घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० / घट रामायण
उनचासवाँ मर्मों नाम का है-जिस स्थान पर पवन निरन्तर आकाश की ओर उठता रहता है।
पचासवें कोठे का नाम घूघर है और उस स्थान पर श्रीहरि का तेज निवास करता है॥
इक्यावनवाँ कोठे का नाम मजकूर है-उस स्थान पर सहस्रार कमल खिला हुआ है। बावनवे कोठे
का नाम जरा दे है-उस स्थान पर उच्च शिखा वाली अग्नि जलती रहती है॥
तिरपनवें कोठे का नाम तेराधर है, जहाँ धीर गम्भीर निवास किया करते हैं। चौवनवाँ कोठा सिसंदर
नाम का है-उस स्थान पर सत्य तथा सन्तोष निवास करते हैं॥
पचपनवें कोठे का नाम हिंडोला है, नवों नाड़ियाँ उस स्थान पर निवास करती हैं। छप्पनवें कोठे का
नाम निरधर है-जहाँ अठ्ठारहों भार निवास करते हैं॥
सत्तावनवें कोठे का नाम कफा दे है-जीव की मृत्यु वहाँ निवास करती है। अट्ठावनवें का नाम सुमेर
बल है-जहाँ मंगल नाम का पुरुष निरन्तर चरित्र गायन करता रहता है॥
उनसठवें कोठे का नाम 'छे सुन्दर' है-जहाँ स्वयं आलस्य निवास करता है। साठवाँ कोठा धौलासुर
है-तीनों लोकों की पृथ्वी वहाँ निवास करती है॥
इकंसठवें कोठे का नाम जैसुन्दर है-शक्तिशाली पुरुष वहाँ निवास करते हैं। बासठवाँ कोठा हीरापुर
नाम का है-वहाँ निरन्तर झर झर कर जल चूता रहता है॥
तिरसठवें कोठे का नाम कलाकर है-जिस स्थान पर चौदहों भुवन निवास करते रहते हैं। चौसठवाँ
कोठा तिल विक्रम कहलाता है, उस स्थान पर जल, स्थल तथा कुम्भ तीनों का निवास है॥
पैंसठवें कोठे का नाम सुरत सर है-जहाँ सभी जप, तप एवं यज्ञ करते हैं। छियाछठवाँ कोण
शिखरिकल है-जहाँ असंख्य योगी योग करते हैं॥
सरसठवाँ कोठा आनन्दी माँ का है-वहाँ काल निवास नहीं करने पाते। अड़सवें कोठे का नाम
'चिता दे' है-उस स्थान पर चित्त का चक्र निरन्तर घूमा करता है॥
उनहत्तरवें कोठे का नाम सनीता है, जहाँ ज्ञानी बुद्ध निवास किया करते हैं। सत्तरवाँ कोठा सलीका
नाम का है जहाँ शून्य की धुन निरन्तर उठती रहती है॥
इकहत्तरवाँ कोठा उदाधर नाम का है, जहाँ संसार के पालन कर्त्ता ईश्वर बैठे रहते हैं। बहत्तरवें
कोठे का नाम गंजधर है जिस स्थान पर मूल कर्म (करनी) बैठी रहती है॥
मैंने इस प्रकार, बहत्तर कोठों का बखान करके वर्णन किया है-जो पहचान में आए उसे हे
साधुजन! तू अपने घर में (भीतर) पहचान ले। इस घट को देख-देखकर इसके विषय में वही कह
सकता है-जिसने समझ-समझ कर साधुजन की रक्षा की है॥
इस प्रकार, मैंने घट रामायण कहकर समझाया है और उसे कह करके घट के भीतर दिखाया भी
है॥ काया में ही इन सबको खोजकर मुक्ति प्राप्त करो क्योंकि बिना खोज सब विनष्ट हो उठते ॥
शरीर (घट) के भीतर ही सबकी पूजा है-शिव-सनकादि बिना साधना एक सूझते नहीं (अतः
साधना करके) उन्हें समझो। उनको बाहर मानकर कहते-कहते सब भूल गए किन्तु काया के भीतर
उन्हें मूलतत्त्व (वस्तु) नहीं दिखा॥
हमने बहत्तर कोठों में उन्हें बताकर कह दिया है और किसी ने भी उन्हें शरीर के भीतर नहीं पहचाना
है। विद्वान अपने संस्कृत के शास्त्र ग्रंथों में गर्व से फूले रहते हैं, और ऋषि, मुनि तथा योगेश्वर भी
अहम्भाव में भूले हुए दिखते हैं॥
इसी कारण उन्होंने न अध्यात्म का मार्ग प्राप्त किया और न उसका कोई घाट तथा वे भवजल के
बीच कर्म के भ्रम तथा अहम् में बह गए॥
॥ दोहा ॥
सत्तनाम सुरति गहै सत गुरु सरन निवास।
तुलसी तरंग तरास ज्यों लखि पहुँचे तेहिं पास ॥