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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

घट रामायण / ९३
॥ सोरठा ॥
चौरासी सिधि देख, घट रामायन में कहे।
अंतर काया पेखि, भिन्न भिन्न दरसाइया॥
अर्थ-चौरासी सिद्धों को घट के भीतर देखकर मैं घट रामायण में उन्हें कहता हूँ। शरीर के अन्दर
इन सिद्धों को देखकर कोई अन्य इन्हें भिन्न-भिन्न ढंग से कह सकता है॥
॥ चौपाई ॥
प्रकृति पचीस कहौं अनुसारी। ये सब घट के माहिं बिचारी॥
काया भेद देखि हम चीन्हा। ता कर लच्छ भाखि सब दीन्हा॥
अर्थ-पच्चीस प्रकृति अपनी बुद्धि के अनुसार बताता हूँ। इन सभी को घट के बीच विचार करो।
इनके स्वरूप भेद को देखकर हमने पहचान लिया और उनका लक्षण भी हमने बतला दिया है।
॥ सोरठा ॥
प्रकृती भेद बिचार, नाम नीक सबकी कही।
तुलसी तनहिं निहार, मन इस्थिर जब होइ जेहि॥
अर्थ-प्रकृति भेद को विचार करके उनका ठीक-ठीक नाम भी मैंने बताया है जब जिस क्षण मन
स्थिर हो, उस समय उनकी ओर देखकर (उन्हें पहचानो)॥
॥ चौपाई ॥
कौन कौन प्रकृति रे भाई। ता कर घर मैं देंव बताई॥
अर्थ-हे भाई! कौन कौन प्रकृति हैं उनको तुम घट के भीतर आकर देखो॥
॥ प्रकृतियों के नाम ॥
१. भाव प्रकृति १३. चंचलराज "
२. क्रता " १४. मजा गुन "
३. देंहधर " १५. मजा नन्द "
४. उषमजार " १६. अभयानन्द "
५. इद्रजै " १७. चतुरदया "
६. मोहदधि " १८. कजाकोग "
७. सुषम जार " १९. उचालम्भ "
८. मोह धन " २०. दया भवन "
९. केदार खंड " २१. ईस भोग "
१०. सफाकन्द " २२. कामिनि जोग "
११. नलदया " २३. मोहजार "
१२. उदासमुद्र " २४. नौ जोग "
२५. भँवर सोग "