घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ५१
इस पिंड के अन्तर्गत मैंने बत्तीस नालों का वर्णन किया है कोई साधु ही अपनी काया (पिंड) का
शोधन करके इसे समझ सकता है ॥
॥ दोहा॥
बत्तिस नाल निहारि कै, तुलसी कहा बिचारि ॥
घट घट अंदर देखि कै, साध करै निरवार ॥
अर्थ-बत्तीस नालों को देखकर तुलसी साहब ने उसे विचार करके बताया है। इन्हें पिंड-पिंड के
अन्दर देख करके साधुजन इनका निर्धारण करेंगे ॥
॥ चौपाई ॥
सत्त बचन साधू परमाना। भीतर भेद सत्त पहिचाना ॥
काया खोज नहीं जिन पाया। जाके सदा हिये तम छाया ॥
काया खोज किया नहि भाई। सुकदेव रहे भूल के माइ॥
ब्यास जनक नारद नहिं पाई। कथि पुरान आतम गति गाई ॥
अर्थ-सत्य वाणी के लिए साधुजन ही प्रमाण हैं। पिंड के भीतर के भेद ही सत्य की पहचान है।
जिसने इन तत्त्वों को शरीर में खोजकर नहीं प्राप्त किया-उनके चित्त पर सदैव अंधकार छाया रहेगा ॥
हे सखी! जिन्होंने काया में इसकी खोज नहीं की, ऐसे शुकदेव भूल में पड़े रहे। व्यास, राजा जनक
तथा नारद ने भी इसे प्राप्त नहीं किया और पुराणों का कथन करते हुए आत्मा के ज्ञान को गाते रहे ॥
॥ दोहा ॥
ज्ञानी भूले भर्म में, परम हंस ब्रह्मचार।
सास्तर संघ बिचारिया, बहै कर्म की धार ॥
अर्थ-परम सिद्ध (हंस) के ब्रह्माचरण को ज्ञानी भ्रम में पड़कर भूल गए। वे उसे शास्त्रों में विचार
करते हुए कर्म की धारा में बह गए ॥
॥ सुन्न भेद । चौपाई ॥
आगे कहो सुन्न बिस्वासा। बिना सुन्न गये जीव निरासा ॥
अब निज कहौं सुन्न में स्वाँसा। बिना सुन्न जिव काल निवासा ॥
सुन्न दिसा बिधि कहौं बुझाई। बूझै साध सुन्न जिन पाई ॥
बिरला सुन्न भेद को पावै। सुन्न दीप सोइ सब्द कहावै ॥
सुन्न की सोत धुन्न में लागी। धुन की सोत गगन में जागी ॥
गगन के ऊपर पवन रहाई। निरगुन पावन भवन के माई ॥
निरखि कँवल साधै कोइ साधू। मिटि जाइ काल कष्ट की ब्याधू ॥
मूल कँवल के ऊपर देखो। घट में सत्त सब्द ले पेखो ॥
अष्ट कँवल ओंकार का बासा। सो निज बूझो काल तमासा ॥
षोड़स कँवल को ध्यान लगावै। जोगी करै भेद सोइ पावै ॥
पवन जोग-जोगी गति गाई। त्रिकुटी निज धुनि कँवल कहाई ॥
मन थिर होइ सुरति ठहरावै। त्रिकुटी कँवल पवन लै आवै ॥