥
अर्थ-हे साधुजन! पच्चीस प्रकृतियाँ यही हैं-समस्त जीवों को इन्हीं से बाँधों। हे भाई! मैं पूर्णतः
सच-सच कह रहा हूँ। इनका भेद मैं समझा रहा हूँ॥
इन पच्चीसों के घट का हमने वर्णन किया है (इनके वर्णन के संदर्भ में) मैंने सत्य शब्द को हृदय
में रखा है-मैं इन पच्चीस प्रकृतियों को समझाकर कहता हूँ, इनसे मूढ़ जीव ज्ञानी हो उठेगा ॥
॥ प्रकृति के सुभाव ॥
१. भाव को सुभाव आलस निद्रा जम्हाई।
२. क्रता को " काम क्रोध बिकार।
३. देंहधर को " खावै पीवै सुख बिनोद।
४. उषमजार को " मोर तोर निंद्रा
५. इंद्रजै को " हँसै खेलै रोवै।
६. मोहदधि को " मान गुमान बड़ाई प्रभुता।
७. सुषमजार को " उच्चाट भय त्रास और दण्ड
८. मोह धन को " सिकार उदासी जारै बारै जीव
जन्त्र मन्त्र सेवा करै।
९. केदार खंड को " एक काम चित्त रहै कामिनि
घट रामायण / ९५
सुख।
१०. सफाकन्द को " चोरी से राति बिराति आवै जावै।
११. नलदया को " होम बहुत करै और आसा
लगावै।
१२. उदासमुद्र को " चित चंचल छगुनिया टेढ़ा चलै
कर मोड़े
१३. चंचल राज को " खरा लेवै खरा देवै खरी बात
खरा रहे
१४. मजा गुन को " निडर निरभय निरमोह।
१५. मजा नन्द को " दया धर्म पुन्य षट कर्म।
१६. अभयानन्द को " तीरथ बरत मठ बनावै।
१७. चतुरदया को " बहुत गावै बतावै नाचै नैन उलारै।
१८. कजाकोग को " झूठ बोलै मीठा रहे स्वारथ रत।
१९. उचालंभ को " ज्ञान ध्यान गुरू सब्द कुछ न
रक्खै।
२०. दया-भवन को " नीके कपरा खाना बिछौना नीक
बसिवौ।
२१. ईस-भोग को सुझाव
देव पूजै " फूल पत्र चढ़ावै पीछे द्रव्य माँगे।
२२. कामिनि-जोग को " भले मनुष्यन में रहे ऊँचे संग बैठे
नीचे संग न करै अच्छी बात कहै
और प्रीति न तोरै।
२३. मोहजार को " कुबचन भाखै पहिले दे पीछे माँगे
माया तकै।
२४. नौजोग को " तरंग बाहिर मन भरमै शोक
में रहे।
२५. भँवर-जोग को " मीठा बोलै कौड़ी जाते
प्रान जाय।
॥ चौपाई ॥
देखौ संतौ प्रकृति सुभाऊ। ये सुभाव घट माहिं रहाऊ॥
अर्थ--हे सन्तों! प्रकृति के स्वभाव को देखें-ये समस्त स्वभाव घट के भीतर निवास करते हैं।
९६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
यह सुभाव घट माइँ, भिन्न भिन्न करि भाखिया।
लेखा अजब बनाइ, चीन्हें सुरति सँवारि कै॥
अर्थ–ये स्वभाव घट के भीतर हैं–मैंने इनको भिन्न-भिन्न रूप में रखकर उनका वर्णन किया है–
मैंने इन्हें आश्चर्यजनक बनाकर रखा है–इन्हें सुरति समाधि में भलीभांति सँवार कर समझो॥
॥ चौपाई ॥
घट भीतर नौ नारी भाखी। सो तुलसी ने देखा आँखी॥
अर्थ–घट के भीतर मैंने नौ नाड़ियों का वर्णन किया है। उन्हें तुलसीदास ने सही-सही देखा है–
॥ नाड़ियन के नाम ॥
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
नाड़ियन के नाम
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
॥ पाँच इंद्रियन के नाम ॥
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
३. समान "
इंद्रियों के नाम
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
॥ इंद्रियन के बास ॥
१. अपान का बास – नाभी में है।
२. प्रान का बास – मान सरोवर तट वार है।
३. समान का बास – कलेजे में है।
४. उदान का बास – कंठ में है।
५. ब्यान का बास – सब शरीर में है।
घट रामायण / ९७
इंद्रियों के बास
१. अपान का बास—नाभी में है।
२. प्रान का बास—मान सरोवर तट वार है।
३. समान का बास—कलेजे में है।
४. उदान का बास—कंठ में है।
५. व्यान का बास—सब शरीर में है।
॥ सोरठा ॥
इंद्री अर्थ बिचार, नाम भेद सब भाखिया।
ठीका ठौर निहार, यह पुकार तुलसी कहा॥
अर्थ–इन्द्रियों के अर्थ पर विचार करते हुए उनके नाम और सभी भेदों का वर्णन कर दिया है।
उनके ठौर-ठिकाने को देखकर तुलसी ने यह सब पुकार कर बताया है॥
॥ सोरठा ॥
यह इंद्री का किया निषेदा। मन चीन्है सोई जाने भेदा॥
या की साखि सोत सब गाई। अब सुन्नन की कहौं लखाई॥
बाइस सुन्न सोध हम लीन्हा। ताकर भिन्न भिन्न कहूँ चीन्हा॥
अर्थ–यहाँ यह घट वर्णन इन्द्रियों का निषेध है–जिसने मन को पहचान लिया है, वही भेदों को भी
जानता है। इसकी साक्षी तथा उसके स्रोतों को मैंने गान किया। अब शून्य का वर्णन करता हूँ। मैंने शोध
करके बाईस सून्नों को समाया है और उनकी भिन्नताओं को मैंने भिन्न-भिन्न रूप में पहचाना है॥
॥ सुन्नन के नाम ॥
१. धुंधार सुन्न १२. नौखंड सुन्न
२. सब्दार '' १३. अलख ''
३. नौनार '' १४. पलक ''
४. अजसार '' १५. खलक ''
५. बिलंद '' १६. झलक ''
६. सुखनंद '' १७. सरवाट ''
७. अछरंद '' १८. दसघाट ''
८. सबसंध '' १९. खिरकाट ''
९. ब्रह्मांड '' २०. अजआठ ''
१०. सबअंड '' २१. सतलोक ''
११. भौभंड '' २२. परमोख ''
॥ शून्यों के नाम ॥
१. धुंधार शून्य १२. नौखंड शून्य
२. सब्दार '' १३. अलख ''
३. नौनार '' १४. पलक ''