घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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पड़ती हैं। मुक्ति का फैलाव जहाँ नहीं पहुँच पाता, वही आदि पुरुष का दरबार है—कोई भी मुनि इस
दरबार का आचरण नहीं जान पाता और इस संसार का सम्पूर्ण मर्म उसी में खोया (विलीन) रहता है॥
भँवर गुफा मारग चढ़ि देखा। जहँ जिव सत्त सुरत का लेखा॥
सुन्न सुन्न सब करत बखाना। सुन्न भेद कोइ बिरले जाना॥
कहीं बिस्तार सुन्न की जोई। ज्यों गूलर फल कीट समोई॥
फल जेते तेते ब्रह्मांडा। दीप दीप फल फल नौ खंडा॥
सुन्न अंड की करी बखाना। कहै तुलसी कोइ साधू जाना॥
अर्थ—भ्रमर गुफा के मार्ग पर चढ़कर देखा—जहाँ भी सत्य है और केवल वहाँ सुरति का ही तत्त्व
(लेख) है। शून्य-शून्य सभी कहते हैं किन्तु शून्य का भेद कोई विरले ही जानते हैं।। अब विस्तारपूर्वक
शून्य जो है उसका अर्थात् शून्य का वर्णन करता हूँ। मनुष्य शून्य में उसी प्रकार सन्निहित है, जैसे गूलर
फल में कीट। गूलर में जितने फल हैं, उतने ही ब्रह्मांड हैं फल ही सारे द्वीप हैं और वही द्वीपों के
नवखंड हैं। उसी क्रम में मैं शून्य में स्थित अंड (पिंडों) का वर्णन करता हूँ तुलसी साहब कहते हैं, इसे
कोई साधु-जन ही जानता है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी सुन्न निवास, सब्द बास जिन घर किया।
जिमि गूलर फल तासु, जग भिनि भिनि जेहि लखि परा॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि शब्द मूल के निवास को जिसने अपना घर बना लिया है, उसी का
निवास शून्य में है—जैसे गूलर के फल जिन्हें-भिन-भिन जैसे भी लख पड़ा हो॥
॥ छन्द ॥
भये सुन्न निवासी सब सुख रासी। सुरति बिलासी सब्द मई॥
अनहद हद पारा अगम अपारा। अमी सिंधु स्रुति जाड़ लई॥ १॥
देखा उँजियारा घट घट प्यारा। निरखि निहारा पार कही॥
तुलसी तुल जावै दस दिस पावै। सिंध फोड़ि असमान गई॥ २॥
अर्थ—शून्य निवासी साधु सभी सुखों की राशि बन जाते हैं, वे सुरति ज्ञान के विलासी तथा अनाहत
शब्द मय हैं। इस अनाहत नाद के पार अपार और अगम्य अमृत सिंधु है—जिसे सुरति में जाकर प्राप्त
करता है॥ १॥
चारों ओर घट-घट में प्यारा उजाला देखा उसे देखकर, दूर कहीं उसके पार देखा। तुलसी साहब
कहते हैं कि उसके पास (तुल) जाकर दसों दिशाओं को प्राप्त करता है—लगता है, यह मनोन्मनी सिन्धु
को फाड़कर आकाश में पहुँच गई है॥ २॥
॥ दोहा ॥
सुन्न महल अजपा जपै, समुँद सिखरि के पार।
टूटी गगन गिरा भई, सत्त सब्द झनकार॥
त्रिकुटी टाटी टूटि कै, सुन्न अंड भिनि बास।
घट भीतर परिचय भई, देखा अजर निवास॥