घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ९१
अर्थ-सुरति समाधि द्वारा सत्य के नाम का ग्रहण करके जो सतगुरु की शरण में निवास करता है-
जैसे तरंगों की लहरें अन्ततः उसको देखती हुई। वह सभी समुद्र-ब्रह्म के पास पहुँच जाती हैं॥
॥ छन्द ॥
घट की गति गाई भाखि सुनाई। लखि पाई पद पार कही॥
जो जो परमाना घट मठ जाना। ठाम ठिकाना ठौर मई॥ १॥
तुलसी तस देखा घट बिच लेखा। पेखा तत मत पूर जही॥
आगे जस होई भाखौं सोई। जो जो सिद्ध समाधि लई॥ २॥
अर्थ-घट के ज्ञान को गाकर तथा कहकर सुना दिया और उसे मैं उस पार पाकर देखा और उसके
विषय में कहा। मैं घट के मठ का जो-जो प्रमाण, स्थान, ठिकाना ठौर जानता था (वर्णन किया) ॥ १॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने इस पिंड के बीच जैसा देखा था, वैसा-वैसा पूरी तरह से बता दिया।
आगे उसका जो अन्य रूप होगा, उसका वैसा ही वर्णन करूँगा, जिन रूपों में सिद्धों ने समाधि में देखा
है (प्राप्त किया है)-उसको भी उसी रूप में वर्णित करूँगा॥ २॥
॥ सोरठा ॥
सिध चौरासी नाम, घट भीतर सब देखिया।
ता कर कहों बखान, जस जस ठीका नाम गुन॥
अर्थ-सिद्धों के चौरासी नाम (रूप) हैं-जिन्हें मैंने घट के भीतर देखा है। उनके नाम तथा गुण
जिस-जिस प्रकार से ठीक लगेंगे, मैं उनका इस प्रकार वर्णन करूँगा॥
॥ चौपाई ॥
सिध चौरासी घट में होई। ता को देखा सुरति बिलोई॥
ता कर ठौर ठिकाना भाखों। आदि अंत ठीक कर ताकों॥
सिद्ध सिद्ध के नाम बताओं। छानि भेद सूच्छम दरसाओं॥
अर्थ-चौरासी सिद्ध घट के भीतर हैं, जिनको मैंने सुरति समाधि में खोकर (निमग्न होकर) मैंने
देखा है अब उनके ठौर तथा ठिकानों का वर्णन कर रहा हूँ और आदि से अन्त तक उसे सुधार कर
भी॥
सिद्धों के सिद्ध नाम कहता हूँ, उनके भेदों को छानकर (निचोड़कर) उनके सूक्ष्म संदर्भों का भी
वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ सिद्धों के नाम ॥
१. अजोनी सिद्ध १०. जैदेव "
२. अजर दया " ११. नलमोवर "
३. पवनगिरि " १२. परसोतम "
४. उचंद कँवल " १३. त्रिकुटीकमल "
५. उदद कँवल " १४. पुरुषोपत "
६. पेषनादार " १५. नलवोती "
७. नालीवर " १६. बाझभक्ष "
८. कोमार " १७. नाल पाजरी "
९. बालागिर " १८. पायापाल "