घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ५९
अर्थ—समुद्र के शिखर के पार शून्याकाश में साधु का महल है और साधु जन यहां अजपाजाप
करते रहते हैं। यह शून्याकाश भी जब टूट जाता है, साधक की वाणी 'सत्य' शब्द की झंकार
(झंकृति) बन जाती है।
इस सिद्धावस्था में त्रिकुटी के टट्टर टूट कर शून्य पिंडाकाश में विचित्र सुगंधि से सुवासित
(भिनि) हो जाते हैं। इस घट के भीतर उस निरंकार से परिचय हो जाता है—इस प्रकार मैंने उस अजिर
ब्रह्म का निवास देखा है॥
॥ कँवल भेद॥ चौपाई॥
घट में सोधि कँवल जिन गाई। लखै कँवल बिरला कोइ भाई॥
अंकुर उतपति कँवल मँझारा। सत्त नाम पद तिनके पारा॥
ऊँच नीच परबत बिच बाटा। काल जहाँ रोकै नहिं घाटा॥
ता के दहिने मारग माई। दामिनि पाँच छेकि नियराई॥
देवै दानी दान चुकाही। पावै जीव अगम की राही॥
दानी कहै जीव सुनि बाता। बिना दान करिहौं मैं घाता॥
जब जिव कहै समझ सुन भाई। करौ घात केहि कारन जाई॥
अर्थ—इसी पिंड में अन्वेषण करके जिन्होंने कमल का वर्णन किया है, (वैसा वर्णन) कोई बिरला
बंधु ही कर सकता है। 'सत्तनाम' जिनके वश (पारा) में है, वे ही जानते हैं कि कमल के मध्य में
अंकुर की उत्पत्ति होती है। ऐसे जन, ऊँचे-नीचे पर्वत के बीच अपना सिद्धि मार्ग पा जाते हैं और वहाँ
काल घाट नहीं रोकता॥ हे सखी! उसी के दाहिने मूल मार्ग है, और वहाँ समीप आते ही पाँच बिजलियाँ
रास्ता रोक लेती हैं। यहाँ दानी साधु सर्वस्व दान चुकाकर, (वह जीव) अगम्य की राह प्राप्त करता है।
दानी कहता है कि हे जीव! मेरी बात तो सुनो-मैं बिना दान के घात करूँगा। तब जीव कहता है कि हे
भाई सुनो, किस कारण वहाँ जाकर घात करोगे?
॥ भेद पिंड और ब्रह्माण्ड का॥
अंतर गुफा तहाँ चलि जाऊँ। जहाँ साहिब के दरसन पाऊँ॥
पाँचौ नाम जीव जब भाखा। छठवाँ नाम गुप्त करि राखा॥
पाँचौ नाम काल के जानौ। तब दानी मन संका आनौ॥
निरगुन निराकार निरबानी। धर्मराय यों पाँच बखानी॥
जीव नाम निज कहै बिचारी। जानि बूझि दानी झख मारी॥
जाव जीव यह राह तुम्हारी। हम नहिं रोकैं बात बिचारी॥
पोचं पाँच हमहूँ सुनि पाई। हम नहिं निकट तुम्हारे आई॥
पोचं चोर रहे अलगाई। होइ निरभै जिव आगे जाई॥
आगे सात सुमेर उँचाई। नौ नाटक तापर रहैं भाई॥
नौ नाटक पूछन चले आगे। कहौ जीव केहि मारग लागे॥
हम यहि घाट बाट रखवारी। यहाँ न अदली चलै तुम्हारी॥
कहै जीव दृग दानी भाई। हम चलि जाइ नाम चित लाई॥