घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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॥ साखी ॥
निरगुन सरगुन लखि परै, काया काल बिचार।
आदि पुरुष सत लोक में, सो घर अधर हमार ॥ १ ॥
घट घट में सब लखि परा, भिनि भिनि अगम पसार।
तन बिच सोला द्वार की, तुलसी कहत पुकार ॥ २ ॥
अर्थ-शरीर एवं काल विचार के क्षण निर्गुण व सगुण दोनों दिखाई पड़े। आदि पुरुष ( ब्रह्म ) सत्य
लोक में है, और वही हमारी अन्तरात्मा का घर है।
इस संसार के घट-घट में भिन्न-भिन्न अगम्य तत्त्वों का प्रसार दिखाई पड़ा। इस प्रकार, इस शरीर
में सोलह द्वारों की चर्चा तुलसी साहब पुकार-पुकार कर करते हैं।
॥ चौपाई ॥
सोला द्वार भेद कहौं भाखी। जा की बरन बिधी कहूँ साखी ॥
प्रथम द्वार का भेद बताऊँ। जा की बिधि बरतंत सुनाऊँ ॥
प्रथम मूल दीप गति गाऊँ। जा की नाम ठाम समझाऊँ ॥
सतगुरु गुप्त भेद लखवावै। सोला द्वार भेद जब पावै ॥
अर्थ-सोलह द्वार भेदों का वर्णन करता हूँ-मैं इनकी वर्णन विधि और उनकी साक्षी बताता हूँ। मैं
प्रथम द्वार के भेद का वर्णन करता हूँ-मैं उसकी विधि और वृत्तान्त सुनाता हूँ॥ प्रथम भेद की मूल
गति का गान करता हूँ-मैं उसके नाम तथा स्थान का भी वर्णन करता हूँ। सोलह द्वारों के भेद का ज्ञान
जो सन्त प्राप्त कर लेता है तभी वह सद्गुरु के गुप्त रहस्यों को देखता है।
॥ द्वार भेद ॥
परथम सहस कँवल में द्वारा। दूसर अकह कँवल के पारा॥
तीसर द्वार गगन के नीचे। चौथा द्वार अधर के बीचे॥
जहँवाँ बैठा कंदर काला। जिनहिं बिछाया जग जम जाला॥
पंचम द्वार दसौ दिस बाहिर। मन सब बैठा जग में जाहिर॥
भँवर गुफा बिच छठवाँ द्वारा। कँवल भँवर तहँ बसै नियारा॥
सतवाँ द्वार दसों के दहिना। पाँचो भूत सूत बिन सैना॥
अठवाँ मूल चक्र के माहीं। बैठा मूल मोह रस राही॥
नौवाँ द्वार ताल में होई। स्वाँसा पवन चलावै सोई॥
ये नौ द्वार काल के जाना। दसवाँ द्वारा अधर बखाना॥
द्वारा चारि गुप्त गुहराई। जानै साध संत जिन पाई॥
ऐसे चौधा भेद पुकारा। पन्द्रा द्वार सत्त के पारा॥
सोला खिरकी अगम निसानी। जा में सत साहिब की बानी॥
ता के परे द्वार नहिं देखा। जहँ इक साहिब नाम न भेसा॥
संत सैल वह अगम निसानी। बसै संत वोहि धाम अनामी॥