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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

घट रामायण / ६१
मुख पंछी बहु भाँति पसारा। जिवरा तो को करौं अहारा॥
अपना नाम कहौ टक plug / टक plug... टक plug -> टक plug is टक plug? No: अपना नाम कहौ टक plug... let's read properly: अपना नाम कहौ टक plug -> अपना नाम कहौ टक plug... "टकसारा" । तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥ -> अपना नाम कहौ टक plug ... it clearly says: अपना नाम कहौ टकसारा। तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥
नहिं हम से तुम बचने पैहौ। तो को जिवरा धर धर खैहौं।
जिवरा सुरति नाम से लाया। करिया मारि पाँव तर नाया॥
जीव चला झरने के पारा। दस दिस देखि परा उँचियारा॥
अमी द्वार इमरत कर बासा। मिटा जीव का संसय सासा॥
अधर जीव इमरत को पीवै। सब्द बुंद इमरत जुग जी वै॥
बस्तु पाइ साधै कोइ साधू। चाखै इमरत सुरति समाधू॥
चटि चटि सूरति चढ़ी अटारी। इमरत अजर नाम की लारी॥
साहिब अजर सब्द घर पावै। आवागवन बहुरि नहिं आवै॥
डोरी पुरुष अकास अकेला। किया सुरति घट भीतर मेला॥
इमरत कँवल भरा भँडारा। पी वै जिव सो उतरै पारा॥
नाम अगाध कहौं समझाई। सूरति सब्द अगाध सुनाई॥
जो जिव चाहै अगम निवासा। सूरति करै सब्द में बासा॥
जिन जिन सूरति सब्द सँवारा। सो चलि गये अगम पद पारा॥
पावै भेद बस्तु लखि पावै। सो सतलोक सोक नसि जावै॥
सुरति सब्द में भई अधीना। ताकर भेद काल नहिं चीन्हा॥
सत्त नाम से काल नसाना। कोइ साधू काया मथि जाना॥
काया दरपन सुरति समानी। सो साधू साहिब सम जानी॥
अर्थ-हे धर्मनिष्ठ! मेरी बात को ठीक से समझो-हम उस दरबारी पुरुष (निरंजन) के पास जा रहे
हैं। सुरति-निरति दोनों को लेकर मैं उनके लोक में प्रवेश करूँगा और उस अनादि ब्रह्म का नाम लेकर
काल को नष्ट कर दूँगा। उस 'सत्यपुरुष' का नाम लेकर जीव ने स्वयं काल से उबारा और कहा कि
इस प्रकार मैं निरंजन के दरबार में चला जा रहा हूँ। उसने इतनी बातें शून्य मन से कही तब धर्मनिष्ठ
(काल) ने अत्यन्त संयस्त होकर मन में विचार किया और बोला-हे जीव! तुम अपने मार्ग पर जाओ,
हम तुम्हें अब स्वप्न में भी नहीं रोकेंगे।
जीव आगे चलकर पैर बढ़ाया, उसे मार्ग में एक काला सरोवर मिला। वहाँ एक पक्षी रहता था
और रात दिन वह ऊँचाई पर बैठा रहता था। उस मार्ग पर सन्तुष्ट होकर जीव चला, तब वह चोंच
फैलाकर जीव को खाना चाहा। पक्षी ने अपने मुख को अनेक भाँति से फैलाया कि मैं इस जीव का
आहार करूँगा। उसने पूछा कि अपना नाम साफ-साफ (टकसारा) बताओ, तभी उस निरंजन के
दरबार में जा पावोगे। हे जीव! तुम हमसे नहीं बचने पावोगे और मैं तुम्हें पकड़-पकड़ कर खाऊँगा।
जीव ने नाम के रूप में सुरति ध्यान किया और उसने करिया को मार कर पावों के नीचे गिरा दिया।
तब वह जीव उस झरने के उस पार गया तो उसे दसों दिशाओं में उजाला दिखाई पड़ा। द्वार अमृत
का था, वहाँ सम्पूर्णतः अमृत का निवास था और तब जीवन का समस्त संशय भाव समाप्त हो उठा।
जीव अधर-भाव से अमृत पान करने लगा-अमृतमय शब्द बिन्दुओं में वह जीने लगा। वस्तु पाकर कोई
साधुजन क्यों नहीं उसे साधेगा और अपनी सुरति समाधि में अमृत चखेगा।