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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

६८ / घट रामायण
॥ कहेरा ॥
काया कलस कँवल बिधि भाखी, परख लखी हिये आँखी हो।
भिनि भिनि जोग कँवल बिधि गाई, खुल षट भेद बताई हो॥ १॥
गुदा कर कँवल कहों दल चारी, गनपति बास बिचारी हो।
छै पखड़ी दल कँवल कहाई, बसै ब्रह्मा तेहि ठाँई हो॥ २॥
अष्ट कँवल दल नाम बसेरा, बसै बिस्नु तेहि तीरा हो।
दल बारा बिधि सिधि हिये माहीं, सिव कैलास कहाई हो॥ ३॥
सोला कंठ कँवल बिधि जानी, जगदंबा जग रानी हो।
सहस कँवल दल दीद निरंजन, घाट रोकि गल गंजन हो॥ ४॥
ये सब काल जोग रस माया, सिध जोगी सब खाया हो।
मुद्रा पाँच अवस्था चारी, तीनि ज्ञान गति धारी हो॥ ५॥
जोगी काल कलेवर कीन्हा, तप संजम ब्रत धारी हो।
कष्ट भोग फल काया पाया, चारि खानि गति चारी हो॥ ६॥
कँवल जोग जोगी गति गाया, भर्म भोगि भौ आया हो।
अब कहों संत भेद विधि सारी, जोग कँवल से न्यारी हो॥ ७॥
नौलख कँवल पार दल होई, परे चारि दल सोई हो।
ता के परे अगमगढ़ घाटी, नीर तीर गहि बाटी हो॥ ८॥
ता के परे परम गुरु स्वामी, जीव अधर घर धामी हो।
ता के परे परम पद माहीं, साहिब सिंध कहाई हो॥ ९॥
ता के परे संत घर न्यारा, अगम अगाध अपारा हो।
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा, अगम राह रस पीना हो॥ १०॥
अर्थ-काया में कमल की स्थिति कलश की भाँति बताया है और उसको देते हृदय की आंखें
उससे जुड़ जाती हैं। योग सिद्धान्त के अन्तर्गत इस कमल विधि का भिन्न-भिन्न वर्णन किया गया है
और षट्चक्र के द्वारों के खुलने की बात कही गई है॥ १॥
गुदा के कमल का वर्णन करता हूँ, वहाँ चार दल हैं और वहाँ गणपति (गणेश) का निवास
विचारा गया है। दूसरे चक्र या केन्द्र पर छः पंखुरियों का कमल है, उस स्थान पर ब्रह्मा निवास करते
हैं। २॥
तीसरे चक्र पर अष्ट पंखुरी का कमल है और उसके समीप विष्णु निवास करते हैं। हृदय चक्र पर
बारह पंखरियों का कमल है, इसे कैलास कहा जाता है और यहाँ शिव निवास करते हैं॥ ३॥
कंठ चक्र पर सोलह पंखुरियों वाला कमल है, और जहाँ सृष्टि की रानी जगदम्बा निवास करती हैं।
षट् चक्र सहस्रदल का कमल है, यहाँ निरंजन का साम्राज्य है-और आगे के घाटों को रोकर
रास्ते को दुर्गम (गंजन) बना देते हैं॥ ४॥
ये समस्त गति द्वितीय काल योग की हैं-यहाँ माया से उत्पन्न योग रस को सिद्ध योगी खाते हैं,
(सेवन करते हैं)। पाँच मुद्राएँ हैं, चार अवस्थाएँ हैं तथा तीन ज्ञान की गतियों से वे सम्पन्न हैं। काया के
कष्ट भोग का फल प्राप्त किया है और तप, व्रत, संयम भी ये योगी करते हैं। इस कमल योग की गति