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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

घट रामायण / ६७
चित्त [दीदा (र)] रूपी पुष्प रात-दिन तिरकुटी पर चढ़कर इस प्रकार झूलता रहता है। पिंगला
की गति बाएँ एवं इंगला (इड़ा) की गति दाहिने फेर लेता है॥४॥
सूर्य तथा चन्द्र क्षण-क्षण वश में हो जाते हैं और सुषुम्ना (सुखमनि) तीव्रगति से चढ़ा लेते हैं।
बंकनाल की नल पल-पल खुली रहती है और अजपा जाप बोलना नहीं पड़ता, स्वयं होने लगता है।
पवन सिंधु में आकर तत्ऽहम् की गति सोऽहम्' की हो जाती है, तालु (तारी) मेरुदण्ड पर चढ़ जाती
है, मन स्थिर हो उठता है और वह दिव्य प्रकाश झलकने लगता है॥५, ६॥
उस आकाश को आत्म योग विधि से समझता हूँ और वहाँ-चर-अचर दोनों तत्त्वों को देखकर
उनका वर्णन करता हूँ। यह पिंड (अंडा) उस तत्त्व द्वार पर दिखाई पड़ने लगता है और वाणी, ज्ञान
तथा गति तीनों योगमयी हो उठती है॥ १७॥
संसार को यह 'काल की क्रीड़ा भ्रमित किए हुए है और वेद शास्त्रों ने सही मार्ग भुला दिया है।
योगियों ने इन सम्पूर्ण भ्रमित करने वाले तत्त्वों को योग के वश में कर लिया है और काल (मृत्यु) के
मार्ग का रस पी लिया है॥ १८॥
वे दयालु ब्रह्म अनेक रूपों के हैं, संत उन्हें पहचान कर स्वयं विलक्षण हो गए हैं। योग तथा ज्ञान
को पंडित (विद्वान) सुनकर स्वीकार करते हैं और वे शास्त्र तथा पुराण पढ़ते रहते हैं॥ ९॥
जैसे घड़े में जल है, और उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है-जब तक घड़े में आकाश का
बिम्ब स्थित है, तब तक सूर्य बिम्ब की भाँति वह परम तत्त्व दिखाई पड़ता है॥१०॥
घड़ा फूट गया, आकाश का बिम्ब नष्ट हो गया, सूर्य का बिम्ब भी विनष्ट हो उठा-उसी प्रकार इस
मानव योनि के नष्ट हो जाने पर सब अंधकूप जैसे हो उठता है। इस अंधे आकाश में कोई प्रतिबिम्ब
(भास) नहीं उठता-मन चारों ओर भूलकर भटक आता है। इस शरीर रूपी घट के विनष्ट हो जाने पर
यह देह अपने देही (ईश्वर) को पा जाता है और शरीर इस संसार में खो जाता है। ज्ञान योग व्रत संयम
करके तीनों गतियों उद्भव, स्थिति एवं संहार) पहचान लिया है। अन्तकाल में, यम के जाल में यह
जीव फँस जाता है और उसे काल अनेक प्रकारों से चबाता है॥
इसीलिए तुलसी साहब ने समस्त योग युक्तियाँ बताई हैं और उनसे जुड़े सन्तों की गति अगम्य और
न्यारी है।
सन्तों का मार्ग एवं आनन्द भिन्न है, इसे योगी भी नहीं जानते॥ १४॥
॥ सोरठा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
अगम अगत गति पार, जोग ज्ञान पहुँचै नहीं॥
अर्थ-रमक के मार्ग से शरीर का उद्धार करते हैं। और वे चारों युगों में योग करते हैं। अगम्य एवं
अज्ञेय (अगत) के ज्ञान के उस पार (जहाँ सन्त पहुँचते हैं) योग का ज्ञान नहीं पहुँचता॥
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कँवल षट गाऊँ। बसै तासु पर भेद बताऊँ॥
चढ़े चक्र षट जोगी गावै। तुलसी सब्द माहिं समझावै॥
काया माहिं कँवल का वासा। कँवल कँवल कहूँ भूमि निवासा॥
अर्थ-द्वितीय योग षट्दल कमल के स्थान का है। इस पर जो निवास करते हैं मैं उनके भेदों का
वर्णन करता हूँ। इस षट्चक्र पर चढ़कर योगी गान करता है-और तुलसी साहब कहते हैं कि वह उस
शब्दों से समझाता है। शरीर के मध्य में इस कमल का वास है-भूमि पर निवास करता हुआ योगी
कमल-कमल कहता रहता है।