घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
यह सुभाव घट माइँ, भिन्न भिन्न करि भाखिया।
लेखा अजब बनाइ, चीन्हें सुरति सँवारि कै॥
अर्थ–ये स्वभाव घट के भीतर हैं–मैंने इनको भिन्न-भिन्न रूप में रखकर उनका वर्णन किया है–
मैंने इन्हें आश्चर्यजनक बनाकर रखा है–इन्हें सुरति समाधि में भलीभांति सँवार कर समझो॥
॥ चौपाई ॥
घट भीतर नौ नारी भाखी। सो तुलसी ने देखा आँखी॥
अर्थ–घट के भीतर मैंने नौ नाड़ियों का वर्णन किया है। उन्हें तुलसीदास ने सही-सही देखा है–
॥ नाड़ियन के नाम ॥
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
नाड़ियन के नाम
१. इड़ा नाड़ी 6. कर जाप नाड़ी
२. पिंगला " ७. हंस-बंदनी "
३. सुषमना " ८. हरि कामिनि "
४. भामिनी " ९. बरना "
५. रमना "
॥ पाँच इंद्रियन के नाम ॥
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
३. समान "
इंद्रियों के नाम
१. अपान इंद्री ४. उदान इंद्री
२. प्रान इंद्री ५. ब्यान "
॥ इंद्रियन के बास ॥
१. अपान का बास – नाभी में है।
२. प्रान का बास – मान सरोवर तट वार है।
३. समान का बास – कलेजे में है।
४. उदान का बास – कंठ में है।
५. ब्यान का बास – सब शरीर में है।