घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ / घट रामायण
ब्रह्म का नाम छोड़कर मनुष्य इस संसार में जीव कहा जाता है और अनेक योगियों में भ्रमण करता
हुआ वह भवसागर में रहता है॥ ब्रह्म के अभ्यन्तर में जीव जाकर उस प्रकार बैठ जाता है, जैसे राई
(छोटी सरसों) के दसवें भाग में समा गया हो॥
यह एक राई का दसवाँ भाग अपने अन्तर काल में एक लम्बा रास्ता-सा लगता है। इस बड़े अन्तर
को देखकर जीव को बड़ा शोक होता रहता है-तीनों लोक तो काल की आँखें हैं॥
जीव की आँखें उस समय पुरुष को देखती रहती हैं क्योंकि अब काल की दृष्टि विशेष हो गई है-
वह पुरानी दृष्टि नहीं रह गई है। जीव की आँख में चकोर (प्रभु संसक्ति हो गई) समाविष्ट हो गया और
पाँचों इन्द्रियाँ दृष्टि (देखते) जैसा व्यवहार (बाना) करने लगती हैं॥
प्रकृति में आवेग (उद्गा) आ गया, पृथ्वी दृष्टिमती हो गई और यह दृष्टि शून्याकाश में मनुष्य जैसी
मुद्रा करने लगी। पंच तत्त्व पाँचों नारी जैसे प्रभु में समर्पित हो उठे और मूरति साधना के बीच केवल
नाम ही बच पाता है॥
॥ दोहा ॥
काल करै जिव हानि, तुलसीदास तत सम रहौ॥
घट रामायन सार, मथि काया बिच घट कह्यो॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि काल ही जीव की हानि कर सकता है, अतः तत सम (संसक्ति
रहित निरपेक्ष) होकर जीवन यापन करो। इस घट रामायण में काया के बीच पिंड को मथकर तत्त्व-
चिन्तन किया गया है-(उसे समझो)॥
॥ सोरठा ॥
भिनि भिनि कहौं बखान, आदि अंत घट भेद बिधि॥
तुलसी तनहिं बिचार, घट निरखो निज नैन से॥
अर्थ-पिंडभेद के विधियों को आदि से अन्त तक भिन्न भिन्न रूपों में बताया गया है। तुलसी साहब
कहते हैं कि शरीर पर विचार करते हुए अपने नेत्रों से इस पिंड को देखो॥
॥ चौपाई ॥
आगे घट का भेद बखाना। बतिस नाल घट भीतर जाना॥
नाल भेद बिधि कहौं बुझाई। जिन जानी घट परचे पाई॥
अर्थ-आगे घट में भेदों का वर्णन किया गया है। इस घट के भीतर बत्तीस नाल जानिये। मैं
समझाकर नाल भेद विधिपूर्वक कहता हूँ। जिन्होंने इसे जाना, उसे घट का परिचय प्राप्त हो गया।
॥ नाल के नाम – चौपाई ॥
प्रथम नाल की बिधी बताऊँ। अभया तेज ताहि कर नाऊँ॥
दूसर रहस नाल जो गावा। चौदल कँवल फूल तेहि ठाँवा॥
कँवल चार दल भँवर उड़ाना। चढ़ि अकास बिधि जाइ समाना॥
कनक नाल तीसर कर नामा। चौंसठ जोगिनि बसै तेहि ठामा॥
चौथी नाल बिकट थिर थाना। कोठा नाल बहत्तर जाना॥
धुन्धर नाल पाँचवीं होई। काल सिंहासन बैठा सोई॥
छठवीं नाल रूपरम नामा। निरगुन रूप बसै तेहि ठामा॥