घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ें६० / घट रामायण
दानी दान चुकावौ आई। जब यहि बाट निभन तुम पाई॥
केहि कर अंस कहाँ तुम जाई। बात अपनी कहौ बुझाई॥
कहै जीव सतलोक निवासा। मैं चल जावँ पुरुष के पासा॥
दानी कहै दूरि है भाई। अगम पथ कैसे निभ जाई॥
कौन नाम मारग को जाई। कौन नाम से उबरै आई॥
इतना भेद कहौ समझावा। बाट जीव जब घर की पावा॥
अर्थ-जहाँ अन्र्तगुफा है, वहाँ चला जाकर साहिब (निरंकार ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करूँगा। जब
जीव ने पाँचों नाम बताना शुरू किया तब अन्त में उसने छठवाँ नाम गुप्त कर रखा। ये पाँचों नाम काल के
ही समझो। इसे सुनकर उस धर्मनिष्ठ (यानी - दान देने वाले) के मन में शंका हुई। धर्मराज यम ने
केवल निर्गुण, निराकार एवं वर्ण विहीन आदि पाँच की चर्चा की है, जीव ने अपने उस अलेख नाम का
वर्णन नहीं किया-और तब वह धर्मनिष्ठ जानबूझकर मुखमार कर बोला-हे जीव! जाओ, यह वह
तुम्हारी राह है, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो गए और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा।
आगे सात पर्वतों का ऊँचा शिखर हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियाँ हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव
पूछने चला-तो उत्तर मिला! हे जीव! जाओ, यह तुम्हारी राह हैं, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं
रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा। आगे
सात पर्वतों की ऊँची शिखाए हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियां हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव पूछने
चला-तो उत्तर मिला! हे जीव-तुम किस मार्ग से लगोगे या चलोगे। मैं इन घाटों-बाटों का रखवारा हूँ-
यहाँ पर तुम्हारी अदला-बदली नहीं चलेगी।
जीव कहने लगा, हे दृष्टि प्रदान करने वाले भाई! हम तो चित्त में नाम लेकर चलते रहे हैं। धर्मनिष्ठ
(धर्मराज यमराज) ने कहा हे भाई दानी, जब तुम आकर यहाँ दान चुकाओ, तभी इस मार्ग से तुम्हारा
निस्तार होगा। तुम किसके अंश हो, तुम कहाँ जा रहे हो, अपनी बात तुम समझा कर कहो।
जीव ने बताया कि उसका निवास 'सत् लोक' में है और मैं उस निरंकार पुरुष के पास चलकर
जाना चाहता हूँ। धर्मनिष्ठ बोला, वह तो बहुत दूर है, उस तक पहुँचने का मार्ग अगम्य है, तुम्हारा
पहुँचना वहाँ कैसे हो सकेगा? उसका नाम क्या है। उसका मार्ग क्या है, जब वह इन सारे भेदों को बता
सका, तभी उस जीव को अपने घर का मार्ग प्राप्त किया॥
॥ जीव वचन। चौपाई ॥
दानी सुनु बिधि बात हमारी। हम चलि जाइँ पुरुष दरबारी॥
सुरति निरति लै लोक सिधाऊँ। आदि नाम लै काल गिराऊँ॥
सत्त नाम लै जीव उबारी। अस चल जाऊँ पुरुष दरबारी॥
इतना बचन कही दिल सूना। बहुत त्रास लै मन में गूना॥
तुम मारग जावो जिव अपने। हम तुमको रोकें नहिं सपने॥
चले जीव आगे पग दीन्हा। करिया सरवर मारग लीन्हा॥
तहँ तौ पंछी एक रहाई। निस बासर वो बैठ ऊँचाई॥
तेहि मारग जिव चला अघाई। चोंचि पसार खान को चाही॥