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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 150 में से

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पृष्ठ 87

२४ / घट रामायण
प्रकृतियों के नाम
१. भाव प्रकृति १४. भजा गुन "
२. क्रता " १५. मजानन्द "
३. देंहधर " १६. अभयानन्द "
४. उषमजार " १७. चतुरदया "
५. इंद्रजै " १८. कजाकोग "
६. मोहदधि " १९. उचालम्भ "
७. सुषम जार " २०. दया भवन "
८. मोह धन " २१. ईस भोग "
९. केदार खण्ड " २२. कामिनि जोग "
१०. सफाकन्द " २३. मोहजार "
११. नलदया " २४. नौ जोग "
१२. उदासमुद " २५. भँवर सोग "
१३. चंचलराज "
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस यही हैं साधौ। सब जीवन को इन्हीं बाँधौ ॥
सत्य सत्य मैं भाखों भाई। इन कर भेद कहौं समझाई ॥
पच्चीसों का घर हम भाखा। सत्य सब्द हिरदे में राखा॥
प्रकृति पचीस कहौं समझाई। मूढ़ जीव ज्ञानी होइ जाई ॥
अर्थ-हे साधुजन! पच्चीस प्रकृतियाँ यही हैं-समस्त जीवों को इन्हीं से बाँधों। हे भाई! मैं पूर्णतः
सच-सच कह रहा हूँ। इनका भेद मैं समझा रहा हूँ॥
इन पच्चीसों के घट का हमने वर्णन किया है (इनके वर्णन के संदर्भ में) मैंने सत्य शब्द को हृदय
में रखा है-मैं इन पच्चीस प्रकृतियों को समझाकर कहता हूँ, इनसे मूढ़ जीव ज्ञानी हो उठेगा ॥
॥ प्रकृति के सुभाव ॥
१. भाव को सुभाव आलस निद्रा जम्हाई।
२. क्रता को " काम क्रोध बिकार।
३. देंहधर को " खावै पीवै सुख बिनोद।
४. उषमजार को " मोर तोर निंद्रा
५. इंद्रजै को " हँसै खेलै रोवै।
६. मोहदधि को " मान गुमान बड़ाई प्रभुता।
७. सुषमजार को " उच्चाट भय त्रास और दण्ड
८. मोह धन को " सिकार उदासी जारै बारै जीव
जन्त्र मन्त्र सेवा करै।
९. केदार खंड को " एक काम चित्त रहै कामिनि