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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

४८ / घट रामायण
ब्रह्म का नाम छोड़कर मनुष्य इस संसार में जीव कहा जाता है और अनेक योगियों में भ्रमण करता
हुआ वह भवसागर में रहता है॥ ब्रह्म के अभ्यन्तर में जीव जाकर उस प्रकार बैठ जाता है, जैसे राई
(छोटी सरसों) के दसवें भाग में समा गया हो॥
यह एक राई का दसवाँ भाग अपने अन्तर काल में एक लम्बा रास्ता-सा लगता है। इस बड़े अन्तर
को देखकर जीव को बड़ा शोक होता रहता है-तीनों लोक तो काल की आँखें हैं॥
जीव की आँखें उस समय पुरुष को देखती रहती हैं क्योंकि अब काल की दृष्टि विशेष हो गई है-
वह पुरानी दृष्टि नहीं रह गई है। जीव की आँख में चकोर (प्रभु संसक्ति हो गई) समाविष्ट हो गया और
पाँचों इन्द्रियाँ दृष्टि (देखते) जैसा व्यवहार (बाना) करने लगती हैं॥
प्रकृति में आवेग (उद्गा) आ गया, पृथ्वी दृष्टिमती हो गई और यह दृष्टि शून्याकाश में मनुष्य जैसी
मुद्रा करने लगी। पंच तत्त्व पाँचों नारी जैसे प्रभु में समर्पित हो उठे और मूरति साधना के बीच केवल
नाम ही बच पाता है॥
॥ दोहा ॥
काल करै जिव हानि, तुलसीदास तत सम रहौ॥
घट रामायन सार, मथि काया बिच घट कह्यो॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि काल ही जीव की हानि कर सकता है, अतः तत सम (संसक्ति
रहित निरपेक्ष) होकर जीवन यापन करो। इस घट रामायण में काया के बीच पिंड को मथकर तत्त्व-
चिन्तन किया गया है-(उसे समझो)॥
॥ सोरठा ॥
भिनि भिनि कहौं बखान, आदि अंत घट भेद बिधि॥
तुलसी तनहिं बिचार, घट निरखो निज नैन से॥
अर्थ-पिंडभेद के विधियों को आदि से अन्त तक भिन्न भिन्न रूपों में बताया गया है। तुलसी साहब
कहते हैं कि शरीर पर विचार करते हुए अपने नेत्रों से इस पिंड को देखो॥
॥ चौपाई ॥
आगे घट का भेद बखाना। बतिस नाल घट भीतर जाना॥
नाल भेद बिधि कहौं बुझाई। जिन जानी घट परचे पाई॥
अर्थ-आगे घट में भेदों का वर्णन किया गया है। इस घट के भीतर बत्तीस नाल जानिये। मैं
समझाकर नाल भेद विधिपूर्वक कहता हूँ। जिन्होंने इसे जाना, उसे घट का परिचय प्राप्त हो गया।
॥ नाल के नाम – चौपाई ॥
प्रथम नाल की बिधी बताऊँ। अभया तेज ताहि कर नाऊँ॥
दूसर रहस नाल जो गावा। चौदल कँवल फूल तेहि ठाँवा॥
कँवल चार दल भँवर उड़ाना। चढ़ि अकास बिधि जाइ समाना॥
कनक नाल तीसर कर नामा। चौंसठ जोगिनि बसै तेहि ठामा॥
चौथी नाल बिकट थिर थाना। कोठा नाल बहत्तर जाना॥
धुन्धर नाल पाँचवीं होई। काल सिंहासन बैठा सोई॥
छठवीं नाल रूपरम नामा। निरगुन रूप बसै तेहि ठामा॥

घट रामायण / ४९
नाल सातवीं सेत बताई। गन की कला बसै तेहि माईं॥
नाल आठ अभया मत नाँऊँ। कामिनि चारि बसै तेहि ठाऊँ॥
नाल मुकरमा नौवीं नामा। द्वादस दूत बसै तहि ठामा॥
हरि संग्रह दसवीं दरसाई। लछमन राम बसै जेहि माईं॥
मुक्तामनि एकादस सोई। कलसर दूत बैठ बल जई॥
द्वादस नाल पोहप पट माईं। नभ नल द्वार सब्द गोहराई॥
तेरहवीं नाल निकट नट नौली। बचन बिदेह बाक बिन बोली॥
चतुरदसि नाल नटवर नामा। मेधा छपन कोटि बिसरामा॥
पंद्रा गगन नाल निरबानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
सोला सुखमनि नाल कहाई। सुकिरत सेत बसै तेहि ठाईं॥
सत्रह नाल अनूप अचीन्हा। अंडा बिदित बिस्व रचि लीन्हा॥
अठारा नाल बिमल सुर ज्ञानी। तैंतिस कोटि देव दरबानी॥
उन्निंस नाल भँवर मन्दा की। अंडा कुम्भ रहै मन छाकी॥
बिसवीं नाल अजोरक माली। सूरत सब्द सेत चढ़ि चाली॥
इक्विस नाल हंसदे नाऊँ। मुक्ता मानसरोवर ठाऊँ॥
बाइस नाल सत अंकित होई। बन अशोक सीता जहँ होई॥
तेइस नाल नगर एक बाटा। जहाँ को जम रोकै नहिं घाटा॥
चौबिस बिखम नाल निजधामा। गुंजे भँवर कंज के ठामा॥
पच्चिस नाल पदम सुर सोई। पचरँग रूप जहाँ नहिं होई॥
छबिस नाल गढ़ गोधर नाईं। अटक पार चढ़ फटक समाई॥
सताइस नाल त्रिकुट पर लंका। जहँ रावन बसै ब्रह्म निसंका॥
अठाइस सेत द्वार दुरबीना। समुन्दर सात पार कोइ चीन्हा॥
उंतिस नाल सिखर पर सैला। अच्छर अंदर अगम दुहैला॥
तिसवीं नाल अधर रस रोकी। जहाँ निरंजन बैठे चौकी॥
इकतिस सुरति कँवल अस्थाना। कोइ सज्जन सत साध बखाना॥
बत्तिस नाल सब्द सुन माईं। मुकर द्वार चढ़ि छूटै झाईं॥
बत्तिस नाली बरन अनूपा। सुर नर मुनि नहिं पाव भूपा॥
ये सब नाल चाल दरसाई। सो सब देखे घट के माईं॥
जिनके नाम ठाम गुन बरना। कहै तुलसी संतन के सरना॥
बत्तिस नाल बरनि समझाई। वाकी मुनि हर एक रहाई॥
बंक नाल है वा को नाँवा। तीनों भवन भेद नहिं पावा॥
घट में बत्तिस नाल बखाना। काया सोध साध कोइ जाना॥

५० / घट रामायण
अर्थ-अब मैं प्रथम नाल के विषय में बताता हूँ, उसका नाम अभया तेज है॥ १॥ दूसरे नाल 'रह्म'
का जो गान करते हैं-उसके स्थान चार दल वाले कमल के फूल पर होते हैं॥ १॥ इसके चार दलों से
भ्रमर उड़ते हैं और वे आकाश में चढ़कर विधाना (ब्रह्मा) में प्रवेश कर जाते हैं॥ १२/२॥ कनक नाल
तीसरा नाम है-यहाँ चौंसठ योगिनियाँ निवास करती हैं॥
चौथा नाल विकट नाल है। उसका स्थान स्थिर है, और इसमें बहत्तर कोठा नाल हैं। पाँचवीं नाल
धुन्धुर नाल है और वह काल के सिंहासन पर बैठा हुआ है।
छठी नाल का नाम 'रूपरम' है-और यहाँ निर्गुण रूप का निवास होते होता है। सातवीं नाल मेन
बताई गई है, उसमें मन की समस्त कलाएँ निवास करती हैं॥
आठवीं नाल का नाम अभयामत है-जिसके पास चार कामिनियाँ निवास करती हैं। नवीं नाल का
नाम मुकरमा है, उसके पास बारह दूत निवास करते हैं॥
हरिसंग्रह दसवीं नाल कही गई है-जिसमें राम-लक्ष्मण बैठे हुए हैं। एकादश नाल मुक्तामणि है-
जहाँ कलसर दूत बलपूर्वक बैठे हुए हैं॥
हे सखी! बारहवीं नाल पोहप पट है, यह नाल द्वारा आकाश में शब्दों को बुझाता है। तेरहवीं नाल
नौली नाम की सन्निकट ही है-यह वचन विदेह एवं वाणी बिना बोली के हो जाया करती है॥
चौदहवीं नाल का नटवर नाम है, जहाँ छप्पन कोटि मेधा (प्रतिभा) विश्राम करती हैं। पन्द्रहवीं
नाल का नाम निरवानी है-जहाँ 'उल्टा कूप' का जल झर झर कर चूता रहता है॥
सोलहवीं नाल सुखमनि है-उस स्थान पर सुकीर्ति सेतु स्थित है-सत्रहवाँ नाम अनुपम एवं अर्चान्हा
है-जहाँ विश्व के समग्र ब्रह्मांड की रचना वर्तमान है॥
अठारहवीं नाल को देवगण 'विमल नाम से जानते हैं-जहाँ तैंतीस करोड़ देवता दरबानी करते रहते
हैं। उन्नीसवीं नाल 'भँवर मन्दाकी' है-जहाँ शरीर एवं पिंड एक होकर रहते हैं॥
बीसवाँ नाल अजोरक माली है-जहाँ सुरति शब्द सेतु तक चढ़, कर पहुँच गए हैं? इक्कीसवें नाल
का नाम हंसदेव है-वहाँ मुक्ता तथा मानसरोवर दोनों हैं॥
बाइसवीं नाल 'सत अंकित' है-जहाँ अशोक वन में सीता है। तेइसवीं नाल नगर में 'एक बार' है-
जहाँ यमराज कोई मार्ग नहीं रोकता। चौबीसवाँ, विषम नाल है-जहाँ उसके धाम में कमल के पास
भ्रमर गुंजरित होते रहते हैं॥ पच्चीसवाँ नाल पद्म सुर है-जहाँ पंचेन्द्रियों वाले रूप नहीं होते॥
छब्बीसवें नाल का नाम गोधरगढ़ है-जहाँ खाइयों का अवरोध पार करते ही शून्य द्वार (फाटक)
में समा जाते हैं। सत्ताइसवीं नाल त्रिकुटी पर है, लंका उसका नाम है- जहाँ रावण ब्रह्मा से निर्भय नि-
शंक भाव से निवास करता है॥
अट्ठाइसवाँ द्वार श्वेत द्वार है-जहाँ दूरबीन है और वहाँ से सात समुन्दर पार स्थित किसी को पहचान
लेता है। उन्नीसवाँ नाम 'शिखर पर शैल' है जो अन्तर बिना अक्षर (नाम का) दुर्लभ तत्त्व है॥
तीसवाँ नाल 'अधर रस' के रूप में रोकी हुई है-जहाँ निरंजन ब्रह्म चौकी पर बैठे हुए हैं।
इकतीसवीं नाल सुरति स्थान पर है-जिसका वर्णन कई सज्जन या साधुजन ही कर सकता है॥
हे सखी! बत्तीसवें नाल के शब्दों को सुने-वह मुकुट पर लगी हुई झाईं की भाँति हैं-जो उस पर
चढ़ने से छूटती है।
बत्तीसवाँ नाल अनुपम वर्णन का है-उसे कोई देवता, मुनि या राजा नहीं पा पाते॥
इन समस्त नालों की अवस्थाओ को मैंने बताया है-इन्हें सभी साधक अपने शरीर के भीतर देखते
हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि संतों की शरण में रहकर मैंने इनके नाम, स्थान तथा गुणों का वर्णन
किया है॥
मैंने बत्तीस नालों का वर्णन करके समझा दिया है। शेष मुनियों द्वारा वर्णित 'एक नाल' अपहृत है।
उसका नाम बंक नाल है। तीनों लोकों में उसका रहस्य समझा नहीं जा सका है॥

घट रामायण / ५१
इस पिंड के अन्तर्गत मैंने बत्तीस नालों का वर्णन किया है कोई साधु ही अपनी काया (पिंड) का
शोधन करके इसे समझ सकता है ॥
॥ दोहा॥
बत्तिस नाल निहारि कै, तुलसी कहा बिचारि ॥
घट घट अंदर देखि कै, साध करै निरवार ॥
अर्थ-बत्तीस नालों को देखकर तुलसी साहब ने उसे विचार करके बताया है। इन्हें पिंड-पिंड के
अन्दर देख करके साधुजन इनका निर्धारण करेंगे ॥
॥ चौपाई ॥
सत्त बचन साधू परमाना। भीतर भेद सत्त पहिचाना ॥
काया खोज नहीं जिन पाया। जाके सदा हिये तम छाया ॥
काया खोज किया नहि भाई। सुकदेव रहे भूल के माइ॥
ब्यास जनक नारद नहिं पाई। कथि पुरान आतम गति गाई ॥
अर्थ-सत्य वाणी के लिए साधुजन ही प्रमाण हैं। पिंड के भीतर के भेद ही सत्य की पहचान है।
जिसने इन तत्त्वों को शरीर में खोजकर नहीं प्राप्त किया-उनके चित्त पर सदैव अंधकार छाया रहेगा ॥
हे सखी! जिन्होंने काया में इसकी खोज नहीं की, ऐसे शुकदेव भूल में पड़े रहे। व्यास, राजा जनक
तथा नारद ने भी इसे प्राप्त नहीं किया और पुराणों का कथन करते हुए आत्मा के ज्ञान को गाते रहे ॥
॥ दोहा ॥
ज्ञानी भूले भर्म में, परम हंस ब्रह्मचार।
सास्तर संघ बिचारिया, बहै कर्म की धार ॥
अर्थ-परम सिद्ध (हंस) के ब्रह्माचरण को ज्ञानी भ्रम में पड़कर भूल गए। वे उसे शास्त्रों में विचार
करते हुए कर्म की धारा में बह गए ॥
॥ सुन्न भेद । चौपाई ॥
आगे कहो सुन्न बिस्वासा। बिना सुन्न गये जीव निरासा ॥
अब निज कहौं सुन्न में स्वाँसा। बिना सुन्न जिव काल निवासा ॥
सुन्न दिसा बिधि कहौं बुझाई। बूझै साध सुन्न जिन पाई ॥
बिरला सुन्न भेद को पावै। सुन्न दीप सोइ सब्द कहावै ॥
सुन्न की सोत धुन्न में लागी। धुन की सोत गगन में जागी ॥
गगन के ऊपर पवन रहाई। निरगुन पावन भवन के माई ॥
निरखि कँवल साधै कोइ साधू। मिटि जाइ काल कष्ट की ब्याधू ॥
मूल कँवल के ऊपर देखो। घट में सत्त सब्द ले पेखो ॥
अष्ट कँवल ओंकार का बासा। सो निज बूझो काल तमासा ॥
षोड़स कँवल को ध्यान लगावै। जोगी करै भेद सोइ पावै ॥
पवन जोग-जोगी गति गाई। त्रिकुटी निज धुनि कँवल कहाई ॥
मन थिर होइ सुरति ठहरावै। त्रिकुटी कँवल पवन लै आवै ॥

५२ / घट रामायण
देखै अवर पवन हिये माई। चमकै जोति दृष्टि में आई॥
जीव पवन जब चलै अघाई। सेत पवन से मारि चलाई॥
करिया पवन भई बलहीना। नाखौ पवन जीव जब चीन्हा॥
नाखौ पवन भरोसा मोरा। सेत कँवल से बाँधौ डोरा॥
सेत कँवल सुकिरत की होई। सत मत द्वार जानिये सोई॥
सत्त सुकृत की एकै बानी। ताकी गति बिरलै पहिचानी॥
कदली सब्द लाभ जिन देखा। मुक्ति अमी तहँ पियै अलेखा॥
जहाँ निरंजन बसै निदाना। सहस कँवल जोगी बिधि जाना॥
द्वादस आगे इमृत बासा। निगुरा नर सो मरै पियासा॥
सगुरा होइ सोई निज पावै। भर-भर मुख इमृत भल खावै॥
पीवै अमी लोक को जाई। घट भीतर निज खोज लगाई॥
पाँजी खोज हाथ अनुसरई। सो जिव सहजै से भौ सरई॥
झिलिमिल झरै सुन्न के माहीं। गंगा जमुना सरसुति राही॥
गङ्गा जमुना सरसुति होई। तिरबेनी संगम है सोई॥
त्रिकुटी संगम बेनी घाटा। बसै जीव सत पावै बाटा॥
बंक नाल होइ गंगा जाई। जमुना सुन्न गुफा से धाई॥
सरसुति सेत कँवल से आई। मन जोगी बिधि बास कराई॥
गंगा गहै करै असनाना। जमुना दूरि मुक्ति कर थाना॥
तीनौ नदी तीनि हैं धारा। आप आप में देखि निहारा॥
यह तीनों हैं अगम अपारा। बिरले साधू उतरै पारा॥
तिन में रहै त्रिभवनी घाटा। ब्रह्मा बिसनु न पाँवै बाटा॥
संकर जोगो सिद्ध अनूपा। उनहूँ न पायौ आपन रूपा॥
निराकार अभि अंतर भाई। ता का भेद कहूँ समझाई॥
सुरति निरति करि खोजै आपू। सुन्न सिखिर चढ़ि खैंचै चाँपू॥
महि ऊपर ब्रहांड की तारी। द्वै पट भीतर सुरति सम्हारी॥
दहिने बाँयें सिला पहारा। जहँ की बाट न कोइ निहारा॥
जहँ सत द्वार बैठ सत यारा। अगम अगाध अजर का द्वारा॥
इमृत पीवें जीव बिचारा। जा से कटै काल की जारा॥
अर्थ—आगे मैं शून्य के विषय में वर्णन करता हूँ। बिना शून्य में प्रवेश के जीव निराश रहता है। अब
अपने शून्य में स्थित श्वास का वर्णन करता हूँ। बिना शून्य के जीव का काल में निवास है॥
मैं शून्य की दिशा को विधिपूर्वक समझाता हूँ। जिन साधुओं ने शून्य को प्राप्त कर लिया है, वे इसे
समझेंगे। बिरला साधु ही शून्यभेद को समझता है। शून्य दीप में स्थित 'सोऽहम्' शब्द ही 'सबद' के नाम
से पुकारा जाता है॥

घट रामायण / ५३
शून्य का स्रोता ध्वनि में लगता है, ध्वनि का स्रोत आकाश में जाता है। आकाश के ऊपर वायु है
और इस प्रकार मूलभवन में निर्गुण वायु है॥
वहाँ आकाश में कमल देखकर कोई-कोई साधु उसे साधता है और उससे काल कष्ट की व्याधि
मिट जाती है। उस कमल के मूल के ऊपर इस पिंड में स्थित 'सत' शब्द को लेकर देखो॥
अष्ट कमल दल में ॐकार का निवास है। उसे काल की क्रीड़ा समझो। इसके बाद षोड्श कमल
का ध्यान लगाओ-योगी जन स्वार्थ तथा परमार्थ में जो भेद करते हैं, वह उसे प्राप्त कर लेता है॥
पवन के योग का ज्ञान योगियों ने गया है। त्रिकुटी के बीच अपनी ध्वनि का श्रवण 'कमल' है। मन
को स्थिर करके यहाँ जो सुरति ध्यान को एकाग्र करता है, वह उस त्रिकुटी के बीच कमल-पवन में ले
आता है॥
हृदय में आए हुए अन्य पवनों को भी वह देखता है, और उस अपूर्व ब्रह्म की ज्योति दृष्टि में आकर
चमकती है। जीव पवन जब सन्तुष्ट (अघाई) हो जाए तो उसे श्वेत पवन से मार कर चला देना चाहिए।
करिया पवन जब बलहीन हो उठता है, तब नाखों पवन को जीव पहचानने लगता है। यही नाखों
पवन मेरा विश्वसनीय भरोसा है, यही श्वेत कमल से डोरी बाँधकर एकतान करता है॥
श्वेत कमल सुकीर्ति से सम्बद्ध है और वही 'संत' मत का द्वार है-संत द्वार एवं पुण्य की एक ही
भाषा है, उसका ज्ञान कोई विरला साधु ही जानता है॥
कदली वन में जिन्होंने 'शब्द' का लाभ पाया है-वही साधु अलक्ष्य मुक्ति रूपी अमृत का पान
करता है। जहाँ केवल (निदाना) निरंजन निवास करते हैं, वहाँ सहस्रार कमल है-जिसे योगी विशेष
योगविधि से जानते हैं॥
द्वादश कमल के आगे अमृत का वास है। गुरुविहीन व्यक्ति यहां प्यास से मरता रहता है। जो
सतगुरु के साहचर्य में होगा, वही, निजत्व को प्राप्त करेगा-और वह मुख में पवित्र अमृत भर-भरकर
खाता रहता है॥
वह अमृत पीकर मुक्ति लोक को जाता है-(यह वह है) जिसे इसी घट के भीतर उसकी खोज की
है। जो अमृत (पाँजी) की खोज में निरन्तर हाथ फैलाए रहता है, वह जीव सहज भी भवसागर तर जाता
है॥
शून्य गगन में झिलमिलाता हुआ, वह झरता रहता है-'गंगा, यमुना' एवं सरस्वती का योगी राही है।
जहाँ गंगा, यमुना एवं सरस्वती है-वही त्रिवेणी का संगम है॥
त्रिकुटी में संगम की त्रिवेणी का घाट है-सत जीव वहाँ निवास करके मुक्ति मार्ग प्राप्त करता है।
बंकनाल से होकर गंगा जाती हैं और शून्य गुफा में यमुना दौड़ती (बहती) रहती हैं॥
सरस्वती श्वेत कमल में आती हैं-योगी अपने मन को विधिपूर्वक वास कराता है। गंगा को ग्रहण
करके उसमें समान करोष यमुना तो दूर से ही मुक्ति की स्थान है॥
तीनों नदियाँ तीन धाराएँ हैं और इन्हें अपने-अपने पिंड में निहार कर देखो। ये तीनों अगम्य और
अपार हैं, विरले साधुजन ही इन नदियों के पार उतरते हैं।
इन तीनों त्रिभवनी घाट है-जहाँ ब्रह्मा तथा विष्णु भी मार्ग नहीं प्राप्त करते। शिव तथा अन्य अनूप
(विलक्षण) योगिजन ने भी अपने स्वरूप को वहाँ समझ नहीं पाए या देख नहीं पाये॥
हे भाई! वह सब निराकार रूप में अभ्यन्तर में वर्तमान है, उनका भेद मैं समझाकर कहता हूँ। सुरति
एवं निरति ज्ञान द्वारा स्वयं खोज करो और शून्य शिखर पर चढ़कर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ॥
वहाँ पृथ्वी के ऊपर ब्रह्मांड की ताली (तारी) है और दो कपाटों (पट) के भीतर सुरति ज्ञान
सम्हाली हुई है-उसके दाहिने बाएँ पत्थर की शिलाएँ तथा पहाड़ हैं-जिसमें स्थित मार्ग कोई नहीं देख
पाता॥
उस अगम्य, अगाध, अमरणधर्मा के शत द्वार पर जहाँ 'सत' में समाविष्ट योगिजन (यारा) बैठे हैं।
वहीं यह बेचारा जीव अमृत पान करता है; जिससे काल का जंजाल (जारा) कट जाता है॥

५४ / घट रामायण
॥ दोहा ॥
जोग बिधी बेनी कही, सुन्न जोग बिधि गाड़।
काल कला परचंड यों, ठग ठग सब को खाड़॥
अर्थ- योग विधि से त्रिवेणी बताई गई है, और वहीं शून्य योग विधि भी गाकर बताई गई है। काल
की प्रचंड कलाएँ इस प्रकार (जो इनके ज्ञान से अपरिचित हैं) ठग-ठग कर सबको खाती रहती हैं॥
॥ चौपाई ॥
अब बेनी संतन की गाऊँ। या से भिन्न भेद दरसाऊँ ॥
संतन की बेनी बिधि न्यारी। तुलसी भाखी देख निहारी ॥
अगम द्वार बेनी असनाना। सो बेनी संतन की जाना ॥
मंजै जोड़ अगम गति जानी। वह प्रयाग सब संत बखानी ॥
अर्थ-अब संतों की त्रिवेणी का वर्णन करता हूँ। पूर्व कथित त्रिवेणी से भिन्न उसके भेद का वर्णन
करता हूँ। संतों की त्रिवेणी प्रक्रिया विलक्षण है। तुलसी साहब कहते हैं कि उनको मैंने भलीभाँति निहार
कर देख लिया है॥
अगम द्वार पर त्रिवेणी का स्नान है, वही सन्तों की त्रिवेणी समझो। जो उस अगमन की गति जानता
हैं, वही वहाँ स्नान करता है, उस प्रयाग का वर्णन सारे सन्तगण करते हैं।
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अपार, जहँ बेनी मंजन कियौ।
सतगुरु पदम प्रयाग, करि अगाध गति जिन कही॥
अर्थ-जहाँ त्रिवेणी में स्नान किया, वह अगम्य तथा अपार हैं-मेरे सद्गुरु ही मेरे पद्म प्रयाग हैं।
जिन्होंने प्रयाग की अगाध गति का वर्णन किया है॥
॥ चौपाई ॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ। भिनि भिनि पंथ मता गति गाऊँ ॥
सरगुन से निरगुन बिधि बानी। भिनि भिनि राह रीति सब छानी ॥
परथम दृग दुरबीन लगावै। मन चित सुरति ताहि पर छावै ॥
देखै ता के बीच मँझारा। जगमग जोति होत उजियारा ॥
निरखा निरगुन पुरुष निहारा। जहवाँ सुनै सब्द झनकारा ॥
सेत दीप जिव पहुँचै पारा। कोटिन काल भये जरि छारा ॥
अर्थ-अब मैं उस मार्ग की रीति का वर्णन करता हूँ-इससे जुड़े भिन्न-भिन्न पंथ और मतों की गति
का गान कर रहा हूँ। सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म की व्याख्या भिन्न है- उनके भिन्न मार्ग हैं तथा रीति
अलग-अलग कही गई हैं॥
सर्वप्रथम अन्तः दृगों में दूरबीन लगाओ और साधक के मन, चित्त एवं स्मृति उस पर छा जाए। तब
उसके मध्य उस ज्योति को देखें-जिसमें ज्योति जगमगा रही है-उजाल हो रहा है॥ २ ॥
वहाँ न्यारा निर्गुण पुरुष को मुक्त साधक ने देखा, और वहाँ अनाहद नाद की झंकार का शब्द
सुने। जीव संतों के द्वीप में उस पर पहुँचता है-जहाँ कोटि-कोटि काल जल कर छार हुए हैं॥ ३ ॥

घट रामायण / ५
॥ दोहा ॥
निरगुन ज्ञान बिचारिया, सुरति राखिये पास।
तुलसीदास जहँ बासकर, जीव न जाइ निरास॥
घट रामायन सार, यह घट माहिं घटाइया।
घट का मथन बिचार, भिन्न भिन्न करि डारिया॥
अर्थ-सुरति को अपने पास रखकर उसके द्वारा निर्गुण ज्ञान को देखें। तुलसी साहब कहते हैं, वहाँ
निवास करो-जहाँ उसके पास कोई जीव न जा सके ॥
यह घट रामायण का सार तत्त्व है और इसे घट रामायण पर घटाया गया है-इस घट के विचार
मंथन ने इसके स्वरूप को भिन्न-भिन्न कर डाला है।
॥ सोरठा ॥
निरगुन निरखि निहारि, ता से गुरुपद भिन्न है।
चौथे पद जद जाइ, पद प्रयाग सतगुरु लखै॥
अर्थ-निर्गुण ब्रह्म को भलीभाँति निरख कर देखो, सद्गुरु उससे भिन्न है यदि चौथे पद पर पहुँचौं
तब सतगुरु का चरण रूपी प्रयाग दिखाई पड़ेगा॥
॥ दोहा॥
तीन लोक के माहिं, निरगुन सरगुन रचि रह्यौ ॥
सतगुरु इनके पार, सो तुलसी घट लखि पर्यौ ॥
अर्थ-तीनों लोकों के बीच में निर्गुण तथा सगुण रचा हुआ है-सतगुरु इनके उस पार हैं और वही
(सतगुरु) घट (पिंड) के भीतर भी दिखाई पड़ता है।
॥ छन्द ॥
घट भीतर जानी आदि बखानी। सुरति समानी सब्द मई॥
देखा निज नैना कहौं मुख बैना। सत्त नाम का मर्म यही ॥ १ ॥
नहिं राम अरु रावन यह गति पावन। अगुन सगुन गुन नाहिं कही॥
कहि अकथ कहानी अगम की बानी। बेद भेद गति नाहिं लई ॥ २ ॥
सुर नर मुनि ज्ञानी उनहुँ न जानी। पँडित भेष सब कहँ कही॥
तुलसी मत भारी यह गति न्यारी। बूझेंगे कोई संत सही ॥ ३ ॥
अर्थ-इस पिंड के भीतर आदि तत्त्व समाया हुआ कहा जाता है, और सुरति ज्ञान उसमें शब्द बनकर
छिपा हुआ है। मैंने उसे अपने नेत्रों से देखा है, मुख-वाणी से कहता हूँ-यही सत्यनाम का मर्म है॥ १॥
यह राम और रावन नहीं है, यह अध्यात्म की पवित्र गति (ज्ञान) है-इसे अगुण, सगुण एवं गुण
रूप नहीं कहा गया है। इसकी कथा अकथ्य है, यह अगम्य वाणी है, वेद ने इस भेद के लक्षणों को
नहीं माना है॥ २ ॥
देवता, मुनि, ज्ञानी मनुष्य आदि ने उसके ज्ञान को नहीं समझा है। नाना भेषधारी पंडितजन भी जो
कहा गया है, उसी को ही कहते हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि यह मत सर्वाधिक भारी (गम्भीर) है,
उसका ज्ञान विलक्षण है, उसे कोई संतजन ही सही-सही समझेंगे ॥ ३ ॥

५६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
आदि अंत का भेद, तुलसी तन भीतर लखा।
सुरति सब्द परकास, ज्यों अकास सर सैल करि ॥
अर्थ-उसके आदि और अन्त के रहस्य को तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने पिंड के भीतर देखा है-
जैसे शून्याकाश सरोवर एवं पर्वत है, ठीक उसी प्रकार सुरति शब्द का प्रकाश है। हे सन्तगण! आप
लोग उसका आनन्द लें।
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भेद कहों अनुसारा। लेकर ज्ञान बान भ्रम जारा ॥
ज्ञान रतन की आँखी होई। जब जम जाल देखिये सोई ॥ १ ॥
सत मत गत अभि अंतर देखै। तत मत अष्ट कँवल में पेखै ॥
सुरति सुहागिन होइ अगमानी। तुरतैं मिली सत्त की बानी ॥ २ ॥
अरध उरध बिच बैठे माधो। तत उनमुनी लगाइ समाधौ ॥
तारी उलटि तत्त में लावै। रहस नाल मधि जाइ समावै ॥
तुलसी मुद्रा जोग समाधा। आगे भाखों भेद अगाधा ॥ ३ ॥
अर्थ-अब मैं भेदों के अनुसार वर्णन करता हूँ। ज्ञान के गण को लेकर समस्त भ्रमों को जला
दिया। ज्ञान आध्यात्मिक रत्न की आँख है। उससे देखना हो तो यम के माया जाल को देखा जा सकता
है ॥
सत्यमत के ज्ञान को अभ्यन्तर में योगिजन देखते हैं- उस मत को पिंड के अन्तर्गत अष्ट कमल में
भी देखते हैं ॥ सुरति रूपी सौभागिंनी आगे-आगे होकर तुरन्त ही सत्य की वाणी से मिल जाती है ॥
अर्ध एवं ऊर्ध्व के बीच ब्रह्म ( माधव ) बैठे हैं और उन्होंने अपनी उन्मनी समाधि भी लगा रखी है ॥
तालु ( तारी ) को उलटकर तत्त्व को मन में लाते हैं और रहस नाल में जाकर समा जाते हैं। तुलसी
साहब कहते हैं कि यही समाधि की योगमुद्रा है-आगे उसके अनन्त भेदों का वर्णन करता हूँ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी तन के माहि, पंथ भेद साधू सही ॥
तत मत तोल अँकाइ, घरघर जाइ जिन जिन कही ॥
अर्थ-साधुगण सही कहते हैं कि शरीर के मध्य में अनेक पंथभेद हैं। घर घर जाकर जिन सन्तों ने
जो-जो बताया है, उस उस तत्त्व का मूल्यांकन वहाँ किया जा सकता है ॥
॥ चौपाई ॥
ये सब काल जाल रस रीती। भौ कृत खान जानि जम प्रीती ॥
गगन के मँडल काल अस्थाना। पाँच भूत विधि जाइ समाना ॥
पाँच पचीस तीन मन मैला। सब जानौ वा को निज खेला ॥
काल जाल जग खाइ बढ़ाया। रिखी मुनी कोइ भेद न पाया ॥
उलटा चलै गगन को धाई। ता से काल रहै मुरझाई ॥
सतगुरु साहिब संत लखावैं। तब घट भीतर परचा पावैं ॥

घट रामायण / ५७
जो जेड़ मूल भेद दरसावै। तब घट में अबिनासी पावै॥
सतसँग भक्ति हृदे बिच आवै। जब सतद्वार अगम लखि पावैं॥
हिरदै सत्त रहे लौ लाई। सब्द द्वार चढ़ि काल गिराई॥
मुक्ति ज्ञान पावै अबिनासी। अगम ज्ञान संग मूल निवासी॥
यह कोइ बिरला साधू पावै। अबिनासी गति अगम लखावै॥
सतगुरु कृपासिंधु कोइ जागै। आवा गवन भर्म भौ भागै॥
कीन्ही अगम नाम स्रुति सैला। चीन्हा अगम निगम तिन खेला॥
अधर सिखर पर तंबू तानै। जहाँ से देखै सकल जहानै॥
ब्रह्मांड द्वार एक है नाका। गहि दुरबीन सुरति से ताका॥
मकर तार पावै वह द्वारा। ता पर सुरति होय असवारा॥
सुरति जात लागै नहिं बारा। चली सुरति भड़ नाम अधारा॥
तब पहुँचै इक्किसवें द्वारा। सुन्न से परे सब्द है न्यारा॥
सुरति सब्द में जाइ समानी। निर सब्दी गति अगम लखानी॥
जहाँ नहिं पहुँचै मुक्ति पसारा। सोइ है आदि पुरुष दरबारा॥
मुनि अचार पावै नहिं कोई। सब भौ भर्म रहा जग सोई॥
अर्थ—आध्यात्मिक रस से रिक्त ये सब काल के जाल हैं। ये संसार की भौतिक लोक रचना की
खानि हैं और इन सबमें यमराज की प्रीति है, ऐसा जानो॥ शून्याकाश मंडल पर काल का स्थान है और
पंचमहाभूत तत्त्व विधिपूर्वक उसमें जाकर समा गए हैं। पंच महाभूत तत्त्व, पच्चीस तन्मात्राएँ तथा तीनों
गुणों का मन यहाँ मैला हो गया है—तुम सब यह उसी निर्गुण ब्रह्म का ही खेल समझो॥ काल ने माया
जाल को खाकर उसे और बढ़ा दिया—कोई ऋषि, मुनि उसके भेद को न समझ सका॥
जब साधक उल्टीरीति (मनोन्मनी द्वारा) शून्याकाश की ओर दौड़ता है फिर वहाँ काल मुरझा जाता
है। साहब सतगुरु जब मार्ग दर्शन कराते हैं तब पिंड के भीतर स्थित संसार का परिचय होता है। जो भी
साधक इस मूल तत्त्व का भेद बताता है तभी इस घट के अन्तर्गत कोई संत अविनाशी तत्त्व (निरंजन-
ब्रह्म) का परिचय प्राप्त करता है। जब अगम्य 'सत्' द्वार दिखाई पड़ेगा, तभी सत्संगति तथा भक्ति
हृदय के बीच आएगी॥
यदि हृदय में सत्य की लौ लगाए रहोगे तो शब्द के द्वार से चढ़कर काल को गिरा दोगे (नष्ट कर
दोगे)। अगम्य ज्ञान के साथ का मूल निवासी अविनाशी मुक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। इसे कोई विरला
साधु ही प्राप्त करता है। सतगुरु की कृपा-सिन्धु से ही कोई जागृति प्राप्त करता है, वह शून्याकाश में
आता है, तब उसका समस्त अज्ञानजनित संसारिक भ्रम भाग जाता है।
नामरूपी सुरति पर्वत को उसने अगम्य बना दिया है किन्तु जिन्होंने उस अगम्य। सुरति ज्ञान (तत्त्व)
तथा शास्त्र के ज्ञान तत्त्व को पहचान लिया है, वहाँ वही क्रीड़ा करता है।
अधर-शिखर पर वह तम्बू तानता है और वहाँ से वह सम्पूर्ण जगत को देखता रहता है। ब्रह्मांड द्वार
पर एक नाका है- (केन्द्र स्थान) वहाँ से वह सुरति रूपी दूरबीन से ताकता है। उस द्वार पर मकर तार
हैं उस पर सुरति सवार होती है। सुरति के चढ़कर जाने में देर नहीं लगती। यह सुरति वहाँ जाकर नाम
का आधार बन जाती है। तब इक्कीसवें द्वार पर पहुँचता है, जहाँ शून्य के अनाहत नाद से परे एक
विलक्षण शब्द है। जो सुरति ज्ञान में जाकर समा जाता है, उसे शब्दहीन सृष्टि की अगम्यगति दिखाई

५८ / घट रामायण
पड़ती हैं। मुक्ति का फैलाव जहाँ नहीं पहुँच पाता, वही आदि पुरुष का दरबार है—कोई भी मुनि इस
दरबार का आचरण नहीं जान पाता और इस संसार का सम्पूर्ण मर्म उसी में खोया (विलीन) रहता है॥
भँवर गुफा मारग चढ़ि देखा। जहँ जिव सत्त सुरत का लेखा॥
सुन्न सुन्न सब करत बखाना। सुन्न भेद कोइ बिरले जाना॥
कहीं बिस्तार सुन्न की जोई। ज्यों गूलर फल कीट समोई॥
फल जेते तेते ब्रह्मांडा। दीप दीप फल फल नौ खंडा॥
सुन्न अंड की करी बखाना। कहै तुलसी कोइ साधू जाना॥
अर्थ—भ्रमर गुफा के मार्ग पर चढ़कर देखा—जहाँ भी सत्य है और केवल वहाँ सुरति का ही तत्त्व
(लेख) है। शून्य-शून्य सभी कहते हैं किन्तु शून्य का भेद कोई विरले ही जानते हैं।। अब विस्तारपूर्वक
शून्य जो है उसका अर्थात् शून्य का वर्णन करता हूँ। मनुष्य शून्य में उसी प्रकार सन्निहित है, जैसे गूलर
फल में कीट। गूलर में जितने फल हैं, उतने ही ब्रह्मांड हैं फल ही सारे द्वीप हैं और वही द्वीपों के
नवखंड हैं। उसी क्रम में मैं शून्य में स्थित अंड (पिंडों) का वर्णन करता हूँ तुलसी साहब कहते हैं, इसे
कोई साधु-जन ही जानता है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी सुन्न निवास, सब्द बास जिन घर किया।
जिमि गूलर फल तासु, जग भिनि भिनि जेहि लखि परा॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि शब्द मूल के निवास को जिसने अपना घर बना लिया है, उसी का
निवास शून्य में है—जैसे गूलर के फल जिन्हें-भिन-भिन जैसे भी लख पड़ा हो॥
॥ छन्द ॥
भये सुन्न निवासी सब सुख रासी। सुरति बिलासी सब्द मई॥
अनहद हद पारा अगम अपारा। अमी सिंधु स्रुति जाड़ लई॥ १॥
देखा उँजियारा घट घट प्यारा। निरखि निहारा पार कही॥
तुलसी तुल जावै दस दिस पावै। सिंध फोड़ि असमान गई॥ २॥
अर्थ—शून्य निवासी साधु सभी सुखों की राशि बन जाते हैं, वे सुरति ज्ञान के विलासी तथा अनाहत
शब्द मय हैं। इस अनाहत नाद के पार अपार और अगम्य अमृत सिंधु है—जिसे सुरति में जाकर प्राप्त
करता है॥ १॥
चारों ओर घट-घट में प्यारा उजाला देखा उसे देखकर, दूर कहीं उसके पार देखा। तुलसी साहब
कहते हैं कि उसके पास (तुल) जाकर दसों दिशाओं को प्राप्त करता है—लगता है, यह मनोन्मनी सिन्धु
को फाड़कर आकाश में पहुँच गई है॥ २॥
॥ दोहा ॥
सुन्न महल अजपा जपै, समुँद सिखरि के पार।
टूटी गगन गिरा भई, सत्त सब्द झनकार॥
त्रिकुटी टाटी टूटि कै, सुन्न अंड भिनि बास।
घट भीतर परिचय भई, देखा अजर निवास॥

घट रामायण / ५९
अर्थ—समुद्र के शिखर के पार शून्याकाश में साधु का महल है और साधु जन यहां अजपाजाप
करते रहते हैं। यह शून्याकाश भी जब टूट जाता है, साधक की वाणी 'सत्य' शब्द की झंकार
(झंकृति) बन जाती है।
इस सिद्धावस्था में त्रिकुटी के टट्टर टूट कर शून्य पिंडाकाश में विचित्र सुगंधि से सुवासित
(भिनि) हो जाते हैं। इस घट के भीतर उस निरंकार से परिचय हो जाता है—इस प्रकार मैंने उस अजिर
ब्रह्म का निवास देखा है॥
॥ कँवल भेद॥ चौपाई॥
घट में सोधि कँवल जिन गाई। लखै कँवल बिरला कोइ भाई॥
अंकुर उतपति कँवल मँझारा। सत्त नाम पद तिनके पारा॥
ऊँच नीच परबत बिच बाटा। काल जहाँ रोकै नहिं घाटा॥
ता के दहिने मारग माई। दामिनि पाँच छेकि नियराई॥
देवै दानी दान चुकाही। पावै जीव अगम की राही॥
दानी कहै जीव सुनि बाता। बिना दान करिहौं मैं घाता॥
जब जिव कहै समझ सुन भाई। करौ घात केहि कारन जाई॥
अर्थ—इसी पिंड में अन्वेषण करके जिन्होंने कमल का वर्णन किया है, (वैसा वर्णन) कोई बिरला
बंधु ही कर सकता है। 'सत्तनाम' जिनके वश (पारा) में है, वे ही जानते हैं कि कमल के मध्य में
अंकुर की उत्पत्ति होती है। ऐसे जन, ऊँचे-नीचे पर्वत के बीच अपना सिद्धि मार्ग पा जाते हैं और वहाँ
काल घाट नहीं रोकता॥ हे सखी! उसी के दाहिने मूल मार्ग है, और वहाँ समीप आते ही पाँच बिजलियाँ
रास्ता रोक लेती हैं। यहाँ दानी साधु सर्वस्व दान चुकाकर, (वह जीव) अगम्य की राह प्राप्त करता है।
दानी कहता है कि हे जीव! मेरी बात तो सुनो-मैं बिना दान के घात करूँगा। तब जीव कहता है कि हे
भाई सुनो, किस कारण वहाँ जाकर घात करोगे?
॥ भेद पिंड और ब्रह्माण्ड का॥
अंतर गुफा तहाँ चलि जाऊँ। जहाँ साहिब के दरसन पाऊँ॥
पाँचौ नाम जीव जब भाखा। छठवाँ नाम गुप्त करि राखा॥
पाँचौ नाम काल के जानौ। तब दानी मन संका आनौ॥
निरगुन निराकार निरबानी। धर्मराय यों पाँच बखानी॥
जीव नाम निज कहै बिचारी। जानि बूझि दानी झख मारी॥
जाव जीव यह राह तुम्हारी। हम नहिं रोकैं बात बिचारी॥
पोचं पाँच हमहूँ सुनि पाई। हम नहिं निकट तुम्हारे आई॥
पोचं चोर रहे अलगाई। होइ निरभै जिव आगे जाई॥
आगे सात सुमेर उँचाई। नौ नाटक तापर रहैं भाई॥
नौ नाटक पूछन चले आगे। कहौ जीव केहि मारग लागे॥
हम यहि घाट बाट रखवारी। यहाँ न अदली चलै तुम्हारी॥
कहै जीव दृग दानी भाई। हम चलि जाइ नाम चित लाई॥

६० / घट रामायण
दानी दान चुकावौ आई। जब यहि बाट निभन तुम पाई॥
केहि कर अंस कहाँ तुम जाई। बात अपनी कहौ बुझाई॥
कहै जीव सतलोक निवासा। मैं चल जावँ पुरुष के पासा॥
दानी कहै दूरि है भाई। अगम पथ कैसे निभ जाई॥
कौन नाम मारग को जाई। कौन नाम से उबरै आई॥
इतना भेद कहौ समझावा। बाट जीव जब घर की पावा॥
अर्थ-जहाँ अन्र्तगुफा है, वहाँ चला जाकर साहिब (निरंकार ब्रह्म) का दर्शन प्राप्त करूँगा। जब
जीव ने पाँचों नाम बताना शुरू किया तब अन्त में उसने छठवाँ नाम गुप्त कर रखा। ये पाँचों नाम काल के
ही समझो। इसे सुनकर उस धर्मनिष्ठ (यानी - दान देने वाले) के मन में शंका हुई। धर्मराज यम ने
केवल निर्गुण, निराकार एवं वर्ण विहीन आदि पाँच की चर्चा की है, जीव ने अपने उस अलेख नाम का
वर्णन नहीं किया-और तब वह धर्मनिष्ठ जानबूझकर मुखमार कर बोला-हे जीव! जाओ, यह वह
तुम्हारी राह है, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो गए और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा।
आगे सात पर्वतों का ऊँचा शिखर हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियाँ हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव
पूछने चला-तो उत्तर मिला! हे जीव! जाओ, यह तुम्हारी राह हैं, बिना समझे-बूझे हम तुम्हारी राह नहीं
रोकेंगे।
पाँचों चोर (पंच महाभूत तत्त्व) उस जीव से पृथक् हो और निर्भय होकर जीव आगे बढ़ा। आगे
सात पर्वतों की ऊँची शिखाए हैं, हे भाई! उस पर नौ पगडंडियां हैं-नौ पगडंडियों को वह जीव पूछने
चला-तो उत्तर मिला! हे जीव-तुम किस मार्ग से लगोगे या चलोगे। मैं इन घाटों-बाटों का रखवारा हूँ-
यहाँ पर तुम्हारी अदला-बदली नहीं चलेगी।
जीव कहने लगा, हे दृष्टि प्रदान करने वाले भाई! हम तो चित्त में नाम लेकर चलते रहे हैं। धर्मनिष्ठ
(धर्मराज यमराज) ने कहा हे भाई दानी, जब तुम आकर यहाँ दान चुकाओ, तभी इस मार्ग से तुम्हारा
निस्तार होगा। तुम किसके अंश हो, तुम कहाँ जा रहे हो, अपनी बात तुम समझा कर कहो।
जीव ने बताया कि उसका निवास 'सत् लोक' में है और मैं उस निरंकार पुरुष के पास चलकर
जाना चाहता हूँ। धर्मनिष्ठ बोला, वह तो बहुत दूर है, उस तक पहुँचने का मार्ग अगम्य है, तुम्हारा
पहुँचना वहाँ कैसे हो सकेगा? उसका नाम क्या है। उसका मार्ग क्या है, जब वह इन सारे भेदों को बता
सका, तभी उस जीव को अपने घर का मार्ग प्राप्त किया॥
॥ जीव वचन। चौपाई ॥
दानी सुनु बिधि बात हमारी। हम चलि जाइँ पुरुष दरबारी॥
सुरति निरति लै लोक सिधाऊँ। आदि नाम लै काल गिराऊँ॥
सत्त नाम लै जीव उबारी। अस चल जाऊँ पुरुष दरबारी॥
इतना बचन कही दिल सूना। बहुत त्रास लै मन में गूना॥
तुम मारग जावो जिव अपने। हम तुमको रोकें नहिं सपने॥
चले जीव आगे पग दीन्हा। करिया सरवर मारग लीन्हा॥
तहँ तौ पंछी एक रहाई। निस बासर वो बैठ ऊँचाई॥
तेहि मारग जिव चला अघाई। चोंचि पसार खान को चाही॥

घट रामायण / ६१
मुख पंछी बहु भाँति पसारा। जिवरा तो को करौं अहारा॥
अपना नाम कहौ टक plug / टक plug... टक plug -> टक plug is टक plug? No: अपना नाम कहौ टक plug... let's read properly: अपना नाम कहौ टक plug -> अपना नाम कहौ टक plug... "टकसारा" । तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥ -> अपना नाम कहौ टक plug ... it clearly says: अपना नाम कहौ टकसारा। तब चलि जैहौ वहि दरबारा॥
नहिं हम से तुम बचने पैहौ। तो को जिवरा धर धर खैहौं।
जिवरा सुरति नाम से लाया। करिया मारि पाँव तर नाया॥
जीव चला झरने के पारा। दस दिस देखि परा उँचियारा॥
अमी द्वार इमरत कर बासा। मिटा जीव का संसय सासा॥
अधर जीव इमरत को पीवै। सब्द बुंद इमरत जुग जी वै॥
बस्तु पाइ साधै कोइ साधू। चाखै इमरत सुरति समाधू॥
चटि चटि सूरति चढ़ी अटारी। इमरत अजर नाम की लारी॥
साहिब अजर सब्द घर पावै। आवागवन बहुरि नहिं आवै॥
डोरी पुरुष अकास अकेला। किया सुरति घट भीतर मेला॥
इमरत कँवल भरा भँडारा। पी वै जिव सो उतरै पारा॥
नाम अगाध कहौं समझाई। सूरति सब्द अगाध सुनाई॥
जो जिव चाहै अगम निवासा। सूरति करै सब्द में बासा॥
जिन जिन सूरति सब्द सँवारा। सो चलि गये अगम पद पारा॥
पावै भेद बस्तु लखि पावै। सो सतलोक सोक नसि जावै॥
सुरति सब्द में भई अधीना। ताकर भेद काल नहिं चीन्हा॥
सत्त नाम से काल नसाना। कोइ साधू काया मथि जाना॥
काया दरपन सुरति समानी। सो साधू साहिब सम जानी॥
अर्थ-हे धर्मनिष्ठ! मेरी बात को ठीक से समझो-हम उस दरबारी पुरुष (निरंजन) के पास जा रहे
हैं। सुरति-निरति दोनों को लेकर मैं उनके लोक में प्रवेश करूँगा और उस अनादि ब्रह्म का नाम लेकर
काल को नष्ट कर दूँगा। उस 'सत्यपुरुष' का नाम लेकर जीव ने स्वयं काल से उबारा और कहा कि
इस प्रकार मैं निरंजन के दरबार में चला जा रहा हूँ। उसने इतनी बातें शून्य मन से कही तब धर्मनिष्ठ
(काल) ने अत्यन्त संयस्त होकर मन में विचार किया और बोला-हे जीव! तुम अपने मार्ग पर जाओ,
हम तुम्हें अब स्वप्न में भी नहीं रोकेंगे।
जीव आगे चलकर पैर बढ़ाया, उसे मार्ग में एक काला सरोवर मिला। वहाँ एक पक्षी रहता था
और रात दिन वह ऊँचाई पर बैठा रहता था। उस मार्ग पर सन्तुष्ट होकर जीव चला, तब वह चोंच
फैलाकर जीव को खाना चाहा। पक्षी ने अपने मुख को अनेक भाँति से फैलाया कि मैं इस जीव का
आहार करूँगा। उसने पूछा कि अपना नाम साफ-साफ (टकसारा) बताओ, तभी उस निरंजन के
दरबार में जा पावोगे। हे जीव! तुम हमसे नहीं बचने पावोगे और मैं तुम्हें पकड़-पकड़ कर खाऊँगा।
जीव ने नाम के रूप में सुरति ध्यान किया और उसने करिया को मार कर पावों के नीचे गिरा दिया।
तब वह जीव उस झरने के उस पार गया तो उसे दसों दिशाओं में उजाला दिखाई पड़ा। द्वार अमृत
का था, वहाँ सम्पूर्णतः अमृत का निवास था और तब जीवन का समस्त संशय भाव समाप्त हो उठा।
जीव अधर-भाव से अमृत पान करने लगा-अमृतमय शब्द बिन्दुओं में वह जीने लगा। वस्तु पाकर कोई
साधुजन क्यों नहीं उसे साधेगा और अपनी सुरति समाधि में अमृत चखेगा।

६२ / घट रामायण
चट-चट करता हुआ तेजी से वह जीव सुरति ज्ञान की अटारी पर चढ़ गया-नाम रूप अजिर के
अमृत की वासना उसके हृदय में बस गई है। उस घर में निरंजन ब्रह्म का शब्द प्राप्त कर रहा है-अब वह
फिर 'आवागमन' के बंधन में नहीं आएगा।
वह शून्याकाश में अकेला उस निरंजन ब्रह्म से सम्पर्क साध लिया है और सुरति द्वारा इसी घट
(शरीर) में ही उससे सम्पर्क साध रखा है। उसका भंडार अमृत कमल से भर उठा है-जीव जो उसे
पीता है, वह सर्वथा उस पार उतर जाता है (इस भवलोक से मुक्ति हो जाती है)।
मैं उस अगाध नाम से सम्बोधित ब्रह्म के विषय में बताता हूँ। सुरति ध्यान में उस अगाध का ही
शब्द सुनाई पड़ता है। यदि जीव उस अगम्य ब्रह्म में निवास करना चाहता है तो वह सुरति साधना करके
'शब्द' में निवास करे। जिन-जिन सन्तों ने सुरति समाधि से वह शब्द सँवारा है, वे अगम्य पथ के पार
चले गए हैं।
वस्तु भेद को समझकर जो मूल तत्त्व को जान जाता है-वह सत् लोक प्राप्त करता है और उसके
समस्त शोक नष्ट हो उठते हैं। सुरति शब्द साधना के जो अधीन हो जाता है, उसके भेद के विषय में
काल भी अपरिचित रहता है। सत्य नाम से काल भी नष्ट हो जाता है, अपनी काया का मंथन करके
कोई-कोई साधु इसे समझते हैं। शरीर दर्पण हैं, इस दर्पण में 'सुरति' समाई हुई है, यदि इस प्रकार का
कोई साधु है तो उसे ब्रह्म के समान समझो॥
॥ साखी ॥
कँवला काल निरंजना, तिन बस कीन्हा घाट।
भिन्न भिन्न दरसाइ कै, सतगुरु दीन्ही बाट॥
अर्थ-कमल। काल एवं निरंजन इनके वश में सारे प्रस्थान मार्ग हैं, इन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में
दिखाकर सतगुरु ने सबके लिए रास्ता खोल दिया है।
॥ दोहा ॥
जीव चला घर आपने, काल छेकि जम जार॥
नाम सुरति जब लख पग, भागे ठग बटमार॥
अर्थ-जीव अपने घर की ओर चला और काल ने यम के जाल से घेरा। जब सबको सुरति समाधि
का सोऽहम् शब्द दिख पड़ा तो सभी ठग और बटमार (काल, यम आदि) भाग चले॥
॥ भेद पिंड और ब्रह्मांड का ॥
सुरति सब्द मिल लोक में, चढ़ि सतनाम जहाज।
तुलसीदास पिया मिले, कीन्हा सेज बिलास॥
अर्थ-इस लोक में सुरति से मिलकर सतनाम के जहाज पर चढ़कर तुलसीदास साहब कहते हैं, मैं
अपने प्रियतम से मिला और शैया विहार किया॥
॥ छन्द ॥
तुलसी लख जागे काल से भागे। लख दृग दानी दूर किये॥
इमरत रस चाखा सौ सब भाखा। जीव अघाइ अनाद पिये॥१॥
सतनामहि जाना पद पहिचाना। सुरति सब्द जो जाइ लिये॥
जिन जो स्रुति सैना देखा नैना। अगम अपने पौ पाइ पिये॥२॥
हिये खुल गइ आँखी सब बिधि भारवो। काल बरन बिधि बूझि कही॥३॥

घट रामायण / ६३
अर्थ--तुलसी साहब कहते हैं कि प्रियतम के साथ मुझे देखकर सभी सभी सोते जागकर काल की
भाँति भगे और (प्रियतम के साथ देखकर) हमसे धर्मराज (दानी) ने अपनी आँखें दूर कर ली। सारा
संसार कहता है कि मैंने अमृत रस चख लिया है और इस जीव ने उसे आनादि तत्त्व के साथ तृप्त होकर
अमृत का पान किया॥ १॥
उस सत्य नाम को मैं जान गया, उसके चरणों को मैं पहचान गया और वहाँ जाकर उस सूरति
सबद को ग्रहण कर लिया। वह जो समस्त वैदिक तत्त्वों का समूह था, उसे मैंने नेत्रों से देखा और उस
अगम तत्त्व को अपने में (अपने पी) पाकर तृप्तभाव से पिया। हृदय की आँख खुल गई, उसका हर
प्रकार से वर्णन किया और इस प्रकार मैंने काल के नाना रूपों (बरन विधि) को समझ कर
बताया॥ २-३॥
॥ सोरठा ॥
बानी काल बिचार, तीनि बरन तोली सबै।
कहौं बरन निरधार, सो कोइ साधू परखिहै॥
अर्थ-वाणी और काल का विचार मैंने तीन प्रकार से तौला है (समझा है)। इसके रूपभेद का
निर्धारण करके मैं बता रहा हूँ। इसको कोई साधू ही परखेगा (पुनः मूल्यांकन करेगा)।
॥ चौपाई ॥
काल बैन बिधि भाखि सुनाई। ता की अब मैं करों लखाई॥
बानी तीनि तीनि बिधि जानी। कँवल मध्य में कहीं बखानी॥
कौन बरन वे कँवल रहाई। जाकी विधि बिधि कहों बुझाई॥
कोने बरन निरंजन देवा। तिन का बरन बताओं भेवा॥
करिया बरन काल को भाई। सेत रक्त वे कँवल रहाई॥
सुन्नि के बरन निरंजन देवा। तिन कर कहों निरख सब भेवा॥
अब बानी का कहौं बिचारा। बूझै साध करै निरवारा॥
बानी कौन निरंजन होई। बानी कौन काल की सोई॥
बानी कौन कँवल की लीन्हा। सो सब निरखि बताओं चीन्हा॥
बानी अधर निरंजन सोई। बानी क्रोध काल की होई॥
बानी मेल कँवल कर लीन्हा। येहि बिधि से तीनो हम चीन्हा॥
अर्थ-काल की वाणी का वर्णन करके सुनाता हूँ। अब मैं उसके स्वरूप को बताता हूँ। वाणी को
तीन प्रकार की समझो। कमल मध्य में स्थित इस वाणी का मैं वर्णन करता हूँ॥
किस प्रकार कमल के मध्य में यह वाणी रहती है, मैं इस विधि के अनुसार उसका वर्णन करता
हूँ। निरंजन देव किस वर्ण के हैं, हे भाई उनका वर्णन करो॥
काल का भाई श्याम वर्ण का है, वे रात में कमल में प्रवेश करके लाल वर्ण के हो जाते हैं।
निरंजन शून्य वर्ण के हैं। मैं उनको पूरी तरह से देखकर ही उनके भेदों को बताता हूँ॥
अब मैं वाणी का निराकरण करता हूँ। कोई साधु ही इसे समझकर इससे सम्बद्ध सत्य का
निराकरण कर सकता है। इसमें निरंजन की वाणी क्या है? कौन काल की वाणी है कमल किस वाणी
को ग्रहण करता है-इन सबको भलीभाँति पहचानकर बताओ॥
जो वाणी अंतरात्मा (अधर) की हैं, वह निरंजन भी वाणी है। क्रोध की वाणी है। कमल से मेल-
मिलाप कर रही-एक वह भी वाणी है। इस प्रकार से हमने तीनों वाणियों को पहचान लिया है॥

६४ / घट रामायण
॥ साखी ॥
निरगुन सरगुन लखि परै, काया काल बिचार।
आदि पुरुष सत लोक में, सो घर अधर हमार ॥ १ ॥
घट घट में सब लखि परा, भिनि भिनि अगम पसार।
तन बिच सोला द्वार की, तुलसी कहत पुकार ॥ २ ॥
अर्थ-शरीर एवं काल विचार के क्षण निर्गुण व सगुण दोनों दिखाई पड़े। आदि पुरुष ( ब्रह्म ) सत्य
लोक में है, और वही हमारी अन्तरात्मा का घर है।
इस संसार के घट-घट में भिन्न-भिन्न अगम्य तत्त्वों का प्रसार दिखाई पड़ा। इस प्रकार, इस शरीर
में सोलह द्वारों की चर्चा तुलसी साहब पुकार-पुकार कर करते हैं।
॥ चौपाई ॥
सोला द्वार भेद कहौं भाखी। जा की बरन बिधी कहूँ साखी ॥
प्रथम द्वार का भेद बताऊँ। जा की बिधि बरतंत सुनाऊँ ॥
प्रथम मूल दीप गति गाऊँ। जा की नाम ठाम समझाऊँ ॥
सतगुरु गुप्त भेद लखवावै। सोला द्वार भेद जब पावै ॥
अर्थ-सोलह द्वार भेदों का वर्णन करता हूँ-मैं इनकी वर्णन विधि और उनकी साक्षी बताता हूँ। मैं
प्रथम द्वार के भेद का वर्णन करता हूँ-मैं उसकी विधि और वृत्तान्त सुनाता हूँ॥ प्रथम भेद की मूल
गति का गान करता हूँ-मैं उसके नाम तथा स्थान का भी वर्णन करता हूँ। सोलह द्वारों के भेद का ज्ञान
जो सन्त प्राप्त कर लेता है तभी वह सद्गुरु के गुप्त रहस्यों को देखता है।
॥ द्वार भेद ॥
परथम सहस कँवल में द्वारा। दूसर अकह कँवल के पारा॥
तीसर द्वार गगन के नीचे। चौथा द्वार अधर के बीचे॥
जहँवाँ बैठा कंदर काला। जिनहिं बिछाया जग जम जाला॥
पंचम द्वार दसौ दिस बाहिर। मन सब बैठा जग में जाहिर॥
भँवर गुफा बिच छठवाँ द्वारा। कँवल भँवर तहँ बसै नियारा॥
सतवाँ द्वार दसों के दहिना। पाँचो भूत सूत बिन सैना॥
अठवाँ मूल चक्र के माहीं। बैठा मूल मोह रस राही॥
नौवाँ द्वार ताल में होई। स्वाँसा पवन चलावै सोई॥
ये नौ द्वार काल के जाना। दसवाँ द्वारा अधर बखाना॥
द्वारा चारि गुप्त गुहराई। जानै साध संत जिन पाई॥
ऐसे चौधा भेद पुकारा। पन्द्रा द्वार सत्त के पारा॥
सोला खिरकी अगम निसानी। जा में सत साहिब की बानी॥
ता के परे द्वार नहिं देखा। जहँ इक साहिब नाम न भेसा॥
संत सैल वह अगम निसानी। बसै संत वोहि धाम अनामी॥

घट रामायण / ६५
काया मद्धे काल बिचारो। निरंकार से पुरुष नियारो॥
वा का भेद साध कोई पावै। अगम निगम सोइ संध लखावै॥
जोगी रमक राह नहिं जाना। जोग ज्ञान मत भेद भुलाना॥
प्रानायाम जोग कोर कीन्हा। लोई कोई कवल उलट कर लीन्हा॥
कोग अष्टांग जोग जस कीन्हा। परम जोग रस रहे अधीना॥
अर्थ-प्रथम भेद सहस्र कमल के द्वार घर है, दूसरा द्वार अकथ्य कमल के उस पार है, तीसरा द्वारा
शून्य के नीचे है और चौथा द्वारा अन्तरात्मा के बीच में है। जिस गुफा में काल बैठा है और जिसने समस्त
संसार के लिए माया जाल फैला रखा है पाँचवाँ द्वार उसकी दशों दिशाओं के बाहर है संसार में यह
स्पष्ट है कि वहाँ 'मन' रस लेता हुआ बैठा है।
भँवर गुफा के बीच छठाँ द्वार है—जहाँ भ्रमर कमल पर स्वच्छन्द (नियारा) बैठा रहता है। सातवाँ
द्वार दसों द्वार के दाहिने है—जहाँ पाचों महाभूततत्त्व बिना बन्धन (सूत) और बिना सेना (नियंत्रण) के
हैं। आठवाँ द्वार मूल के मध्य है—जहाँ मूलतत्त्व मुग्धभाव से रसास्वादन करता है। नौवाँ द्वार तालु में है
और वही श्वास वायु को चला रहा है॥ इन नवों द्वारों को काल का द्वार समझो और दसवाँ काल
अन्तरात्मा में है॥ चार द्वार गुप्त कहे गए हैं—जिन साधु सन्तों ने प्राप्त कर लिया है, उन्हें वही जानते हैं।
इस प्रकार, चौदह द्वार पुकारे गए हैं, पन्द्रहवाँ द्वार सत्य के उस पार है।
सोलहवें द्वार की खिड़की अगम की निशानी है—जिसमें निरन्तर सत साहब (निराकार ब्रह्म) की
वाणी सुनाई पड़ती है॥
इस सोलहवें द्वार के पार न कोई द्वार है और न कोई देश है वहाँ साहेब (परमात्मा) एक हैं, न
उनका कोई नाम है और न कोई वेष। वह सन्तों का पर्वत है और सन्त जन उस अनाम धाम में निवास
करते हैं।
काया के मध्य में काल का विचार करो और समझो कि वह पुरुष निरंकार और बिलक्षण है।
इसका रहस्य कोई ही साधु प्राप्त कर सकते हैं। वही अगम तथा निगम दोनों ज्ञानरूपों का सिंधु है।
उसमें रमता हुआ जोगी भी उसके मार्ग को नहीं जानता—वह तो योगमत के ज्ञान के भेदों में खोया रहता
है। कोई प्राणायाम योग करता है, कोई लोग (लोइ) कमल को योगसाधना द्वारा उलट लेते हैं। कोई
अष्टांग योग करते रहते हैं फिर भी वे उस परम योग रस के अधीन रहते हैं। ये सारे योगी योग कराते हैं
और वह निष्ठुर कठिन काल सबके घर आता है अर्थात् सभी काल कवलित होते हैं।
॥ गुफा ( 1 ) ॥
यह सब जोगी जोग कराया। कठिन काल सब घर घर खाया॥
जोगी राह रीत दरसाऊँ। भिनि भिनि जोग बिधी बिधि गाऊँ॥
जोग सब्द बिधि कहौं बखानी। बूझै जोग कीन्ह सोइ जानी॥
अर्थ-मैं अब योगियों के मार्ग एवं उनकी पद्धति का वर्णन करता हूँ। भिन्न-भिन्न रूपों द्वारा मैं
उनकी विधियों के अनुसार उनका गान करता हूँ। योग शब्द विधियों का मैं वर्णन करता हूँ—जिसने
योग किया है, वही उसे समझ सकेगा॥
॥ कहेरा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
ज्ञान जोग मिसिरित मन मैला, चढ़ि अकास नित खेला हो॥१॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ, बिधि भिनि भिनि गति गाऊँ हो।

६६ / घट रामायण
बस तन मन रस निरमल होई, इंद्री इस्क खुद खोई हो ॥ २ ॥
ता पर तीन तलब पचबीसा, खड़ग ज्ञान दल पीसा हो।
उनके निकट नेक नहिं जावै, थिर होइ पवन चढ़ावै हो ॥ ३ ॥
दीदा फूल झूल दिन राती, त्रिकुटी चढ़ि येहि भाँती हो।
बिधि बायें पिंगला गति केरी, इँगला दहिने फेरी हो ॥ ४ ॥
चंद सूर दम दम बस आवा, सुखमनि चटक चढ़ावा हो।
बंक नाल पल पल नल खोली, अति अजपा नहिं बोली हो ॥ ५ ॥
ओहँग तत सोहँग मत जानी, पवन सब्द सँध आनी हो।
थिर मन मेरदंड चढ़ तारी, झलक जोति उँझियारी हो ॥ ६ ॥
तत अकास आत्म बिधिजानी, लख चर अचर बखानी हो।
अंडा तत्त द्वार दरसानी, जोग ज्ञान गति बानी हो ॥ ७ ॥
यह सब काल खेल भरमाये, सास्तर बेद भुलाये हो।
यह सब जोगि जोग बस कीन्हा, काल राह रस पीना हो ॥ ८ ॥
वे दयाल बिधि भेद अपारा, संत चीन्ह भये न्यारा हो।
जोग ज्ञान पंडित सुनि मानै, सास्तर पढ़त पुरानै हो ॥ ९ ॥
जैसे नीर घड़ा जल माईं, रबि प्रतिबिंब दिखाई हो।
जब लग घड़ा अकास समाना, तब लग तत दरसाना हो ॥ १० ॥
फूटा घड़ा अकास नसाना, रबि सूरज बिनसाना हो।
तत भयौ नास भास भइ जोती, अंध कूप हिये होती हो ॥ ११ ॥
अंध अकास भास नहिं पावै, भूल भटक मन आवै हो।
घट बिनसै तन देंही पावै, पुनि भव माहिं समावै हो ॥ १२ ॥
ज्ञान जोग ब्रत संजम कीन्हा, तीनि ज्ञान गति चीन्हा हो।
अंत काल जम जाल फँसाना, बहु बिधि काल चबाना हो ॥ १३ ॥
तुलसी जोग जुगति कहि झारी, संत अगम गति न्यारी हो।
संत राह रस अगम ठिकाना, जोगी भेद न जाना हो ॥ १४ ॥
॥ ककहरा ॥
अर्थ—योगी रमण (रमक) राह से शरीर को मुक्त (तार) कर देता है और वह चार प्रकार के
योगों को करता रहता है। ज्ञान योग में मिश्रित मन निर्मल नहीं (मैला) रहता और वह शून्याकाश में
चढ़कर खेलता है। अब मैं उसकी स्थिति और पद्धति (राहरीति) बतलाऊँगा (दरसाऊँ) और उसकी
भिन्न-भिन्न गतियों का गान करूँगा। शरीर मन के वश में और उसका आस्वाद (रस) निर्मल हो उठता
है और इन्द्रियों की संसक्ति (इश्क) को स्वयं खा जाता है॥ १-२॥
उसके ऊपर तीनों-नशे (तम, रज एवं सत्त्व) एवं पच्चीसों (तन्मात्राओं) को यह ज्ञान की तलवार
पीस डालती है। ये तीन गुण एवं पच्चीस तन्मात्राएँ उनके निकट नहीं जा पातीं और वह योगी (व्यक्ति)
स्थिर चित्त से वायु को मन में चढ़ाता है॥ ३॥

घट रामायण / ६७
चित्त [दीदा (र)] रूपी पुष्प रात-दिन तिरकुटी पर चढ़कर इस प्रकार झूलता रहता है। पिंगला
की गति बाएँ एवं इंगला (इड़ा) की गति दाहिने फेर लेता है॥४॥
सूर्य तथा चन्द्र क्षण-क्षण वश में हो जाते हैं और सुषुम्ना (सुखमनि) तीव्रगति से चढ़ा लेते हैं।
बंकनाल की नल पल-पल खुली रहती है और अजपा जाप बोलना नहीं पड़ता, स्वयं होने लगता है।
पवन सिंधु में आकर तत्ऽहम् की गति सोऽहम्' की हो जाती है, तालु (तारी) मेरुदण्ड पर चढ़ जाती
है, मन स्थिर हो उठता है और वह दिव्य प्रकाश झलकने लगता है॥५, ६॥
उस आकाश को आत्म योग विधि से समझता हूँ और वहाँ-चर-अचर दोनों तत्त्वों को देखकर
उनका वर्णन करता हूँ। यह पिंड (अंडा) उस तत्त्व द्वार पर दिखाई पड़ने लगता है और वाणी, ज्ञान
तथा गति तीनों योगमयी हो उठती है॥ १७॥
संसार को यह 'काल की क्रीड़ा भ्रमित किए हुए है और वेद शास्त्रों ने सही मार्ग भुला दिया है।
योगियों ने इन सम्पूर्ण भ्रमित करने वाले तत्त्वों को योग के वश में कर लिया है और काल (मृत्यु) के
मार्ग का रस पी लिया है॥ १८॥
वे दयालु ब्रह्म अनेक रूपों के हैं, संत उन्हें पहचान कर स्वयं विलक्षण हो गए हैं। योग तथा ज्ञान
को पंडित (विद्वान) सुनकर स्वीकार करते हैं और वे शास्त्र तथा पुराण पढ़ते रहते हैं॥ ९॥
जैसे घड़े में जल है, और उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है-जब तक घड़े में आकाश का
बिम्ब स्थित है, तब तक सूर्य बिम्ब की भाँति वह परम तत्त्व दिखाई पड़ता है॥१०॥
घड़ा फूट गया, आकाश का बिम्ब नष्ट हो गया, सूर्य का बिम्ब भी विनष्ट हो उठा-उसी प्रकार इस
मानव योनि के नष्ट हो जाने पर सब अंधकूप जैसे हो उठता है। इस अंधे आकाश में कोई प्रतिबिम्ब
(भास) नहीं उठता-मन चारों ओर भूलकर भटक आता है। इस शरीर रूपी घट के विनष्ट हो जाने पर
यह देह अपने देही (ईश्वर) को पा जाता है और शरीर इस संसार में खो जाता है। ज्ञान योग व्रत संयम
करके तीनों गतियों उद्भव, स्थिति एवं संहार) पहचान लिया है। अन्तकाल में, यम के जाल में यह
जीव फँस जाता है और उसे काल अनेक प्रकारों से चबाता है॥
इसीलिए तुलसी साहब ने समस्त योग युक्तियाँ बताई हैं और उनसे जुड़े सन्तों की गति अगम्य और
न्यारी है।
सन्तों का मार्ग एवं आनन्द भिन्न है, इसे योगी भी नहीं जानते॥ १४॥
॥ सोरठा ॥
जोगी राह रमक तन तारी, करत जोग जुग चारी हो।
अगम अगत गति पार, जोग ज्ञान पहुँचै नहीं॥
अर्थ-रमक के मार्ग से शरीर का उद्धार करते हैं। और वे चारों युगों में योग करते हैं। अगम्य एवं
अज्ञेय (अगत) के ज्ञान के उस पार (जहाँ सन्त पहुँचते हैं) योग का ज्ञान नहीं पहुँचता॥
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कँवल षट गाऊँ। बसै तासु पर भेद बताऊँ॥
चढ़े चक्र षट जोगी गावै। तुलसी सब्द माहिं समझावै॥
काया माहिं कँवल का वासा। कँवल कँवल कहूँ भूमि निवासा॥
अर्थ-द्वितीय योग षट्दल कमल के स्थान का है। इस पर जो निवास करते हैं मैं उनके भेदों का
वर्णन करता हूँ। इस षट्चक्र पर चढ़कर योगी गान करता है-और तुलसी साहब कहते हैं कि वह उस
शब्दों से समझाता है। शरीर के मध्य में इस कमल का वास है-भूमि पर निवास करता हुआ योगी
कमल-कमल कहता रहता है।