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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

घट रामायण / ५७
जो जेड़ मूल भेद दरसावै। तब घट में अबिनासी पावै॥
सतसँग भक्ति हृदे बिच आवै। जब सतद्वार अगम लखि पावैं॥
हिरदै सत्त रहे लौ लाई। सब्द द्वार चढ़ि काल गिराई॥
मुक्ति ज्ञान पावै अबिनासी। अगम ज्ञान संग मूल निवासी॥
यह कोइ बिरला साधू पावै। अबिनासी गति अगम लखावै॥
सतगुरु कृपासिंधु कोइ जागै। आवा गवन भर्म भौ भागै॥
कीन्ही अगम नाम स्रुति सैला। चीन्हा अगम निगम तिन खेला॥
अधर सिखर पर तंबू तानै। जहाँ से देखै सकल जहानै॥
ब्रह्मांड द्वार एक है नाका। गहि दुरबीन सुरति से ताका॥
मकर तार पावै वह द्वारा। ता पर सुरति होय असवारा॥
सुरति जात लागै नहिं बारा। चली सुरति भड़ नाम अधारा॥
तब पहुँचै इक्किसवें द्वारा। सुन्न से परे सब्द है न्यारा॥
सुरति सब्द में जाइ समानी। निर सब्दी गति अगम लखानी॥
जहाँ नहिं पहुँचै मुक्ति पसारा। सोइ है आदि पुरुष दरबारा॥
मुनि अचार पावै नहिं कोई। सब भौ भर्म रहा जग सोई॥
अर्थ—आध्यात्मिक रस से रिक्त ये सब काल के जाल हैं। ये संसार की भौतिक लोक रचना की
खानि हैं और इन सबमें यमराज की प्रीति है, ऐसा जानो॥ शून्याकाश मंडल पर काल का स्थान है और
पंचमहाभूत तत्त्व विधिपूर्वक उसमें जाकर समा गए हैं। पंच महाभूत तत्त्व, पच्चीस तन्मात्राएँ तथा तीनों
गुणों का मन यहाँ मैला हो गया है—तुम सब यह उसी निर्गुण ब्रह्म का ही खेल समझो॥ काल ने माया
जाल को खाकर उसे और बढ़ा दिया—कोई ऋषि, मुनि उसके भेद को न समझ सका॥
जब साधक उल्टीरीति (मनोन्मनी द्वारा) शून्याकाश की ओर दौड़ता है फिर वहाँ काल मुरझा जाता
है। साहब सतगुरु जब मार्ग दर्शन कराते हैं तब पिंड के भीतर स्थित संसार का परिचय होता है। जो भी
साधक इस मूल तत्त्व का भेद बताता है तभी इस घट के अन्तर्गत कोई संत अविनाशी तत्त्व (निरंजन-
ब्रह्म) का परिचय प्राप्त करता है। जब अगम्य 'सत्' द्वार दिखाई पड़ेगा, तभी सत्संगति तथा भक्ति
हृदय के बीच आएगी॥
यदि हृदय में सत्य की लौ लगाए रहोगे तो शब्द के द्वार से चढ़कर काल को गिरा दोगे (नष्ट कर
दोगे)। अगम्य ज्ञान के साथ का मूल निवासी अविनाशी मुक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। इसे कोई विरला
साधु ही प्राप्त करता है। सतगुरु की कृपा-सिन्धु से ही कोई जागृति प्राप्त करता है, वह शून्याकाश में
आता है, तब उसका समस्त अज्ञानजनित संसारिक भ्रम भाग जाता है।
नामरूपी सुरति पर्वत को उसने अगम्य बना दिया है किन्तु जिन्होंने उस अगम्य। सुरति ज्ञान (तत्त्व)
तथा शास्त्र के ज्ञान तत्त्व को पहचान लिया है, वहाँ वही क्रीड़ा करता है।
अधर-शिखर पर वह तम्बू तानता है और वहाँ से वह सम्पूर्ण जगत को देखता रहता है। ब्रह्मांड द्वार
पर एक नाका है- (केन्द्र स्थान) वहाँ से वह सुरति रूपी दूरबीन से ताकता है। उस द्वार पर मकर तार
हैं उस पर सुरति सवार होती है। सुरति के चढ़कर जाने में देर नहीं लगती। यह सुरति वहाँ जाकर नाम
का आधार बन जाती है। तब इक्कीसवें द्वार पर पहुँचता है, जहाँ शून्य के अनाहत नाद से परे एक
विलक्षण शब्द है। जो सुरति ज्ञान में जाकर समा जाता है, उसे शब्दहीन सृष्टि की अगम्यगति दिखाई

५८ / घट रामायण
पड़ती हैं। मुक्ति का फैलाव जहाँ नहीं पहुँच पाता, वही आदि पुरुष का दरबार है—कोई भी मुनि इस
दरबार का आचरण नहीं जान पाता और इस संसार का सम्पूर्ण मर्म उसी में खोया (विलीन) रहता है॥
भँवर गुफा मारग चढ़ि देखा। जहँ जिव सत्त सुरत का लेखा॥
सुन्न सुन्न सब करत बखाना। सुन्न भेद कोइ बिरले जाना॥
कहीं बिस्तार सुन्न की जोई। ज्यों गूलर फल कीट समोई॥
फल जेते तेते ब्रह्मांडा। दीप दीप फल फल नौ खंडा॥
सुन्न अंड की करी बखाना। कहै तुलसी कोइ साधू जाना॥
अर्थ—भ्रमर गुफा के मार्ग पर चढ़कर देखा—जहाँ भी सत्य है और केवल वहाँ सुरति का ही तत्त्व
(लेख) है। शून्य-शून्य सभी कहते हैं किन्तु शून्य का भेद कोई विरले ही जानते हैं।। अब विस्तारपूर्वक
शून्य जो है उसका अर्थात् शून्य का वर्णन करता हूँ। मनुष्य शून्य में उसी प्रकार सन्निहित है, जैसे गूलर
फल में कीट। गूलर में जितने फल हैं, उतने ही ब्रह्मांड हैं फल ही सारे द्वीप हैं और वही द्वीपों के
नवखंड हैं। उसी क्रम में मैं शून्य में स्थित अंड (पिंडों) का वर्णन करता हूँ तुलसी साहब कहते हैं, इसे
कोई साधु-जन ही जानता है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी सुन्न निवास, सब्द बास जिन घर किया।
जिमि गूलर फल तासु, जग भिनि भिनि जेहि लखि परा॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि शब्द मूल के निवास को जिसने अपना घर बना लिया है, उसी का
निवास शून्य में है—जैसे गूलर के फल जिन्हें-भिन-भिन जैसे भी लख पड़ा हो॥
॥ छन्द ॥
भये सुन्न निवासी सब सुख रासी। सुरति बिलासी सब्द मई॥
अनहद हद पारा अगम अपारा। अमी सिंधु स्रुति जाड़ लई॥ १॥
देखा उँजियारा घट घट प्यारा। निरखि निहारा पार कही॥
तुलसी तुल जावै दस दिस पावै। सिंध फोड़ि असमान गई॥ २॥
अर्थ—शून्य निवासी साधु सभी सुखों की राशि बन जाते हैं, वे सुरति ज्ञान के विलासी तथा अनाहत
शब्द मय हैं। इस अनाहत नाद के पार अपार और अगम्य अमृत सिंधु है—जिसे सुरति में जाकर प्राप्त
करता है॥ १॥
चारों ओर घट-घट में प्यारा उजाला देखा उसे देखकर, दूर कहीं उसके पार देखा। तुलसी साहब
कहते हैं कि उसके पास (तुल) जाकर दसों दिशाओं को प्राप्त करता है—लगता है, यह मनोन्मनी सिन्धु
को फाड़कर आकाश में पहुँच गई है॥ २॥
॥ दोहा ॥
सुन्न महल अजपा जपै, समुँद सिखरि के पार।
टूटी गगन गिरा भई, सत्त सब्द झनकार॥
त्रिकुटी टाटी टूटि कै, सुन्न अंड भिनि बास।
घट भीतर परिचय भई, देखा अजर निवास॥

घट रामायण / ५९
अर्थ—समुद्र के शिखर के पार शून्याकाश में साधु का महल है और साधु जन यहां अजपाजाप
करते रहते हैं। यह शून्याकाश भी जब टूट जाता है, साधक की वाणी 'सत्य' शब्द की झंकार
(झंकृति) बन जाती है।
इस सिद्धावस्था में त्रिकुटी के टट्टर टूट कर शून्य पिंडाकाश में विचित्र सुगंधि से सुवासित
(भिनि) हो जाते हैं। इस घट के भीतर उस निरंकार से परिचय हो जाता है—इस प्रकार मैंने उस अजिर
ब्रह्म का निवास देखा है॥
॥ कँवल भेद॥ चौपाई॥
घट में सोधि कँवल जिन गाई। लखै कँवल बिरला कोइ भाई॥
अंकुर उतपति कँवल मँझारा। सत्त नाम पद तिनके पारा॥
ऊँच नीच परबत बिच बाटा। काल जहाँ रोकै नहिं घाटा॥
ता के दहिने मारग माई। दामिनि पाँच छेकि नियराई॥
देवै दानी दान चुकाही। पावै जीव अगम की राही॥
दानी कहै जीव सुनि बाता। बिना दान करिहौं मैं घाता॥
जब जिव कहै समझ सुन भाई। करौ घात केहि कारन जाई॥
अर्थ—इसी पिंड में अन्वेषण करके जिन्होंने कमल का वर्णन किया है, (वैसा वर्णन) कोई बिरला
बंधु ही कर सकता है। 'सत्तनाम' जिनके वश (पारा) में है, वे ही जानते हैं कि कमल के मध्य में
अंकुर की उत्पत्ति होती है। ऐसे जन, ऊँचे-नीचे पर्वत के बीच अपना सिद्धि मार्ग पा जाते हैं और वहाँ
काल घाट नहीं रोकता॥ हे सखी! उसी के दाहिने मूल मार्ग है, और वहाँ समीप आते ही पाँच बिजलियाँ
रास्ता रोक लेती हैं। यहाँ दानी साधु सर्वस्व दान चुकाकर, (वह जीव) अगम्य की राह प्राप्त करता है।
दानी कहता है कि हे जीव! मेरी बात तो सुनो-मैं बिना दान के घात करूँगा। तब जीव कहता है कि हे
भाई सुनो, किस कारण वहाँ जाकर घात करोगे?
॥ भेद पिंड और ब्रह्माण्ड का॥
अंतर गुफा तहाँ चलि जाऊँ। जहाँ साहिब के दरसन पाऊँ॥
पाँचौ नाम जीव जब भाखा। छठवाँ नाम गुप्त करि राखा॥
पाँचौ नाम काल के जानौ। तब दानी मन संका आनौ॥
निरगुन निराकार निरबानी। धर्मराय यों पाँच बखानी॥
जीव नाम निज कहै बिचारी। जानि बूझि दानी झख मारी॥
जाव जीव यह राह तुम्हारी। हम नहिं रोकैं बात बिचारी॥
पोचं पाँच हमहूँ सुनि पाई। हम नहिं निकट तुम्हारे आई॥
पोचं चोर रहे अलगाई। होइ निरभै जिव आगे जाई॥
आगे सात सुमेर उँचाई। नौ नाटक तापर रहैं भाई॥
नौ नाटक पूछन चले आगे। कहौ जीव केहि मारग लागे॥
हम यहि घाट बाट रखवारी। यहाँ न अदली चलै तुम्हारी॥
कहै जीव दृग दानी भाई। हम चलि जाइ नाम चित लाई॥

६० / घट रामायण
दानी दान चुकावौ आई। जब यहि बाट निभन तुम पाई॥
केहि कर अंस कहाँ तुम जाई। बात अपनी कहौ बुझाई॥
कहै जीव सतलोक निवासा। मैं चल जावँ पुरुष के पासा॥
दानी कहै दूरि है भाई। अगम पथ कैसे निभ जाई॥
कौन नाम मारग को जाई। कौन नाम से उबरै आई॥
इतना भेद कहौ समझावा। बाट जीव जब घर की पावा॥
अर्थ-जहाँ अन्र्तगुफा है, वहाँ चला जाकर साहिब (निरंकार ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करूँगा। जब
जीव ने पाँचों नाम बताना शुरू किया तब अन्त में उसने छठवाँ नाम गुप्त कर रखा। ये पाँचों नाम काल के
ही समझो। इसे सुनकर उस धर्मनिष्ठ (यानी - दान देने वाले) के मन में शंका हुई। धर्मराज यम ने
केवल निर्गुण, निराकार एवं वर्ण विहीन आदि पाँच की चर्चा की है, जीव ने अपने उस अलेख नाम का
वर्णन नहीं किया-और तब वह धर्मनिष्ठ जानबूझकर मुखमार कर बोला-हे जीव! जाओ, यह वह
तुम्हारी राह है, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो गए और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा।
आगे सात पर्वतों का ऊँचा शिखर हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियाँ हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव
पूछने चला-तो उत्तर मिला! हे जीव! जाओ, यह तुम्हारी राह हैं, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं
रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा। आगे
सात पर्वतों की ऊँची शिखाए हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियां हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव पूछने
चला-तो उत्तर मिला! हे जीव-तुम किस मार्ग से लगोगे या चलोगे। मैं इन घाटों-बाटों का रखवारा हूँ-
यहाँ पर तुम्हारी अदला-बदली नहीं चलेगी।
जीव कहने लगा, हे दृष्टि प्रदान करने वाले भाई! हम तो चित्त में नाम लेकर चलते रहे हैं। धर्मनिष्ठ
(धर्मराज यमराज) ने कहा हे भाई दानी, जब तुम आकर यहाँ दान चुकाओ, तभी इस मार्ग से तुम्हारा
निस्तार होगा। तुम किसके अंश हो, तुम कहाँ जा रहे हो, अपनी बात तुम समझा कर कहो।
जीव ने बताया कि उसका निवास 'सत् लोक' में है और मैं उस निरंकार पुरुष के पास चलकर
जाना चाहता हूँ। धर्मनिष्ठ बोला, वह तो बहुत दूर है, उस तक पहुँचने का मार्ग अगम्य है, तुम्हारा
पहुँचना वहाँ कैसे हो सकेगा? उसका नाम क्या है। उसका मार्ग क्या है, जब वह इन सारे भेदों को बता
सका, तभी उस जीव को अपने घर का मार्ग प्राप्त किया॥
॥ जीव वचन। चौपाई ॥
दानी सुनु बिधि बात हमारी। हम चलि जाइँ पुरुष दरबारी॥
सुरति निरति लै लोक सिधाऊँ। आदि नाम लै काल गिराऊँ॥
सत्त नाम लै जीव उबारी। अस चल जाऊँ पुरुष दरबारी॥
इतना बचन कही दिल सूना। बहुत त्रास लै मन में गूना॥
तुम मारग जावो जिव अपने। हम तुमको रोकें नहिं सपने॥
चले जीव आगे पग दीन्हा। करिया सरवर मारग लीन्हा॥
तहँ तौ पंछी एक रहाई। निस बासर वो बैठ ऊँचाई॥
तेहि मारग जिव चला अघाई। चोंचि पसार खान को चाही॥

घट रामायण / ६१
मुख पंछी बहु भाँति पसारा। जिवरा तो को करौं अहारा॥
अपना नाम कहौ टक plug / टक plug... टक plug -> टक plug is टक plug? No: अपना नाम कहौ टक plug... let's read properly: अपना नाम कहौ टक plug -> अपना नाम कहौ टक plug... "टकसारा" । तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥ -> अपना नाम कहौ टक plug ... it clearly says: अपना नाम कहौ टकसारा। तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥
नहिं हम से तुम बचने पैहौ। तो को जिवरा धर धर खैहौं।
जिवरा सुरति नाम से लाया। करिया मारि पाँव तर नाया॥
जीव चला झरने के पारा। दस दिस देखि परा उँचियारा॥
अमी द्वार इमरत कर बासा। मिटा जीव का संसय सासा॥
अधर जीव इमरत को पीवै। सब्द बुंद इमरत जुग जी वै॥
बस्तु पाइ साधै कोइ साधू। चाखै इमरत सुरति समाधू॥
चटि चटि सूरति चढ़ी अटारी। इमरत अजर नाम की लारी॥
साहिब अजर सब्द घर पावै। आवागवन बहुरि नहिं आवै॥
डोरी पुरुष अकास अकेला। किया सुरति घट भीतर मेला॥
इमरत कँवल भरा भँडारा। पी वै जिव सो उतरै पारा॥
नाम अगाध कहौं समझाई। सूरति सब्द अगाध सुनाई॥
जो जिव चाहै अगम निवासा। सूरति करै सब्द में बासा॥
जिन जिन सूरति सब्द सँवारा। सो चलि गये अगम पद पारा॥
पावै भेद बस्तु लखि पावै। सो सतलोक सोक नसि जावै॥
सुरति सब्द में भई अधीना। ताकर भेद काल नहिं चीन्हा॥
सत्त नाम से काल नसाना। कोइ साधू काया मथि जाना॥
काया दरपन सुरति समानी। सो साधू साहिब सम जानी॥
अर्थ-हे धर्मनिष्ठ! मेरी बात को ठीक से समझो-हम उस दरबारी पुरुष (निरंजन) के पास जा रहे
हैं। सुरति-निरति दोनों को लेकर मैं उनके लोक में प्रवेश करूँगा और उस अनादि ब्रह्म का नाम लेकर
काल को नष्ट कर दूँगा। उस 'सत्यपुरुष' का नाम लेकर जीव ने स्वयं काल से उबारा और कहा कि
इस प्रकार मैं निरंजन के दरबार में चला जा रहा हूँ। उसने इतनी बातें शून्य मन से कही तब धर्मनिष्ठ
(काल) ने अत्यन्त संयस्त होकर मन में विचार किया और बोला-हे जीव! तुम अपने मार्ग पर जाओ,
हम तुम्हें अब स्वप्न में भी नहीं रोकेंगे।
जीव आगे चलकर पैर बढ़ाया, उसे मार्ग में एक काला सरोवर मिला। वहाँ एक पक्षी रहता था
और रात दिन वह ऊँचाई पर बैठा रहता था। उस मार्ग पर सन्तुष्ट होकर जीव चला, तब वह चोंच
फैलाकर जीव को खाना चाहा। पक्षी ने अपने मुख को अनेक भाँति से फैलाया कि मैं इस जीव का
आहार करूँगा। उसने पूछा कि अपना नाम साफ-साफ (टकसारा) बताओ, तभी उस निरंजन के
दरबार में जा पावोगे। हे जीव! तुम हमसे नहीं बचने पावोगे और मैं तुम्हें पकड़-पकड़ कर खाऊँगा।
जीव ने नाम के रूप में सुरति ध्यान किया और उसने करिया को मार कर पावों के नीचे गिरा दिया।
तब वह जीव उस झरने के उस पार गया तो उसे दसों दिशाओं में उजाला दिखाई पड़ा। द्वार अमृत
का था, वहाँ सम्पूर्णतः अमृत का निवास था और तब जीवन का समस्त संशय भाव समाप्त हो उठा।
जीव अधर-भाव से अमृत पान करने लगा-अमृतमय शब्द बिन्दुओं में वह जीने लगा। वस्तु पाकर कोई
साधुजन क्यों नहीं उसे साधेगा और अपनी सुरति समाधि में अमृत चखेगा।

६२ / घट रामायण
चट-चट करता हुआ तेजी से वह जीव सुरति ज्ञान की अटारी पर चढ़ गया-नाम रूप अजिर के
अमृत की वासना उसके हृदय में बस गई है। उस घर में निरंजन ब्रह्म का शब्द प्राप्त कर रहा है-अब वह
फिर 'आवागमन' के बंधन में नहीं आएगा।
वह शून्याकाश में अकेला उस निरंजन ब्रह्म से सम्पर्क साध लिया है और सुरति द्वारा इसी घट
(शरीर) में ही उससे सम्पर्क साध रखा है। उसका भंडार अमृत कमल से भर उठा है-जीव जो उसे
पीता है, वह सर्वथा उस पार उतर जाता है (इस भवलोक से मुक्ति हो जाती है)।
मैं उस अगाध नाम से सम्बोधित ब्रह्म के विषय में बताता हूँ। सुरति ध्यान में उस अगाध का ही
शब्द सुनाई पड़ता है। यदि जीव उस अगम्य ब्रह्म में निवास करना चाहता है तो वह सुरति साधना करके
'शब्द' में निवास करे। जिन-जिन सन्तों ने सुरति समाधि से वह शब्द सँवारा है, वे अगम्य पथ के पार
चले गए हैं।
वस्तु भेद को समझकर जो मूल तत्त्व को जान जाता है-वह सत् लोक प्राप्त करता है और उसके
समस्त शोक नष्ट हो उठते हैं। सुरति शब्द साधना के जो अधीन हो जाता है, उसके भेद के विषय में
काल भी अपरिचित रहता है। सत्य नाम से काल भी नष्ट हो जाता है, अपनी काया का मंथन करके
कोई-कोई साधु इसे समझते हैं। शरीर दर्पण हैं, इस दर्पण में 'सुरति' समाई हुई है, यदि इस प्रकार का
कोई साधु है तो उसे ब्रह्म के समान समझो॥
॥ साखी ॥
कँवला काल निरंजना, तिन बस कीन्हा घाट।
भिन्न भिन्न दरसाइ कै, सतगुरु दीन्ही बाट॥
अर्थ-कमल। काल एवं निरंजन इनके वश में सारे प्रस्थान मार्ग हैं, इन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में
दिखाकर सतगुरु ने सबके लिए रास्ता खोल दिया है।
॥ दोहा ॥
जीव चला घर आपने, काल छेकि जम जार॥
नाम सुरति जब लख पग, भागे ठग बटमार॥
अर्थ-जीव अपने घर की ओर चला और काल ने यम के जाल से घेरा। जब सबको सुरति समाधि
का सोऽहम् शब्द दिख पड़ा तो सभी ठग और बटमार (काल, यम आदि) भाग चले॥
॥ भेद पिंड और ब्रह्मांड का ॥
सुरति सब्द मिल लोक में, चढ़ि सतनाम जहाज।
तुलसीदास पिया मिले, कीन्हा सेज बिलास॥
अर्थ-इस लोक में सुरति से मिलकर सतनाम के जहाज पर चढ़कर तुलसीदास साहब कहते हैं, मैं
अपने प्रियतम से मिला और शैया विहार किया॥
॥ छन्द ॥
तुलसी लख जागे काल से भागे। लख दृग दानी दूर किये॥
इमरत रस चाखा सौ सब भाखा। जीव अघाइ अनाद पिये॥१॥
सतनामहि जाना पद पहिचाना। सुरति सब्द जो जाइ लिये॥
जिन जो स्रुति सैना देखा नैना। अगम अपने पौ पाइ पिये॥२॥
हिये खुल गइ आँखी सब बिधि भारवो। काल बरन बिधि बूझि कही॥३॥

घट रामायण / ६३
अर्थ--तुलसी साहब कहते हैं कि प्रियतम के साथ मुझे देखकर सभी सभी सोते जागकर काल की
भाँति भगे और (प्रियतम के साथ देखकर) हमसे धर्मराज (दानी) ने अपनी आँखें दूर कर ली। सारा
संसार कहता है कि मैंने अमृत रस चख लिया है और इस जीव ने उसे आनादि तत्त्व के साथ तृप्त होकर
अमृत का पान किया॥ १॥
उस सत्य नाम को मैं जान गया, उसके चरणों को मैं पहचान गया और वहाँ जाकर उस सूरति
सबद को ग्रहण कर लिया। वह जो समस्त वैदिक तत्त्वों का समूह था, उसे मैंने नेत्रों से देखा और उस
अगम तत्त्व को अपने में (अपने पी) पाकर तृप्तभाव से पिया। हृदय की आँख खुल गई, उसका हर
प्रकार से वर्णन किया और इस प्रकार मैंने काल के नाना रूपों (बरन विधि) को समझ कर
बताया॥ २-३॥
॥ सोरठा ॥
बानी काल बिचार, तीनि बरन तोली सबै।
कहौं बरन निरधार, सो कोइ साधू परखिहै॥
अर्थ-वाणी और काल का विचार मैंने तीन प्रकार से तौला है (समझा है)। इसके रूपभेद का
निर्धारण करके मैं बता रहा हूँ। इसको कोई साधू ही परखेगा (पुनः मूल्यांकन करेगा)।
॥ चौपाई ॥
काल बैन बिधि भाखि सुनाई। ता की अब मैं करों लखाई॥
बानी तीनि तीनि बिधि जानी। कँवल मध्य में कहीं बखानी॥
कौन बरन वे कँवल रहाई। जाकी विधि बिधि कहों बुझाई॥
कोने बरन निरंजन देवा। तिन का बरन बताओं भेवा॥
करिया बरन काल को भाई। सेत रक्त वे कँवल रहाई॥
सुन्नि के बरन निरंजन देवा। तिन कर कहों निरख सब भेवा॥
अब बानी का कहौं बिचारा। बूझै साध करै निरवारा॥
बानी कौन निरंजन होई। बानी कौन काल की सोई॥
बानी कौन कँवल की लीन्हा। सो सब निरखि बताओं चीन्हा॥
बानी अधर निरंजन सोई। बानी क्रोध काल की होई॥
बानी मेल कँवल कर लीन्हा। येहि बिधि से तीनो हम चीन्हा॥
अर्थ-काल की वाणी का वर्णन करके सुनाता हूँ। अब मैं उसके स्वरूप को बताता हूँ। वाणी को
तीन प्रकार की समझो। कमल मध्य में स्थित इस वाणी का मैं वर्णन करता हूँ॥
किस प्रकार कमल के मध्य में यह वाणी रहती है, मैं इस विधि के अनुसार उसका वर्णन करता
हूँ। निरंजन देव किस वर्ण के हैं, हे भाई उनका वर्णन करो॥
काल का भाई श्याम वर्ण का है, वे रात में कमल में प्रवेश करके लाल वर्ण के हो जाते हैं।
निरंजन शून्य वर्ण के हैं। मैं उनको पूरी तरह से देखकर ही उनके भेदों को बताता हूँ॥
अब मैं वाणी का निराकरण करता हूँ। कोई साधु ही इसे समझकर इससे सम्बद्ध सत्य का
निराकरण कर सकता है। इसमें निरंजन की वाणी क्या है? कौन काल की वाणी है कमल किस वाणी
को ग्रहण करता है-इन सबको भलीभाँति पहचानकर बताओ॥
जो वाणी अंतरात्मा (अधर) की हैं, वह निरंजन भी वाणी है। क्रोध की वाणी है। कमल से मेल-
मिलाप कर रही-एक वह भी वाणी है। इस प्रकार से हमने तीनों वाणियों को पहचान लिया है॥

६४ / घट रामायण
॥ साखी ॥
निरगुन सरगुन लखि परै, काया काल बिचार।
आदि पुरुष सत लोक में, सो घर अधर हमार ॥ १ ॥
घट घट में सब लखि परा, भिनि भिनि अगम पसार।
तन बिच सोला द्वार की, तुलसी कहत पुकार ॥ २ ॥
अर्थ-शरीर एवं काल विचार के क्षण निर्गुण व सगुण दोनों दिखाई पड़े। आदि पुरुष ( ब्रह्म ) सत्य
लोक में है, और वही हमारी अन्तरात्मा का घर है।
इस संसार के घट-घट में भिन्न-भिन्न अगम्य तत्त्वों का प्रसार दिखाई पड़ा। इस प्रकार, इस शरीर
में सोलह द्वारों की चर्चा तुलसी साहब पुकार-पुकार कर करते हैं।
॥ चौपाई ॥
सोला द्वार भेद कहौं भाखी। जा की बरन बिधी कहूँ साखी ॥
प्रथम द्वार का भेद बताऊँ। जा की बिधि बरतंत सुनाऊँ ॥
प्रथम मूल दीप गति गाऊँ। जा की नाम ठाम समझाऊँ ॥
सतगुरु गुप्त भेद लखवावै। सोला द्वार भेद जब पावै ॥
अर्थ-सोलह द्वार भेदों का वर्णन करता हूँ-मैं इनकी वर्णन विधि और उनकी साक्षी बताता हूँ। मैं
प्रथम द्वार के भेद का वर्णन करता हूँ-मैं उसकी विधि और वृत्तान्त सुनाता हूँ॥ प्रथम भेद की मूल
गति का गान करता हूँ-मैं उसके नाम तथा स्थान का भी वर्णन करता हूँ। सोलह द्वारों के भेद का ज्ञान
जो सन्त प्राप्त कर लेता है तभी वह सद्गुरु के गुप्त रहस्यों को देखता है।
॥ द्वार भेद ॥
परथम सहस कँवल में द्वारा। दूसर अकह कँवल के पारा॥
तीसर द्वार गगन के नीचे। चौथा द्वार अधर के बीचे॥
जहँवाँ बैठा कंदर काला। जिनहिं बिछाया जग जम जाला॥
पंचम द्वार दसौ दिस बाहिर। मन सब बैठा जग में जाहिर॥
भँवर गुफा बिच छठवाँ द्वारा। कँवल भँवर तहँ बसै नियारा॥
सतवाँ द्वार दसों के दहिना। पाँचो भूत सूत बिन सैना॥
अठवाँ मूल चक्र के माहीं। बैठा मूल मोह रस राही॥
नौवाँ द्वार ताल में होई। स्वाँसा पवन चलावै सोई॥
ये नौ द्वार काल के जाना। दसवाँ द्वारा अधर बखाना॥
द्वारा चारि गुप्त गुहराई। जानै साध संत जिन पाई॥
ऐसे चौधा भेद पुकारा। पन्द्रा द्वार सत्त के पारा॥
सोला खिरकी अगम निसानी। जा में सत साहिब की बानी॥
ता के परे द्वार नहिं देखा। जहँ इक साहिब नाम न भेसा॥
संत सैल वह अगम निसानी। बसै संत वोहि धाम अनामी॥

घट रामायण / ६५
काया मद्धे काल बिचारो। निरंकार से पुरुष नियारो॥
वा का भेद साध कोई पावै। अगम निगम सोइ संध लखावै॥
जोगी रमक राह नहिं जाना। जोग ज्ञान मत भेद भुलाना॥
प्रानायाम जोग कोर कीन्हा। लोई कोई कवल उलट कर लीन्हा॥
कोग अष्टांग जोग जस कीन्हा। परम जोग रस रहे अधीना॥
अर्थ-प्रथम भेद सहस्र कमल के द्वार घर है, दूसरा द्वार अकथ्य कमल के उस पार है, तीसरा द्वारा
शून्य के नीचे है और चौथा द्वारा अन्तरात्मा के बीच में है। जिस गुफा में काल बैठा है और जिसने समस्त
संसार के लिए माया जाल फैला रखा है पाँचवाँ द्वार उसकी दशों दिशाओं के बाहर है संसार में यह
स्पष्ट है कि वहाँ 'मन' रस लेता हुआ बैठा है।
भँवर गुफा के बीच छठाँ द्वार है—जहाँ भ्रमर कमल पर स्वच्छन्द (नियारा) बैठा रहता है। सातवाँ
द्वार दसों द्वार के दाहिने है—जहाँ पाचों महाभूततत्त्व बिना बन्धन (सूत) और बिना सेना (नियंत्रण) के
हैं। आठवाँ द्वार मूल के मध्य है—जहाँ मूलतत्त्व मुग्धभाव से रसास्वादन करता है। नौवाँ द्वार तालु में है
और वही श्वास वायु को चला रहा है॥ इन नवों द्वारों को काल का द्वार समझो और दसवाँ काल
अन्तरात्मा में है॥ चार द्वार गुप्त कहे गए हैं—जिन साधु सन्तों ने प्राप्त कर लिया है, उन्हें वही जानते हैं।
इस प्रकार, चौदह द्वार पुकारे गए हैं, पन्द्रहवाँ द्वार सत्य के उस पार है।
सोलहवें द्वार की खिड़की अगम की निशानी है—जिसमें निरन्तर सत साहब (निराकार ब्रह्म) की
वाणी सुनाई पड़ती है॥
इस सोलहवें द्वार के पार न कोई द्वार है और न कोई देश है वहाँ साहेब (परमात्मा) एक हैं, न
उनका कोई नाम है और न कोई वेष। वह सन्तों का पर्वत है और सन्त जन उस अनाम धाम में निवास
करते हैं।
काया के मध्य में काल का विचार करो और समझो कि वह पुरुष निरंकार और बिलक्षण है।
इसका रहस्य कोई ही साधु प्राप्त कर सकते हैं। वही अगम तथा निगम दोनों ज्ञानरूपों का सिंधु है।
उसमें रमता हुआ जोगी भी उसके मार्ग को नहीं जानता—वह तो योगमत के ज्ञान के भेदों में खोया रहता
है। कोई प्राणायाम योग करता है, कोई लोग (लोइ) कमल को योगसाधना द्वारा उलट लेते हैं। कोई
अष्टांग योग करते रहते हैं फिर भी वे उस परम योग रस के अधीन रहते हैं। ये सारे योगी योग कराते हैं
और वह निष्ठुर कठिन काल सबके घर आता है अर्थात् सभी काल कवलित होते हैं।
॥ गुफा ( 1 ) ॥
यह सब जोगी जोग कराया। कठिन काल सब घर घर खाया॥
जोगी राह रीत दरसाऊँ। भिनि भिनि जोग बिधी बिधि गाऊँ॥
जोग सब्द बिधि कहौं बखानी। बूझै जोग कीन्ह सोइ जानी॥
अर्थ-मैं अब योगियों के मार्ग एवं उनकी पद्धति का वर्णन करता हूँ। भिन्न-भिन्न रूपों द्वारा मैं
उनकी विधियों के अनुसार उनका गान करता हूँ। योग शब्द विधियों का मैं वर्णन करता हूँ—जिसने
योग किया है, वही उसे समझ सकेगा॥
॥ कहेरा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
ज्ञान जोग मिसिरित मन मैला, चढ़ि अकास नित खेला हो॥१॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ, बिधि भिनि भिनि गति गाऊँ हो।

६६ / घट रामायण
बस तन मन रस निरमल होई, इंद्री इस्क खुद खोई हो ॥ २ ॥
ता पर तीन तलब पचबीसा, खड़ग ज्ञान दल पीसा हो।
उनके निकट नेक नहिं जावै, थिर होइ पवन चढ़ावै हो ॥ ३ ॥
दीदा फूल झूल दिन राती, त्रिकुटी चढ़ि येहि भाँती हो।
बिधि बायें पिंगला गति केरी, इँगला दहिने फेरी हो ॥ ४ ॥
चंद सूर दम दम बस आवा, सुखमनि चटक चढ़ावा हो।
बंक नाल पल पल नल खोली, अति अजपा नहिं बोली हो ॥ ५ ॥
ओहँग तत सोहँग मत जानी, पवन सब्द सँध आनी हो।
थिर मन मेरदंड चढ़ तारी, झलक जोति उँझियारी हो ॥ ६ ॥
तत अकास आत्म बिधिजानी, लख चर अचर बखानी हो।
अंडा तत्त द्वार दरसानी, जोग ज्ञान गति बानी हो ॥ ७ ॥
यह सब काल खेल भरमाये, सास्तर बेद भुलाये हो।
यह सब जोगि जोग बस कीन्हा, काल राह रस पीना हो ॥ ८ ॥
वे दयाल बिधि भेद अपारा, संत चीन्ह भये न्यारा हो।
जोग ज्ञान पंडित सुनि मानै, सास्तर पढ़त पुरानै हो ॥ ९ ॥
जैसे नीर घड़ा जल माईं, रबि प्रतिबिंब दिखाई हो।
जब लग घड़ा अकास समाना, तब लग तत दरसाना हो ॥ १० ॥
फूटा घड़ा अकास नसाना, रबि सूरज बिनसाना हो।
तत भयौ नास भास भइ जोती, अंध कूप हिये होती हो ॥ ११ ॥
अंध अकास भास नहिं पावै, भूल भटक मन आवै हो।
घट बिनसै तन देंही पावै, पुनि भव माहिं समावै हो ॥ १२ ॥
ज्ञान जोग ब्रत संजम कीन्हा, तीनि ज्ञान गति चीन्हा हो।
अंत काल जम जाल फँसाना, बहु बिधि काल चबाना हो ॥ १३ ॥
तुलसी जोग जुगति कहि झारी, संत अगम गति न्यारी हो।
संत राह रस अगम ठिकाना, जोगी भेद न जाना हो ॥ १४ ॥
॥ ककहरा ॥
अर्थ—योगी रमण (रमक) राह से शरीर को मुक्त (तार) कर देता है और वह चार प्रकार के
योगों को करता रहता है। ज्ञान योग में मिश्रित मन निर्मल नहीं (मैला) रहता और वह शून्याकाश में
चढ़कर खेलता है। अब मैं उसकी स्थिति और पद्धति (राहरीति) बतलाऊँगा (दरसाऊँ) और उसकी
भिन्न-भिन्न गतियों का गान करूँगा। शरीर मन के वश में और उसका आस्वाद (रस) निर्मल हो उठता
है और इन्द्रियों की संसक्ति (इश्क) को स्वयं खा जाता है॥ १-२॥
उसके ऊपर तीनों-नशे (तम, रज एवं सत्त्व) एवं पच्चीसों (तन्मात्राओं) को यह ज्ञान की तलवार
पीस डालती है। ये तीन गुण एवं पच्चीस तन्मात्राएँ उनके निकट नहीं जा पातीं और वह योगी (व्यक्ति)
स्थिर चित्त से वायु को मन में चढ़ाता है॥ ३॥

घट रामायण / ६७
चित्त [दीदा (र)] रूपी पुष्प रात-दिन तिरकुटी पर चढ़कर इस प्रकार झूलता रहता है। पिंगला
की गति बाएँ एवं इंगला (इड़ा) की गति दाहिने फेर लेता है॥४॥
सूर्य तथा चन्द्र क्षण-क्षण वश में हो जाते हैं और सुषुम्ना (सुखमनि) तीव्रगति से चढ़ा लेते हैं।
बंकनाल की नल पल-पल खुली रहती है और अजपा जाप बोलना नहीं पड़ता, स्वयं होने लगता है।
पवन सिंधु में आकर तत्ऽहम् की गति सोऽहम्' की हो जाती है, तालु (तारी) मेरुदण्ड पर चढ़ जाती
है, मन स्थिर हो उठता है और वह दिव्य प्रकाश झलकने लगता है॥५, ६॥
उस आकाश को आत्म योग विधि से समझता हूँ और वहाँ-चर-अचर दोनों तत्त्वों को देखकर
उनका वर्णन करता हूँ। यह पिंड (अंडा) उस तत्त्व द्वार पर दिखाई पड़ने लगता है और वाणी, ज्ञान
तथा गति तीनों योगमयी हो उठती है॥ १७॥
संसार को यह 'काल की क्रीड़ा भ्रमित किए हुए है और वेद शास्त्रों ने सही मार्ग भुला दिया है।
योगियों ने इन सम्पूर्ण भ्रमित करने वाले तत्त्वों को योग के वश में कर लिया है और काल (मृत्यु) के
मार्ग का रस पी लिया है॥ १८॥
वे दयालु ब्रह्म अनेक रूपों के हैं, संत उन्हें पहचान कर स्वयं विलक्षण हो गए हैं। योग तथा ज्ञान
को पंडित (विद्वान) सुनकर स्वीकार करते हैं और वे शास्त्र तथा पुराण पढ़ते रहते हैं॥ ९॥
जैसे घड़े में जल है, और उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है-जब तक घड़े में आकाश का
बिम्ब स्थित है, तब तक सूर्य बिम्ब की भाँति वह परम तत्त्व दिखाई पड़ता है॥१०॥
घड़ा फूट गया, आकाश का बिम्ब नष्ट हो गया, सूर्य का बिम्ब भी विनष्ट हो उठा-उसी प्रकार इस
मानव योनि के नष्ट हो जाने पर सब अंधकूप जैसे हो उठता है। इस अंधे आकाश में कोई प्रतिबिम्ब
(भास) नहीं उठता-मन चारों ओर भूलकर भटक आता है। इस शरीर रूपी घट के विनष्ट हो जाने पर
यह देह अपने देही (ईश्वर) को पा जाता है और शरीर इस संसार में खो जाता है। ज्ञान योग व्रत संयम
करके तीनों गतियों उद्भव, स्थिति एवं संहार) पहचान लिया है। अन्तकाल में, यम के जाल में यह
जीव फँस जाता है और उसे काल अनेक प्रकारों से चबाता है॥
इसीलिए तुलसी साहब ने समस्त योग युक्तियाँ बताई हैं और उनसे जुड़े सन्तों की गति अगम्य और
न्यारी है।
सन्तों का मार्ग एवं आनन्द भिन्न है, इसे योगी भी नहीं जानते॥ १४॥
॥ सोरठा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
अगम अगत गति पार, जोग ज्ञान पहुँचै नहीं॥
अर्थ-रमक के मार्ग से शरीर का उद्धार करते हैं। और वे चारों युगों में योग करते हैं। अगम्य एवं
अज्ञेय (अगत) के ज्ञान के उस पार (जहाँ सन्त पहुँचते हैं) योग का ज्ञान नहीं पहुँचता॥
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कँवल षट गाऊँ। बसै तासु पर भेद बताऊँ॥
चढ़े चक्र षट जोगी गावै। तुलसी सब्द माहिं समझावै॥
काया माहिं कँवल का वासा। कँवल कँवल कहूँ भूमि निवासा॥
अर्थ-द्वितीय योग षट्दल कमल के स्थान का है। इस पर जो निवास करते हैं मैं उनके भेदों का
वर्णन करता हूँ। इस षट्चक्र पर चढ़कर योगी गान करता है-और तुलसी साहब कहते हैं कि वह उस
शब्दों से समझाता है। शरीर के मध्य में इस कमल का वास है-भूमि पर निवास करता हुआ योगी
कमल-कमल कहता रहता है।

६८ / घट रामायण
॥ कहेरा ॥
काया कलस कँवल बिधि भाखी, परख लखी हिये आँखी हो।
भिनि भिनि जोग कँवल बिधि गाई, खुल षट भेद बताई हो॥ १॥
गुदा कर कँवल कहों दल चारी, गनपति बास बिचारी हो।
छै पखड़ी दल कँवल कहाई, बसै ब्रह्मा तेहि ठाँई हो॥ २॥
अष्ट कँवल दल नाम बसेरा, बसै बिस्नु तेहि तीरा हो।
दल बारा बिधि सिधि हिये माहीं, सिव कैलास कहाई हो॥ ३॥
सोला कंठ कँवल बिधि जानी, जगदंबा जग रानी हो।
सहस कँवल दल दीद निरंजन, घाट रोकि गल गंजन हो॥ ४॥
ये सब काल जोग रस माया, सिध जोगी सब खाया हो।
मुद्रा पाँच अवस्था चारी, तीनि ज्ञान गति धारी हो॥ ५॥
जोगी काल कलेवर कीन्हा, तप संजम ब्रत धारी हो।
कष्ट भोग फल काया पाया, चारि खानि गति चारी हो॥ ६॥
कँवल जोग जोगी गति गाया, भर्म भोगि भौ आया हो।
अब कहों संत भेद विधि सारी, जोग कँवल से न्यारी हो॥ ७॥
नौलख कँवल पार दल होई, परे चारि दल सोई हो।
ता के परे अगमगढ़ घाटी, नीर तीर गहि बाटी हो॥ ८॥
ता के परे परम गुरु स्वामी, जीव अधर घर धामी हो।
ता के परे परम पद माहीं, साहिब सिंध कहाई हो॥ ९॥
ता के परे संत घर न्यारा, अगम अगाध अपारा हो।
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा, अगम राह रस पीना हो॥ १०॥
अर्थ-काया में कमल की स्थिति कलश की भाँति बताया है और उसको देते हृदय की आंखें
उससे जुड़ जाती हैं। योग सिद्धान्त के अन्तर्गत इस कमल विधि का भिन्न-भिन्न वर्णन किया गया है
और षट्चक्र के द्वारों के खुलने की बात कही गई है॥ १॥
गुदा के कमल का वर्णन करता हूँ, वहाँ चार दल हैं और वहाँ गणपति (गणेश) का निवास
विचारा गया है। दूसरे चक्र या केन्द्र पर छः पंखुरियों का कमल है, उस स्थान पर ब्रह्मा निवास करते
हैं। २॥
तीसरे चक्र पर अष्ट पंखुरी का कमल है और उसके समीप विष्णु निवास करते हैं। हृदय चक्र पर
बारह पंखरियों का कमल है, इसे कैलास कहा जाता है और यहाँ शिव निवास करते हैं॥ ३॥
कंठ चक्र पर सोलह पंखुरियों वाला कमल है, और जहाँ सृष्टि की रानी जगदम्बा निवास करती हैं।
षट् चक्र सहस्रदल का कमल है, यहाँ निरंजन का साम्राज्य है-और आगे के घाटों को रोकर
रास्ते को दुर्गम (गंजन) बना देते हैं॥ ४॥
ये समस्त गति द्वितीय काल योग की हैं-यहाँ माया से उत्पन्न योग रस को सिद्ध योगी खाते हैं,
(सेवन करते हैं)। पाँच मुद्राएँ हैं, चार अवस्थाएँ हैं तथा तीन ज्ञान की गतियों से वे सम्पन्न हैं। काया के
कष्ट भोग का फल प्राप्त किया है और तप, व्रत, संयम भी ये योगी करते हैं। इस कमल योग की गति

घट रामायण / ६९
का ज्ञान योगियों ने किया है किन्तु भ्रमित होकर ये पुनः इसी भोग वासना से संसक्त संसार में आए हैं ॥
अब मैं इन योगियों से भिन्न सन्तों की विलक्षण गतियों का वर्णन करता हूँ, जो इस कमल योगसिद्धि से
भिन्न प्रकार की है ॥ ५, ६-७ ॥
सहस्रार कमल के उस पर नौ लाख पंखुरियों वाला कमल है-उसके आगे चार दल का कमल है।
उसके आगे अगमगढ़ की पार घाटी है और उसका जल तटों के हिसाब (श्रम से) बंटा है। उसके
आगे, परमगुरु स्वामी (अगम्य ब्रह्म) और वह जीव की अन्तरात्मा का ही निवासी है। उसके आगे परम
पद है जहाँ स्वामी का अगाध समुद्र है। उसके आगे सन्तों का विलक्षण निवास गृह जो अगम्य, अगाध
एवं अपार बर्तमान कहा गया है। तुलसी साहब कहते हैं कि सन्त जन उस अगम पर्वत में सुरति समाधि
करते हुए अगाध रस का पान करते हैं (योगियों की भाँति पुनः भवसागर में नहीं आते) । ४ से १० ॥
॥ सोरठा ॥
जोगी जुगति विचार, संत भेद न्यारा कहैं।
करि करि जोग बयान, काल खानि भौं रस रहै ॥
अर्थ-योग तथा आत्मज्ञान के अतिरिक्त ये योगी और कुछ नहीं जानते। योग का वर्णन बार-बार
करते हुए काल की खानि इस सांसारिक भौतिक आनन्द में डूबे रहते हैं ॥
॥ चौपाई ॥
जोग निरंजन कीन्ह पसारा। यह सब काल जाल भ्रम डारा ॥
कँवल सहस्र समाधि लगावै। मन सोइ काल निरंजन पावै ॥ १ ॥
अंड खंड ब्रह्मांड पसारा। ये सब जानौ मन की लारा ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस कहाये। ये सब मन मत गति उपजाये ॥ २ ॥
मन सोइ निरंकाल है भाई। ता कर बास अकास के ठाई ॥
वा का सुनौ बास बिधि मूला। अगिनि अकास कँवल जहँ फूला ॥ ३ ॥
तुलसी ता की बिधी बताऊँ। सब्द राह रस भेद सुनाऊँ ॥ ४ ॥
अर्थ-योग ने निरंजन के चिन्तनका प्रसार किया और इन सबने काल जाल के भ्रम में सभी को
डाल दिया। सहस्रार दल कमल में ये योगी समाधि लगाते हैं और उनका मन उसी कमल में निरंजन
को प्राप्त करते हैं।
पिंड के खंड-खंड में ब्रह्मांड फैला है-इन्हें सब मन की तृष्णा समझो। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो भी
कहे जाते हैं-ये सब मन के ही ज्ञान से उत्पन्न किये गये हैं।
वह मन ही काल की पहुँच के बाहर है, उसका निवास आकाश-स्थल में है। उसके निवास एवं
विधि के तत्त्व को सुनो। पिंड में जहाँ एक अग्नि आकाश कमल खिला हुआ है। तुलसी साहब कहते हैं
कि मैं उसकी समझ की विधि का वर्णन करता हूँ और उसके शब्द, मार्ग, रस के भेदों को सुना रहा
हूँ॥
॥ कहेरा ॥
अगिनि अकास जरत जल जाना, ता बिच कँवल फुलाना हों।
डंडी कँवल फूल नभ नारी, रज ब्रह्मा बिस्तारी हो ॥ १ ॥
नाल वोही तुम संकर तारी, बिस्नु बिपति जग झारी हो।
मिलि तीनों मन मरम न जाना, कीन्हे वेद पुराना हो ॥ २ ॥

७० / घट रामायण
निरंकाल काल अस फाँदा, जीव जोति जग बाँधा हो।
आदि अनादि पंथ नहिं जानी, करि कुपंथ ठग ठानी हो॥३॥
तीरथ बरत नेम बिधि पाला, आस खानि फल डाला हो।
नर तन भटक भटक भटभेरा, बाँधा न भौजल बेड़ा हो॥४॥
तन सराय छूटत छिन माहीं, सेमरि सुवा पछिताई हो।
तुलसीदास चेत नर अंधा, परखि लखौ दुखदंदा हो॥५॥
अर्थ-जहाँ अग्नि तथा आकाश जल रहे हैं, उसके बीच एक कमल खिला हुआ है। दण्डी के ऊपर
कमल है, कमल पुष्प आकाश की नाड़ी है और उस पर 'रज' का विस्तार ब्रह्मा ने किया है॥१॥
उसी नाल ने शंकर का उद्धार किया है, संसार में विष्णु की विपत्ति को दूर किया है। तीनों ब्रह्मा,
विष्णु, महेश इन तीनों में मिलकर भी उस मर्म को नहीं समझा और वेद-पुराणों की रचना करते
रहे॥२॥
काल का पाश निरंकाल है (जिसका अनुमान सम्भव नहीं है) और यह जीव परमात्मा की ज्योति
में बँधा है। इन्होंने आदि-अनादि के ज्ञान मार्ग को नहीं जाना और कुपंथ तैयार करके जन समुदाय को
ठगने का निश्चय किया है॥३॥
तीर्थ, व्रत, नियम आदि विधियों को निर्दिष्ट किया तथा आशा की खानि का फल सबके सामने
डाल दिया। इन्होंने इस संसार के भौजल से मुक्ति की नौका न तैयार करके मनुष्य जाति के भटकने
का भटभेरा (सूखी लकड़ियों की बाँधकर अस्थिर नावें) बना दी॥४॥
तन रूपी यह विश्रामालय (सराय) क्षण में ही छूट जाता है, और सेमर फूल पर क्षुधित होते के
प्रहार से शुकगण जैसे निरन्तर पछताते रहते हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि हे अंधे मनुष्य समझो-संसार
के दुःख द्वन्द्वों को परखकर मानव समाज के लिए मार्ग निर्धारित करो॥५॥
॥ चौपाई ॥
ये सब मन का भेद बताया। मन रचि कीन्हा खेल बनाया॥
धरती गगन चंद और सूरा। निरंकाल रच मन मत मूरा॥
सोइ मन अस बस विष रस माईं। भूला भरम खानि गति जाई॥
अर्थ-मैंने ये सारे मन के भेद बताए और मन ही का सारा रचा तथा बनाया हुआ खेल है। पृथ्वी,
आकाश, चन्द्रमा एवं सूर्य यह कालरहित मन की ही मूल रचना हैं। हे सखी! यही मन इस वासना रूप
विषय रस में बस जाता है। यह भ्रमवश अपनी मूलगति को भूल जाता है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तरक बिचार, सार पार गति ना लखै।
यह मन बिषम बिकार, ता की गति मति सब कही॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि अनेक तर्क तथा विचारों से सिद्ध है कि इस मन की गति का पार
नहीं दिखाई पड़ता, यह मन ही समस्त विषम (कष्टदायी) विकारों का कारण है, उसके ज्ञान का
वर्णन मैंने अपनी मति के अनुसार पूरी तरह से किया है।
॥ छन्द ॥
तुलसी मति न्यारी कहत बिचारी। जगत भिखारी जाल मई।
सुर नर मुनि नाचे कोंइ न बाचे। आदि अंत सब छार छई॥१॥

घट रामायण / ७१
संतन सोइ जाने सुरति समाने। जिन वा घर की राह लई।
मैं उनका चेरा किया निबेरा। सुरति सैल अज अधर गई ॥ २ ॥
मन की गति पाई सुरति छुड़ाई। रामायन घट माहिं कही।
ले लेख अलेखा सब बिधि देखा। संत चरन सत सार सही ॥ ३ ॥
चीन्हा वह द्वारा सुरति सम्हारा। नैन निहारा पार गई।
तुलसी बिधि गाई सबै सुनाई। संत सहाई राह दई ॥ ४ ॥
कुंजी अरु तारा खोल किवारा। निरखि निहारा सूर भई।
जाना सत नामा अगम ठिकाना। लखि असमाना तिमर गई ॥ ५ ॥
तुलसी रस ज्ञाना माहिं बखाना। धसि असमाना अगम लई।
अर्थ—इस मन की मति, तुलसी साहब कहते हैं, कि बड़ी विलक्षण है और मैं इसे विचारपूर्वक
कहता हूँ कि सम्पूर्ण संसार भिखारी की जाल बन गया है। देवता, मुनि, मनुष्य इस मन के वश में होकर
नृत्य करते रहते हैं, इससे कोई बचा नहीं है और इसी मन के वशीभूत होने से मनुष्य का आदि अन्त सब
जलकर राख जैसा हो उठा है ॥ १ ॥
संत जन इस रहस्य को समझकर अपने मन को सुरति ध्यान (ज्ञान) में समाविष्ट कर लेते हैं और
वे उस घर (परमात्मा) की राह पकड़ लेते हैं। मैं तो उन सबका चेला हूँ। इन सबका निपटारा किया
है—और मेरा मन तो सुरति पर्वत पर स्थित अन्तरात्मा में समा गया है ॥ २ ॥
मैंने तो मन का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और उसे सुरति ज्ञान की मायाशक्ति से छुड़ा लिया घट में
स्थित रामायण का गान किया है। उस अलेख लेख को लेकर उसे प्रत्येक प्रकार से देखा और यही
निष्कर्ष निकाला कि सन्तों का चरण ही सबका सार तत्त्व है ॥ ३ ॥
मैं सुरति सम्हालकर, वह द्वार पहचाना और अन्तर्नेत्रों से देखकर उस पार चला गया। तुलसी साहब
सभी को सुनाकर उसे विधिपूर्वक गाकर कहते हैं कि सन्तों ने ही रक्षक (सहाई) होकर मार्ग
दिया ॥ ४ ॥
कुंजी द्वारा ताला खोला, किवाड़ खोले, उस तत्त्व को निरखकर देखा और सिद्ध (सूर) हो उठा।
उस 'सत्यनाम' को समझा, उसके अगम्य ठिकाने को जाना, शून्याकाश को देखा और समस्त अंधकार
दूर हो गया ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस रस का अनुभव मैंने ज्ञान के बीच किया है और शून्याकाश में
प्रविष्ट होकर मैंने अगम्य (ब्रह्म) प्राप्त कर लिया ॥ ६ ॥
॥ सोरठा ॥
यह बिधि निरमल ज्ञान, सत मत सुरति लखाइया।
जब पाया वह ठाम, आदि अंत सोइ सुधि भई॥
कीन्हा ग्रंथ बनाइ, पाइ गाइ गति अस कही।
भई गुरन पद पार, सार पदम पद लखि रही॥
अर्थ—इस प्रकार सत्य मत के अन्तर्गत सुरति द्वारा निर्मल ज्ञान दिखाया और मुझे जब वह स्थान
प्राप्त हो उठा तो मेरे आदि और अन्त की सुधि उस परमात्मा ने ली ॥
मैंने ग्रन्थ रचकर उस गति को पाकर और उसे गाकर इस प्रकार कहा है। गुरु की कृपा से उस पद
को पार कर लिया। उस पद कमल के सार तत्त्व को देखकर मैंने इसे प्रकार बताया है ॥

७२ / घट रामायण
॥ चौपाई ॥
आगे अगम लोक गति गाऊँ। सत्त नाम सत धाम लखाऊँ॥
जब नहिं निराकार और जोती। आदि अंत कछहू नहिं होती ॥
जब दयाल सत साहिब दाता। जब की सुनौ सकल बिख्याता ॥
मैं अजान कछु मरम न जानों। संत कृपा सत साखि बखानों॥
सतगुरु संध संत दरसाई। उन रज कही महूँ पुनि गाई ॥
मैं बुधिहीन अचीन्ह अनारी। कीन्ही कृपा सुरति मतवारी ॥
अर्थ—आगे मैं अगम्य लोक में चल रहा हूँ और 'सत्यनाम' से ढंका सत्यधाम को दिखाऊँगा
(वर्णन करूँगा)। जब न निरंकार ब्रह्म था, न ज्योति थी, और कहीं भी 'आदि-अन्त' का क्रम नहीं
व्यवस्थित हुआ था॥
तब दयालु, स्वामी एवं सबका दाता ब्रह्म ही था और उस समय की सारी प्रसिद्ध बातें सुनो। मैं
अज्ञानी कोई रहस्य नहीं जानता था—संत की कृपा है, यह मैं सत्य की साक्षी देकर कहता हूँ।
सतगुरु के समुद्र को सन्तों ने ही दिखाया, उनके चरणरजों ने बताया और उसी की कृपा से मैंने भी
कुछ गाया मैं बुद्धिहीन, अपरिचित तथा अनाड़ी मुझपर गुरुओं ने ही मतवाली सुरति भरी कृपा की है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी मनहिं बिचारि, संत अंत गति लखि परी।
भाख्यों सरनि सिहार, सार पार जस जस भई॥
सत्त लोक सत नाम, और अनाम आगे कही।
सबहि संत ब्रत मान, मैं निकाम सरनै लई॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि मन में विचार करके देखो, सन्त की भी अन्तगति दिखाई पड़ी है—
उस परम तत्त्व के पार जैसे-जैसे होने लगा—मैंने उस परमात्मा की शरण में समर्पित होकर वर्णन किया॥
सत्य लोक का सत्य नाम है और जो कुछ भी अनाम है, उसे अब आगे कह रहा हूँ, सभी सन्तों के
व्रत को स्वीकार करता हुआ, मैं निष्काम उसकी शरण में समर्पित हुआ॥
॥ चौपाई ॥
अब कहूँ आदि अगाध अनामी। ताकी गति मति संत बखानी॥
जो कुछ सत्त सीत उन केरी। महूँ पाइ मति निरखि निबेरी॥
तुलसी जब जोड़ जस जस भाखा। आदौ बिरछ पेड़ पर साखा॥
पिरथम पुरुष अनाम अकाया। जास हिलोर भई सत माया॥
माया नाम भया इक ठौरा। सत मत नाम बँधा इक डोरा ॥
सत्त लोक सत साहिब साँई। सत्त मिले सत नाम कहाई॥
चौथा पद संतन सोइ भाखा। सो सत नाम कीन्ह अभिलाखा ॥
सत्तनाम से निरगुन आया। ता को बेद ब्रह्म बतलाया ॥
ता की अब मैं कहों लखाई। त्रिकुटी रावन ब्रह्म कहाई ॥
माया कुमति ब्रह्म इक ठौरा। भया राम मन चहुँ दिखि दौरा ॥

द्वितीय खण्ड: माया-भ्रम निवारण एवं सतगुरु महिमा

घट रामायण / ७३
पाँचौ इंद्री प्रकृति पचीसा। तीनि गुणन मिलि सरगुन ईसा॥
इन्द्री पिता भरत है भाई। गुन तन कुमति संग मन माहीं॥
इच्छ सँग रँग मन मति भूला। खस परा बंद भया अस्थूला॥
ता को सब जग राम बखाना। ईस कर्म मन भर्म भुलाना॥
निराकार मन भया अकारा। ज्योति मिली गुन तीनि पसारा॥
ब्रह्मा बिस्नु भये महादेवा। इनकी उतपति मन मत भेवा॥
सास्तर बेद संस्कृत बानी। ये सब मन मत गति उतपानी॥
दस औतार जगत जग माया। यह मन और अनेक उपाया॥
ऋषी मुनी जोगीसुर ज्ञानी। मन करता कर सब मिलि मानी॥
तीरथ बरत बेद ब्यौहारा। जग भूला मन जाल पसारा॥
जो से नाम भेद नहिं जानै। मनहिं राम को नाम बखानै॥
नाम गती है अगम अपारा। ब्रह्म राम दोउ पावैं न पारा॥
निरगुन ब्रह्म राम मन होई। नाम अगम गत अगत अघोई॥
ता का पटतर मन पर लावै। ता से नाम भेद नहिं पावै॥
अर्थ-अब मैं उस आदि अगाध एवं अनाम तत्त्व रूप ब्रह्म के ज्ञान का वर्णन संत मत के अनुसार
करता हूँ। जो कुछ सत्य है, वह उनका प्रभाव (सीत) है हमने भी उनका अलभ्य ज्ञान प्राप्त करके, उन्हें
देख करके (अनुभव करके) निराकरण (निबेरी) किया है।
तुलसी साहब कहते हैं कि जब जिसे जैसा वह समझ में आया उसने वैसा-वैसा वर्णन किया है-
आदि में उसे वृक्ष, पेड़, पत्ता, शाखाओं जैसा बताया है। वह प्रथम पुरुष (ब्रह्म) अनाम और अशरीर
है, जिसकी लहरों से सतमाया निर्मित हुई है॥
माया नाम से वह एक भावना में स्थित हुई और सत्यमत नाम भी एक डोरे में बँध गया।
सत्यलोक, स्वामी सत् साहब स्वामी सत से मिलने पर सतनाम से पुकारा जाने लगा॥
उसी को सन्तों ने चौथा पद (मुक्ति) के नाम से पुकारा है, वही सतनाम है, उसी की अभिलाषा
की जाती है। इस सतनाम से निर्गुण की उत्पत्ति हुई है-उसको वेद ने ब्रह्म बताया है॥
अब मैं उसका दृश्य वर्णन करता हूँ। त्रिकुटी रावण और ब्रह्म दोनों कही जाती है। यहाँ माया कुमति
है, ब्रह्म एक स्थान पर स्थित है-और यहीं राम रूपी मन का चारों दिशाओं में भ्रमण होता है॥
पाँच इन्द्रियाँ हैं, और उनकी पच्चीस प्रकृतियाँ हैं और उनमें तीन गुणों को मिलाकर सगुण ब्रह्म की
कल्पना की गई। इन्द्रियाँ पिता है, भरत भाई है। गुण और कुमति दोनों शरीर में साथ-साथ हैं॥
इच्छा की संगवासना से मन मति के साथ वास्तविकता को भूल गया। जैसे, खस के टटरे पर बूँद
फैलकर स्थूल हो उठती है। उसी को सभी 'राम' कहकर बखानते हैं। यह मन भ्रम वश ब्रह्म के धर्म
(कर्म) को भूल जाता है॥
सगुण के रूप में निराकर मन साकार हो उठता है-वह ज्योति तत्त्व (ब्रह्म) इन तीनों गुणों (रज,
सत्त्व, तम) में फैलकर मिल जाता है, तब उनसे ब्रह्म, विष्णु एवं शिव बनते हैं, उनकी उत्पत्ति के विषय
में विद्वानों के मन में मतभेद हैं॥
शास्त्र वेद तथा संस्कृत भाषा में सब मन एवं मतों की गतियों से उत्पन्न हैं। ब्रह्म के दसों अवतार
संसार एवं सृष्टि में मायावत् है यह मन पृथक् है और ये सभी इसके उपाय हैं॥

७४ / घट रामायण
ऋषि, मुनि, योगेश्वर एवं ज्ञानी, सबने मिलकर कर्त्तारूप मन को स्वीकार किया है, तीर्थ, व्रत,
देव व्यवहार-इन सबका जाल मन ने फैला दिया और उसी में संसार भूल गया ॥
जिससे नाम भेद समझ में न आए, और मन निरन्तर राम का बखान ही करता रहे-यही नाम उस
अगम-अपार ब्रह्म की गति है और ब्रह्म तथा राम दोनों उसको पाने में असमर्थ हैं ॥
निर्गुण ब्रह्म के मन राम हैं, और वह नाम अगम्य एवं गत एवं अगत (ज्ञात तथा अज्ञात) एवं
सम्पूर्ण (अघौड़) है। उस ब्रह्म के समानान्तर इस ब्रह्म को लाने की चेष्टा में लोग रत हैं। अतः वे इसके
कारण नाम का रहस्य नहीं समझ पाते ॥
॥ दोहा ॥
यहिं विधि आदि अनादि, लखा भेद भिनि भिनि कहयौ।
सुत निःनाम अधार, जाना जिन अन्दर कहयौ ॥
अर्थ-इस प्रकार, वह आदि एवं अनादि ब्रह्म है, मैंने उसके भेदों को देखकर भिन्न-भिन्न रूपों में
बताया है। वह केवल शब्दों से सुना जाता है, निष्काम है तथा सृष्टि का आधार है। उसको वही जानता
है, जिन्होंने अन्तरात्मा को बताया है, या समझा है ॥
॥ छन्द ॥
है निःनामी अकथ अनामी। दस दिसि लसि सर सैल कही।
भाखा सतनामा ब्रह्म अकामा। माया मिलि मन जार लई ॥ १॥
काया अस्थूला मन सहै सूला। इंद्री बस भौं खानि मई।
काया गति धारी कर्म बिचारी। भूल भटक भौ भार सही ॥ २ ॥
अर्थ-वह निष्काम है, अकथ है, अनाम है, दसों दिशाओं में सरोवर तथा पर्वत आदि पर उसे
शोभित बताया जाता है। मैंने उस निष्काम ब्रह्म को 'सत्यनाम' के रूप में बताया है, माया में मिलकर
वह मन रूपी जाल को भ्रमित कर देता है ॥ १ ॥
स्थूल शरीर में मन नाना प्रकार के कष्टों को सहता है, और वह भव की खानि इन्द्रिय के वश में
होकर शरीर से संचालित कर्म जगत के साथ निर्वाह करने लगता है और इस प्रकार यह (मन) भूलता
भटकता हुआ भवसागर का भार सहता रहता है ॥ २ ॥
॥ सोरठा ॥
काया रचन बिचार, जाही से ये जग भया।
सो बिधि कहौं सँवार, बूझै जो जिन घट लखा ॥
अर्थ-शरीर की रचना का सत्य यही है कि इसी से यह सृष्टि हुई है। इसका वर्णन मैंने इस विधि से
सँवार कर कहा है-इसे वही बूझेगा, जिसने इस घट का मर्म समझा है।
॥ चौपाई ॥
उतपति जोनि खानि मन दीन्हा। गर्भ भीतर बालक को चीन्हा ॥
उतपति कारज बीरज डौठा। यह मन बात लागि मद मीठा ॥
यह कर लेखा कहों बनाई। तब जग हिरदे सत्त समाई ॥
सुनौ गर्भ की बात बिचारा। मात पिता रज बीर्ज सँवारा ॥
उलटा उरधमुखी दुख पावै। तन भीतर काको गोहराबै ॥

घट रामायण / ७५
भया बिकल मुख नरक समाना। जठर अगिन तन तपन जराना॥
आजिज भया बिकल बहु भारी। अति दुख में रहा बिकल दुखारी॥
तब साहिब से अरज पुकारी। बदौंछोर मोहिं लेव उबारी॥
निस दिन बँदगी करों तुम्हारी। अब मोहिं काढ़ौ महा दुखारी॥
अब तोहिं नेक न बिसरौ साँईं। बार बार सुमिरौं चित लाई॥
दीन दुखी से मन नहिं लाऊँ। आठ पहर तुम्हरा गुन गाऊँ॥
अर्थ-उत्पत्ति की ही दशा में नारी योनि के भीतर ही उस ब्रह्म ने उसे मन दे दिया और इस मन ने
गर्भ के भीतर ही शिशु को पहचान लिया। उत्पत्ति का कारण वीर्य है-यह बात मन को भली अवश्य
लगती है॥
इसका वर्णन मैं बनाकर (व्यवस्थित करके) इस प्रकार कहता हूँ-और तभी (मेरी बात सुनने के
बाद ही) हृदय में सत्य का समावेश होगा अर्थात् बात समझ में आ पाएगी॥
गर्भ की बात को विचार करते हुए सुनो-वह माता-पिता के 'रज -वीर्य' के संभोग का फल है
किन्तु शिशु गर्भ में ऊर्ध्वमुखी उल्टा रहकर दुःखों को भोगता है-और वह कष्ट मुक्ति के लिए माँ के
उदर में किसे बुलावे? वह वहाँ नितान्त व्याकुल एवं नरक सदृश जीवन यापन करता है। वह वहाँ
जठराग्नि से उसकी शरीर की आग की तपन से तप्त रही है॥
अत्यधिक व्याकुल एवं आजिज होकर अत्यन्त पीड़ा में वह व्याकुल उस साहब (ब्रह्म) को आर्त
होकर पुकारता है कि इस जटिल बन्धन से मुक्त करने वाले प्रभु! (बन्दिछोर) मुझे उबार लें। मैं रात-
दिन तुम्हारी बन्दगी करता रहूँगा और अब उस महादुखारी को शीघ्र मुक्त कर दें॥ हे स्वामी! अब एक
क्षण के लिए आपको नहीं भूलूँगा और बार-बार चित्त लगाकर आपका स्मरण करूँगा। अब अपनी
दीनता से तथा अपने दुःख में मन न लगाकर, आठों प्रहर आपका ही गुणगान करता रहूँगा॥
॥सोरठा॥
इतना किया करार, जब गर्भ में बाहिर भया।
भूला सिरजनहार, तुलसी भौ जग जाल में॥
अर्थ-तुलसीसाहब कहते हैं कि जब वह गर्भ से बाहर आता है, तब उसने जितनी प्रतिज्ञा कर रखी
भवजाल में फँसकर उस बनाने वाले प्रभु को वह भूल गया॥
॥चौपाई॥
अब बाहिर का लागा रंगा। माता मोह पिता के संगा॥
लरिकाई लट पट जग खेला। तोतरि बात मात सँग बोला॥
भाई बंद सकल परिवारा। ठुमठुम पाँव चलै तेहि लारा॥
लरिकाई ऐसी विधि खोई। तरुन भये तरुनी सँग मोही॥
मन की मौज करै रस रंगा। भूला ज्ञान भया चित भंगा॥
अब साहिब की याद बिसारी। माया मोह बँधा संसारी॥
मद में मस्त कछू नहिं सूझै। साध संत को कछु न बूझै॥
खान पान निस दिन मद माता। कामिन संग रहै रँगराता॥
जिन यह घट का साज बनाया। ताहि बिसारि जगत मन लाया॥

७६ / घट रामायण
यह जग झूठॅं सराय बसेरा। भोर गये उठि सूना डेरा॥
ऐसे या जग का ब्योहारा। जनम जुवा जस बाजी हारा॥
नेक न साहिब से मन लाया। बिरध भया तब अति दुख पाया॥
ऐसे सकल जनम गयो बीती। नेक न जानी साहिब रीती॥
अंत समय जम आनि सतावा। मुसकिल कष्ट महा दुख पावा॥
मार परै जब कौन बचावै। कठिन काल बिकराल सतावै॥
अर्थ-अब उसे बाहर का प्रभाव लगा और वह पिता के साथ मोह में पागल (माता) रो उठा।
बाल्यावस्था में वह लटपटाता हुआ संसार में खेला तथा अपनी तोतली बातों में माता से बोलता रहा।
भाई, बंधु एवं समस्त परिवार के बीच वह ठुमक-ठुमक चला तथा सभी ने उसे प्यार किया।
बाल्यावस्था को उसने इस प्रकार नष्ट कर दिया। और युवक होने पर तरुणियों के साथ मुग्ध हो उठा।
इस युवावस्था में मन की मौज में आनन्द की गंगा में बहता रहा, आत्मबोध नष्ट हो उठा और चित्त
माया में लिप्त होने के कारण भूल ज्ञान से टूट गया। वह अब परमात्मा का याद भूल गया तथा माया
के मोह में बँध कर संसारी हो उठा।
वह अपने अहम् भाव में मस्त था तथा उसे कुछ सुझाई नहीं पड़ता था। साधुओं तथा सन्तों को वह
कुछ नहीं समझता था। रात-दिन वह खान पान के मद में मस्त रहता था और कामिनियों के साथ नाना
प्रकार की विलास क्रीड़ाओं में मस्त रहता था।
जिसने इस शरीर की रचना करके सुन्दर स्वरूप प्रदान किया है तुम्हें भूलकर वह सांसारिक प्रपंचों
में मन लगा लिया। वह संसार असत्य है सराय के बसेरे की तरह (आज है, कल नहीं), सबेरा होने पर
समस्त डेरा सूना हो उठता है।
इस संसार का मिथ्यात्मक व्यवहार ऐसा ही है, जन्म रूपी जुआ में बाजी हारने जैसा, यहाँ का सारा
कार्य है। अपने स्वामी ईश्वर से नेक काम भी मन नहीं लगाया और जब वृद्ध हुआ तो अत्यधिक दुःख
प्राप्त हुआ।
अन्तिम समय में जम यातनाएँ मिलने लगेंगी तो कौन बचा सकता है और उस समय तो विकराल
(भयंकर) कष्ट के कारण अत्यन्त दुःख प्राप्त किया॥
जब मनुष्य के ऊपर समय की मार पड़ने लगती है तो उसे कौन बचा सकता है। उस समय भयंकर
काल विकराल रूप में कष्ट देता है।
॥ दोहा ॥
ऐसा नर तन पाइ के बादइ जनम गँवाई।
सो अस अंधा जग भया परै नरक में जाइ॥
अर्थ-इस प्रकार का श्रेष्ठ मनुष्य शरीर प्राप्त करके व्यक्ति व्यर्थ ही अपना जीवन नष्ट करता है।
इसी के फलस्वरूप यह संसार अंधा हो उठा फलस्वरूप बाद में जाकर नरक में जा पड़ता है॥
॥ छन्द ॥
ऐसा जग भूला सहै जम सूला। धर्मराय तन त्रास दई॥
निज नाम न जाना बहु पछिताना। जिन नित काल को मार सही॥
ता से नर चेतौ छांड़ि अचेतौ। नर तन गति ये जाति बही॥
तुलसी कही साची कोउ न बाची। बिन सतसंगति पार नहीं॥