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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

घट रामायण / ६३
अर्थ--तुलसी साहब कहते हैं कि प्रियतम के साथ मुझे देखकर सभी सभी सोते जागकर काल की
भाँति भगे और (प्रियतम के साथ देखकर) हमसे धर्मराज (दानी) ने अपनी आँखें दूर कर ली। सारा
संसार कहता है कि मैंने अमृत रस चख लिया है और इस जीव ने उसे आनादि तत्त्व के साथ तृप्त होकर
अमृत का पान किया॥ १॥
उस सत्य नाम को मैं जान गया, उसके चरणों को मैं पहचान गया और वहाँ जाकर उस सूरति
सबद को ग्रहण कर लिया। वह जो समस्त वैदिक तत्त्वों का समूह था, उसे मैंने नेत्रों से देखा और उस
अगम तत्त्व को अपने में (अपने पी) पाकर तृप्तभाव से पिया। हृदय की आँख खुल गई, उसका हर
प्रकार से वर्णन किया और इस प्रकार मैंने काल के नाना रूपों (बरन विधि) को समझ कर
बताया॥ २-३॥
॥ सोरठा ॥
बानी काल बिचार, तीनि बरन तोली सबै।
कहौं बरन निरधार, सो कोइ साधू परखिहै॥
अर्थ-वाणी और काल का विचार मैंने तीन प्रकार से तौला है (समझा है)। इसके रूपभेद का
निर्धारण करके मैं बता रहा हूँ। इसको कोई साधू ही परखेगा (पुनः मूल्यांकन करेगा)।
॥ चौपाई ॥
काल बैन बिधि भाखि सुनाई। ता की अब मैं करों लखाई॥
बानी तीनि तीनि बिधि जानी। कँवल मध्य में कहीं बखानी॥
कौन बरन वे कँवल रहाई। जाकी विधि बिधि कहों बुझाई॥
कोने बरन निरंजन देवा। तिन का बरन बताओं भेवा॥
करिया बरन काल को भाई। सेत रक्त वे कँवल रहाई॥
सुन्नि के बरन निरंजन देवा। तिन कर कहों निरख सब भेवा॥
अब बानी का कहौं बिचारा। बूझै साध करै निरवारा॥
बानी कौन निरंजन होई। बानी कौन काल की सोई॥
बानी कौन कँवल की लीन्हा। सो सब निरखि बताओं चीन्हा॥
बानी अधर निरंजन सोई। बानी क्रोध काल की होई॥
बानी मेल कँवल कर लीन्हा। येहि बिधि से तीनो हम चीन्हा॥
अर्थ-काल की वाणी का वर्णन करके सुनाता हूँ। अब मैं उसके स्वरूप को बताता हूँ। वाणी को
तीन प्रकार की समझो। कमल मध्य में स्थित इस वाणी का मैं वर्णन करता हूँ॥
किस प्रकार कमल के मध्य में यह वाणी रहती है, मैं इस विधि के अनुसार उसका वर्णन करता
हूँ। निरंजन देव किस वर्ण के हैं, हे भाई उनका वर्णन करो॥
काल का भाई श्याम वर्ण का है, वे रात में कमल में प्रवेश करके लाल वर्ण के हो जाते हैं।
निरंजन शून्य वर्ण के हैं। मैं उनको पूरी तरह से देखकर ही उनके भेदों को बताता हूँ॥
अब मैं वाणी का निराकरण करता हूँ। कोई साधु ही इसे समझकर इससे सम्बद्ध सत्य का
निराकरण कर सकता है। इसमें निरंजन की वाणी क्या है? कौन काल की वाणी है कमल किस वाणी
को ग्रहण करता है-इन सबको भलीभाँति पहचानकर बताओ॥
जो वाणी अंतरात्मा (अधर) की हैं, वह निरंजन भी वाणी है। क्रोध की वाणी है। कमल से मेल-
मिलाप कर रही-एक वह भी वाणी है। इस प्रकार से हमने तीनों वाणियों को पहचान लिया है॥