घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ६९
का ज्ञान योगियों ने किया है किन्तु भ्रमित होकर ये पुनः इसी भोग वासना से संसक्त संसार में आए हैं ॥
अब मैं इन योगियों से भिन्न सन्तों की विलक्षण गतियों का वर्णन करता हूँ, जो इस कमल योगसिद्धि से
भिन्न प्रकार की है ॥ ५, ६-७ ॥
सहस्रार कमल के उस पर नौ लाख पंखुरियों वाला कमल है-उसके आगे चार दल का कमल है।
उसके आगे अगमगढ़ की पार घाटी है और उसका जल तटों के हिसाब (श्रम से) बंटा है। उसके
आगे, परमगुरु स्वामी (अगम्य ब्रह्म) और वह जीव की अन्तरात्मा का ही निवासी है। उसके आगे परम
पद है जहाँ स्वामी का अगाध समुद्र है। उसके आगे सन्तों का विलक्षण निवास गृह जो अगम्य, अगाध
एवं अपार बर्तमान कहा गया है। तुलसी साहब कहते हैं कि सन्त जन उस अगम पर्वत में सुरति समाधि
करते हुए अगाध रस का पान करते हैं (योगियों की भाँति पुनः भवसागर में नहीं आते) । ४ से १० ॥
॥ सोरठा ॥
जोगी जुगति विचार, संत भेद न्यारा कहैं।
करि करि जोग बयान, काल खानि भौं रस रहै ॥
अर्थ-योग तथा आत्मज्ञान के अतिरिक्त ये योगी और कुछ नहीं जानते। योग का वर्णन बार-बार
करते हुए काल की खानि इस सांसारिक भौतिक आनन्द में डूबे रहते हैं ॥
॥ चौपाई ॥
जोग निरंजन कीन्ह पसारा। यह सब काल जाल भ्रम डारा ॥
कँवल सहस्र समाधि लगावै। मन सोइ काल निरंजन पावै ॥ १ ॥
अंड खंड ब्रह्मांड पसारा। ये सब जानौ मन की लारा ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस कहाये। ये सब मन मत गति उपजाये ॥ २ ॥
मन सोइ निरंकाल है भाई। ता कर बास अकास के ठाई ॥
वा का सुनौ बास बिधि मूला। अगिनि अकास कँवल जहँ फूला ॥ ३ ॥
तुलसी ता की बिधी बताऊँ। सब्द राह रस भेद सुनाऊँ ॥ ४ ॥
अर्थ-योग ने निरंजन के चिन्तनका प्रसार किया और इन सबने काल जाल के भ्रम में सभी को
डाल दिया। सहस्रार दल कमल में ये योगी समाधि लगाते हैं और उनका मन उसी कमल में निरंजन
को प्राप्त करते हैं।
पिंड के खंड-खंड में ब्रह्मांड फैला है-इन्हें सब मन की तृष्णा समझो। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो भी
कहे जाते हैं-ये सब मन के ही ज्ञान से उत्पन्न किये गये हैं।
वह मन ही काल की पहुँच के बाहर है, उसका निवास आकाश-स्थल में है। उसके निवास एवं
विधि के तत्त्व को सुनो। पिंड में जहाँ एक अग्नि आकाश कमल खिला हुआ है। तुलसी साहब कहते हैं
कि मैं उसकी समझ की विधि का वर्णन करता हूँ और उसके शब्द, मार्ग, रस के भेदों को सुना रहा
हूँ॥
॥ कहेरा ॥
अगिनि अकास जरत जल जाना, ता बिच कँवल फुलाना हों।
डंडी कँवल फूल नभ नारी, रज ब्रह्मा बिस्तारी हो ॥ १ ॥
नाल वोही तुम संकर तारी, बिस्नु बिपति जग झारी हो।
मिलि तीनों मन मरम न जाना, कीन्हे वेद पुराना हो ॥ २ ॥