घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ / घट रामायण
चट-चट करता हुआ तेजी से वह जीव सुरति ज्ञान की अटारी पर चढ़ गया-नाम रूप अजिर के
अमृत की वासना उसके हृदय में बस गई है। उस घर में निरंजन ब्रह्म का शब्द प्राप्त कर रहा है-अब वह
फिर 'आवागमन' के बंधन में नहीं आएगा।
वह शून्याकाश में अकेला उस निरंजन ब्रह्म से सम्पर्क साध लिया है और सुरति द्वारा इसी घट
(शरीर) में ही उससे सम्पर्क साध रखा है। उसका भंडार अमृत कमल से भर उठा है-जीव जो उसे
पीता है, वह सर्वथा उस पार उतर जाता है (इस भवलोक से मुक्ति हो जाती है)।
मैं उस अगाध नाम से सम्बोधित ब्रह्म के विषय में बताता हूँ। सुरति ध्यान में उस अगाध का ही
शब्द सुनाई पड़ता है। यदि जीव उस अगम्य ब्रह्म में निवास करना चाहता है तो वह सुरति साधना करके
'शब्द' में निवास करे। जिन-जिन सन्तों ने सुरति समाधि से वह शब्द सँवारा है, वे अगम्य पथ के पार
चले गए हैं।
वस्तु भेद को समझकर जो मूल तत्त्व को जान जाता है-वह सत् लोक प्राप्त करता है और उसके
समस्त शोक नष्ट हो उठते हैं। सुरति शब्द साधना के जो अधीन हो जाता है, उसके भेद के विषय में
काल भी अपरिचित रहता है। सत्य नाम से काल भी नष्ट हो जाता है, अपनी काया का मंथन करके
कोई-कोई साधु इसे समझते हैं। शरीर दर्पण हैं, इस दर्पण में 'सुरति' समाई हुई है, यदि इस प्रकार का
कोई साधु है तो उसे ब्रह्म के समान समझो॥
॥ साखी ॥
कँवला काल निरंजना, तिन बस कीन्हा घाट।
भिन्न भिन्न दरसाइ कै, सतगुरु दीन्ही बाट॥
अर्थ-कमल। काल एवं निरंजन इनके वश में सारे प्रस्थान मार्ग हैं, इन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में
दिखाकर सतगुरु ने सबके लिए रास्ता खोल दिया है।
॥ दोहा ॥
जीव चला घर आपने, काल छेकि जम जार॥
नाम सुरति जब लख पग, भागे ठग बटमार॥
अर्थ-जीव अपने घर की ओर चला और काल ने यम के जाल से घेरा। जब सबको सुरति समाधि
का सोऽहम् शब्द दिख पड़ा तो सभी ठग और बटमार (काल, यम आदि) भाग चले॥
॥ भेद पिंड और ब्रह्मांड का ॥
सुरति सब्द मिल लोक में, चढ़ि सतनाम जहाज।
तुलसीदास पिया मिले, कीन्हा सेज बिलास॥
अर्थ-इस लोक में सुरति से मिलकर सतनाम के जहाज पर चढ़कर तुलसीदास साहब कहते हैं, मैं
अपने प्रियतम से मिला और शैया विहार किया॥
॥ छन्द ॥
तुलसी लख जागे काल से भागे। लख दृग दानी दूर किये॥
इमरत रस चाखा सौ सब भाखा। जीव अघाइ अनाद पिये॥१॥
सतनामहि जाना पद पहिचाना। सुरति सब्द जो जाइ लिये॥
जिन जो स्रुति सैना देखा नैना। अगम अपने पौ पाइ पिये॥२॥
हिये खुल गइ आँखी सब बिधि भारवो। काल बरन बिधि बूझि कही॥३॥