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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

घट रामायण / ५७
जो जेड़ मूल भेद दरसावै। तब घट में अबिनासी पावै॥
सतसँग भक्ति हृदे बिच आवै। जब सतद्वार अगम लखि पावैं॥
हिरदै सत्त रहे लौ लाई। सब्द द्वार चढ़ि काल गिराई॥
मुक्ति ज्ञान पावै अबिनासी। अगम ज्ञान संग मूल निवासी॥
यह कोइ बिरला साधू पावै। अबिनासी गति अगम लखावै॥
सतगुरु कृपासिंधु कोइ जागै। आवा गवन भर्म भौ भागै॥
कीन्ही अगम नाम स्रुति सैला। चीन्हा अगम निगम तिन खेला॥
अधर सिखर पर तंबू तानै। जहाँ से देखै सकल जहानै॥
ब्रह्मांड द्वार एक है नाका। गहि दुरबीन सुरति से ताका॥
मकर तार पावै वह द्वारा। ता पर सुरति होय असवारा॥
सुरति जात लागै नहिं बारा। चली सुरति भड़ नाम अधारा॥
तब पहुँचै इक्किसवें द्वारा। सुन्न से परे सब्द है न्यारा॥
सुरति सब्द में जाइ समानी। निर सब्दी गति अगम लखानी॥
जहाँ नहिं पहुँचै मुक्ति पसारा। सोइ है आदि पुरुष दरबारा॥
मुनि अचार पावै नहिं कोई। सब भौ भर्म रहा जग सोई॥
अर्थ—आध्यात्मिक रस से रिक्त ये सब काल के जाल हैं। ये संसार की भौतिक लोक रचना की
खानि हैं और इन सबमें यमराज की प्रीति है, ऐसा जानो॥ शून्याकाश मंडल पर काल का स्थान है और
पंचमहाभूत तत्त्व विधिपूर्वक उसमें जाकर समा गए हैं। पंच महाभूत तत्त्व, पच्चीस तन्मात्राएँ तथा तीनों
गुणों का मन यहाँ मैला हो गया है—तुम सब यह उसी निर्गुण ब्रह्म का ही खेल समझो॥ काल ने माया
जाल को खाकर उसे और बढ़ा दिया—कोई ऋषि, मुनि उसके भेद को न समझ सका॥
जब साधक उल्टीरीति (मनोन्मनी द्वारा) शून्याकाश की ओर दौड़ता है फिर वहाँ काल मुरझा जाता
है। साहब सतगुरु जब मार्ग दर्शन कराते हैं तब पिंड के भीतर स्थित संसार का परिचय होता है। जो भी
साधक इस मूल तत्त्व का भेद बताता है तभी इस घट के अन्तर्गत कोई संत अविनाशी तत्त्व (निरंजन-
ब्रह्म) का परिचय प्राप्त करता है। जब अगम्य 'सत्' द्वार दिखाई पड़ेगा, तभी सत्संगति तथा भक्ति
हृदय के बीच आएगी॥
यदि हृदय में सत्य की लौ लगाए रहोगे तो शब्द के द्वार से चढ़कर काल को गिरा दोगे (नष्ट कर
दोगे)। अगम्य ज्ञान के साथ का मूल निवासी अविनाशी मुक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। इसे कोई विरला
साधु ही प्राप्त करता है। सतगुरु की कृपा-सिन्धु से ही कोई जागृति प्राप्त करता है, वह शून्याकाश में
आता है, तब उसका समस्त अज्ञानजनित संसारिक भ्रम भाग जाता है।
नामरूपी सुरति पर्वत को उसने अगम्य बना दिया है किन्तु जिन्होंने उस अगम्य। सुरति ज्ञान (तत्त्व)
तथा शास्त्र के ज्ञान तत्त्व को पहचान लिया है, वहाँ वही क्रीड़ा करता है।
अधर-शिखर पर वह तम्बू तानता है और वहाँ से वह सम्पूर्ण जगत को देखता रहता है। ब्रह्मांड द्वार
पर एक नाका है- (केन्द्र स्थान) वहाँ से वह सुरति रूपी दूरबीन से ताकता है। उस द्वार पर मकर तार
हैं उस पर सुरति सवार होती है। सुरति के चढ़कर जाने में देर नहीं लगती। यह सुरति वहाँ जाकर नाम
का आधार बन जाती है। तब इक्कीसवें द्वार पर पहुँचता है, जहाँ शून्य के अनाहत नाद से परे एक
विलक्षण शब्द है। जो सुरति ज्ञान में जाकर समा जाता है, उसे शब्दहीन सृष्टि की अगम्यगति दिखाई