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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

घट रामायण / ६५
काया मद्धे काल बिचारो। निरंकार से पुरुष नियारो॥
वा का भेद साध कोई पावै। अगम निगम सोइ संध लखावै॥
जोगी रमक राह नहिं जाना। जोग ज्ञान मत भेद भुलाना॥
प्रानायाम जोग कोर कीन्हा। लोई कोई कवल उलट कर लीन्हा॥
कोग अष्टांग जोग जस कीन्हा। परम जोग रस रहे अधीना॥
अर्थ-प्रथम भेद सहस्र कमल के द्वार घर है, दूसरा द्वार अकथ्य कमल के उस पार है, तीसरा द्वारा
शून्य के नीचे है और चौथा द्वारा अन्तरात्मा के बीच में है। जिस गुफा में काल बैठा है और जिसने समस्त
संसार के लिए माया जाल फैला रखा है पाँचवाँ द्वार उसकी दशों दिशाओं के बाहर है संसार में यह
स्पष्ट है कि वहाँ 'मन' रस लेता हुआ बैठा है।
भँवर गुफा के बीच छठाँ द्वार है—जहाँ भ्रमर कमल पर स्वच्छन्द (नियारा) बैठा रहता है। सातवाँ
द्वार दसों द्वार के दाहिने है—जहाँ पाचों महाभूततत्त्व बिना बन्धन (सूत) और बिना सेना (नियंत्रण) के
हैं। आठवाँ द्वार मूल के मध्य है—जहाँ मूलतत्त्व मुग्धभाव से रसास्वादन करता है। नौवाँ द्वार तालु में है
और वही श्वास वायु को चला रहा है॥ इन नवों द्वारों को काल का द्वार समझो और दसवाँ काल
अन्तरात्मा में है॥ चार द्वार गुप्त कहे गए हैं—जिन साधु सन्तों ने प्राप्त कर लिया है, उन्हें वही जानते हैं।
इस प्रकार, चौदह द्वार पुकारे गए हैं, पन्द्रहवाँ द्वार सत्य के उस पार है।
सोलहवें द्वार की खिड़की अगम की निशानी है—जिसमें निरन्तर सत साहब (निराकार ब्रह्म) की
वाणी सुनाई पड़ती है॥
इस सोलहवें द्वार के पार न कोई द्वार है और न कोई देश है वहाँ साहेब (परमात्मा) एक हैं, न
उनका कोई नाम है और न कोई वेष। वह सन्तों का पर्वत है और सन्त जन उस अनाम धाम में निवास
करते हैं।
काया के मध्य में काल का विचार करो और समझो कि वह पुरुष निरंकार और बिलक्षण है।
इसका रहस्य कोई ही साधु प्राप्त कर सकते हैं। वही अगम तथा निगम दोनों ज्ञानरूपों का सिंधु है।
उसमें रमता हुआ जोगी भी उसके मार्ग को नहीं जानता—वह तो योगमत के ज्ञान के भेदों में खोया रहता
है। कोई प्राणायाम योग करता है, कोई लोग (लोइ) कमल को योगसाधना द्वारा उलट लेते हैं। कोई
अष्टांग योग करते रहते हैं फिर भी वे उस परम योग रस के अधीन रहते हैं। ये सारे योगी योग कराते हैं
और वह निष्ठुर कठिन काल सबके घर आता है अर्थात् सभी काल कवलित होते हैं।
॥ गुफा ( 1 ) ॥
यह सब जोगी जोग कराया। कठिन काल सब घर घर खाया॥
जोगी राह रीत दरसाऊँ। भिनि भिनि जोग बिधी बिधि गाऊँ॥
जोग सब्द बिधि कहौं बखानी। बूझै जोग कीन्ह सोइ जानी॥
अर्थ-मैं अब योगियों के मार्ग एवं उनकी पद्धति का वर्णन करता हूँ। भिन्न-भिन्न रूपों द्वारा मैं
उनकी विधियों के अनुसार उनका गान करता हूँ। योग शब्द विधियों का मैं वर्णन करता हूँ—जिसने
योग किया है, वही उसे समझ सकेगा॥
॥ कहेरा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
ज्ञान जोग मिसिरित मन मैला, चढ़ि अकास नित खेला हो॥१॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ, बिधि भिनि भिनि गति गाऊँ हो।