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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

५४ / घट रामायण
॥ दोहा ॥
जोग बिधी बेनी कही, सुन्न जोग बिधि गाड़।
काल कला परचंड यों, ठग ठग सब को खाड़॥
अर्थ- योग विधि से त्रिवेणी बताई गई है, और वहीं शून्य योग विधि भी गाकर बताई गई है। काल
की प्रचंड कलाएँ इस प्रकार (जो इनके ज्ञान से अपरिचित हैं) ठग-ठग कर सबको खाती रहती हैं॥
॥ चौपाई ॥
अब बेनी संतन की गाऊँ। या से भिन्न भेद दरसाऊँ ॥
संतन की बेनी बिधि न्यारी। तुलसी भाखी देख निहारी ॥
अगम द्वार बेनी असनाना। सो बेनी संतन की जाना ॥
मंजै जोड़ अगम गति जानी। वह प्रयाग सब संत बखानी ॥
अर्थ-अब संतों की त्रिवेणी का वर्णन करता हूँ। पूर्व कथित त्रिवेणी से भिन्न उसके भेद का वर्णन
करता हूँ। संतों की त्रिवेणी प्रक्रिया विलक्षण है। तुलसी साहब कहते हैं कि उनको मैंने भलीभाँति निहार
कर देख लिया है॥
अगम द्वार पर त्रिवेणी का स्नान है, वही सन्तों की त्रिवेणी समझो। जो उस अगमन की गति जानता
हैं, वही वहाँ स्नान करता है, उस प्रयाग का वर्णन सारे सन्तगण करते हैं।
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अपार, जहँ बेनी मंजन कियौ।
सतगुरु पदम प्रयाग, करि अगाध गति जिन कही॥
अर्थ-जहाँ त्रिवेणी में स्नान किया, वह अगम्य तथा अपार हैं-मेरे सद्गुरु ही मेरे पद्म प्रयाग हैं।
जिन्होंने प्रयाग की अगाध गति का वर्णन किया है॥
॥ चौपाई ॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ। भिनि भिनि पंथ मता गति गाऊँ ॥
सरगुन से निरगुन बिधि बानी। भिनि भिनि राह रीति सब छानी ॥
परथम दृग दुरबीन लगावै। मन चित सुरति ताहि पर छावै ॥
देखै ता के बीच मँझारा। जगमग जोति होत उजियारा ॥
निरखा निरगुन पुरुष निहारा। जहवाँ सुनै सब्द झनकारा ॥
सेत दीप जिव पहुँचै पारा। कोटिन काल भये जरि छारा ॥
अर्थ-अब मैं उस मार्ग की रीति का वर्णन करता हूँ-इससे जुड़े भिन्न-भिन्न पंथ और मतों की गति
का गान कर रहा हूँ। सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म की व्याख्या भिन्न है- उनके भिन्न मार्ग हैं तथा रीति
अलग-अलग कही गई हैं॥
सर्वप्रथम अन्तः दृगों में दूरबीन लगाओ और साधक के मन, चित्त एवं स्मृति उस पर छा जाए। तब
उसके मध्य उस ज्योति को देखें-जिसमें ज्योति जगमगा रही है-उजाल हो रहा है॥ २ ॥
वहाँ न्यारा निर्गुण पुरुष को मुक्त साधक ने देखा, और वहाँ अनाहद नाद की झंकार का शब्द
सुने। जीव संतों के द्वीप में उस पर पहुँचता है-जहाँ कोटि-कोटि काल जल कर छार हुए हैं॥ ३ ॥