घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ४९
नाल सातवीं सेत बताई। गन की कला बसै तेहि माईं॥
नाल आठ अभया मत नाँऊँ। कामिनि चारि बसै तेहि ठाऊँ॥
नाल मुकरमा नौवीं नामा। द्वादस दूत बसै तहि ठामा॥
हरि संग्रह दसवीं दरसाई। लछमन राम बसै जेहि माईं॥
मुक्तामनि एकादस सोई। कलसर दूत बैठ बल जई॥
द्वादस नाल पोहप पट माईं। नभ नल द्वार सब्द गोहराई॥
तेरहवीं नाल निकट नट नौली। बचन बिदेह बाक बिन बोली॥
चतुरदसि नाल नटवर नामा। मेधा छपन कोटि बिसरामा॥
पंद्रा गगन नाल निरबानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
सोला सुखमनि नाल कहाई। सुकिरत सेत बसै तेहि ठाईं॥
सत्रह नाल अनूप अचीन्हा। अंडा बिदित बिस्व रचि लीन्हा॥
अठारा नाल बिमल सुर ज्ञानी। तैंतिस कोटि देव दरबानी॥
उन्निंस नाल भँवर मन्दा की। अंडा कुम्भ रहै मन छाकी॥
बिसवीं नाल अजोरक माली। सूरत सब्द सेत चढ़ि चाली॥
इक्विस नाल हंसदे नाऊँ। मुक्ता मानसरोवर ठाऊँ॥
बाइस नाल सत अंकित होई। बन अशोक सीता जहँ होई॥
तेइस नाल नगर एक बाटा। जहाँ को जम रोकै नहिं घाटा॥
चौबिस बिखम नाल निजधामा। गुंजे भँवर कंज के ठामा॥
पच्चिस नाल पदम सुर सोई। पचरँग रूप जहाँ नहिं होई॥
छबिस नाल गढ़ गोधर नाईं। अटक पार चढ़ फटक समाई॥
सताइस नाल त्रिकुट पर लंका। जहँ रावन बसै ब्रह्म निसंका॥
अठाइस सेत द्वार दुरबीना। समुन्दर सात पार कोइ चीन्हा॥
उंतिस नाल सिखर पर सैला। अच्छर अंदर अगम दुहैला॥
तिसवीं नाल अधर रस रोकी। जहाँ निरंजन बैठे चौकी॥
इकतिस सुरति कँवल अस्थाना। कोइ सज्जन सत साध बखाना॥
बत्तिस नाल सब्द सुन माईं। मुकर द्वार चढ़ि छूटै झाईं॥
बत्तिस नाली बरन अनूपा। सुर नर मुनि नहिं पाव भूपा॥
ये सब नाल चाल दरसाई। सो सब देखे घट के माईं॥
जिनके नाम ठाम गुन बरना। कहै तुलसी संतन के सरना॥
बत्तिस नाल बरनि समझाई। वाकी मुनि हर एक रहाई॥
बंक नाल है वा को नाँवा। तीनों भवन भेद नहिं पावा॥
घट में बत्तिस नाल बखाना। काया सोध साध कोइ जाना॥