घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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सुख।
१०. सफाकन्द को " चोरी से राति बिराति आवै जावै।
११. नलदया को " होम बहुत करै और आसा
लगावै।
१२. उदासमुद्र को " चित चंचल छगुनिया टेढ़ा चलै
कर मोड़े
१३. चंचल राज को " खरा लेवै खरा देवै खरी बात
खरा रहे
१४. मजा गुन को " निडर निरभय निरमोह।
१५. मजा नन्द को " दया धर्म पुन्य षट कर्म।
१६. अभयानन्द को " तीरथ बरत मठ बनावै।
१७. चतुरदया को " बहुत गावै बतावै नाचै नैन उलारै।
१८. कजाकोग को " झूठ बोलै मीठा रहे स्वारथ रत।
१९. उचालंभ को " ज्ञान ध्यान गुरू सब्द कुछ न
रक्खै।
२०. दया-भवन को " नीके कपरा खाना बिछौना नीक
बसिवौ।
२१. ईस-भोग को सुझाव
देव पूजै " फूल पत्र चढ़ावै पीछे द्रव्य माँगे।
२२. कामिनि-जोग को " भले मनुष्यन में रहे ऊँचे संग बैठे
नीचे संग न करै अच्छी बात कहै
और प्रीति न तोरै।
२३. मोहजार को " कुबचन भाखै पहिले दे पीछे माँगे
माया तकै।
२४. नौजोग को " तरंग बाहिर मन भरमै शोक
में रहे।
२५. भँवर-जोग को " मीठा बोलै कौड़ी जाते
प्रान जाय।
॥ चौपाई ॥
देखौ संतौ प्रकृति सुभाऊ। ये सुभाव घट माहिं रहाऊ॥
अर्थ--हे सन्तों! प्रकृति के स्वभाव को देखें-ये समस्त स्वभाव घट के भीतर निवास करते हैं।