घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
पृष्ठ 59, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ / घट रामायण
बस तन मन रस निरमल होई, इंद्री इस्क खुद खोई हो ॥ २ ॥
ता पर तीन तलब पचबीसा, खड़ग ज्ञान दल पीसा हो।
उनके निकट नेक नहिं जावै, थिर होइ पवन चढ़ावै हो ॥ ३ ॥
दीदा फूल झूल दिन राती, त्रिकुटी चढ़ि येहि भाँती हो।
बिधि बायें पिंगला गति केरी, इँगला दहिने फेरी हो ॥ ४ ॥
चंद सूर दम दम बस आवा, सुखमनि चटक चढ़ावा हो।
बंक नाल पल पल नल खोली, अति अजपा नहिं बोली हो ॥ ५ ॥
ओहँग तत सोहँग मत जानी, पवन सब्द सँध आनी हो।
थिर मन मेरदंड चढ़ तारी, झलक जोति उँझियारी हो ॥ ६ ॥
तत अकास आत्म बिधिजानी, लख चर अचर बखानी हो।
अंडा तत्त द्वार दरसानी, जोग ज्ञान गति बानी हो ॥ ७ ॥
यह सब काल खेल भरमाये, सास्तर बेद भुलाये हो।
यह सब जोगि जोग बस कीन्हा, काल राह रस पीना हो ॥ ८ ॥
वे दयाल बिधि भेद अपारा, संत चीन्ह भये न्यारा हो।
जोग ज्ञान पंडित सुनि मानै, सास्तर पढ़त पुरानै हो ॥ ९ ॥
जैसे नीर घड़ा जल माईं, रबि प्रतिबिंब दिखाई हो।
जब लग घड़ा अकास समाना, तब लग तत दरसाना हो ॥ १० ॥
फूटा घड़ा अकास नसाना, रबि सूरज बिनसाना हो।
तत भयौ नास भास भइ जोती, अंध कूप हिये होती हो ॥ ११ ॥
अंध अकास भास नहिं पावै, भूल भटक मन आवै हो।
घट बिनसै तन देंही पावै, पुनि भव माहिं समावै हो ॥ १२ ॥
ज्ञान जोग ब्रत संजम कीन्हा, तीनि ज्ञान गति चीन्हा हो।
अंत काल जम जाल फँसाना, बहु बिधि काल चबाना हो ॥ १३ ॥
तुलसी जोग जुगति कहि झारी, संत अगम गति न्यारी हो।
संत राह रस अगम ठिकाना, जोगी भेद न जाना हो ॥ १४ ॥
॥ ककहरा ॥
अर्थ—योगी रमण (रमक) राह से शरीर को मुक्त (तार) कर देता है और वह चार प्रकार के
योगों को करता रहता है। ज्ञान योग में मिश्रित मन निर्मल नहीं (मैला) रहता और वह शून्याकाश में
चढ़कर खेलता है। अब मैं उसकी स्थिति और पद्धति (राहरीति) बतलाऊँगा (दरसाऊँ) और उसकी
भिन्न-भिन्न गतियों का गान करूँगा। शरीर मन के वश में और उसका आस्वाद (रस) निर्मल हो उठता
है और इन्द्रियों की संसक्ति (इश्क) को स्वयं खा जाता है॥ १-२॥
उसके ऊपर तीनों-नशे (तम, रज एवं सत्त्व) एवं पच्चीसों (तन्मात्राओं) को यह ज्ञान की तलवार
पीस डालती है। ये तीन गुण एवं पच्चीस तन्मात्राएँ उनके निकट नहीं जा पातीं और वह योगी (व्यक्ति)
स्थिर चित्त से वायु को मन में चढ़ाता है॥ ३॥