घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० / घट रामायण
अर्थ-अब मैं प्रथम नाल के विषय में बताता हूँ, उसका नाम अभया तेज है॥ १॥ दूसरे नाल 'रह्म'
का जो गान करते हैं-उसके स्थान चार दल वाले कमल के फूल पर होते हैं॥ १॥ इसके चार दलों से
भ्रमर उड़ते हैं और वे आकाश में चढ़कर विधाना (ब्रह्मा) में प्रवेश कर जाते हैं॥ १२/२॥ कनक नाल
तीसरा नाम है-यहाँ चौंसठ योगिनियाँ निवास करती हैं॥
चौथा नाल विकट नाल है। उसका स्थान स्थिर है, और इसमें बहत्तर कोठा नाल हैं। पाँचवीं नाल
धुन्धुर नाल है और वह काल के सिंहासन पर बैठा हुआ है।
छठी नाल का नाम 'रूपरम' है-और यहाँ निर्गुण रूप का निवास होते होता है। सातवीं नाल मेन
बताई गई है, उसमें मन की समस्त कलाएँ निवास करती हैं॥
आठवीं नाल का नाम अभयामत है-जिसके पास चार कामिनियाँ निवास करती हैं। नवीं नाल का
नाम मुकरमा है, उसके पास बारह दूत निवास करते हैं॥
हरिसंग्रह दसवीं नाल कही गई है-जिसमें राम-लक्ष्मण बैठे हुए हैं। एकादश नाल मुक्तामणि है-
जहाँ कलसर दूत बलपूर्वक बैठे हुए हैं॥
हे सखी! बारहवीं नाल पोहप पट है, यह नाल द्वारा आकाश में शब्दों को बुझाता है। तेरहवीं नाल
नौली नाम की सन्निकट ही है-यह वचन विदेह एवं वाणी बिना बोली के हो जाया करती है॥
चौदहवीं नाल का नटवर नाम है, जहाँ छप्पन कोटि मेधा (प्रतिभा) विश्राम करती हैं। पन्द्रहवीं
नाल का नाम निरवानी है-जहाँ 'उल्टा कूप' का जल झर झर कर चूता रहता है॥
सोलहवीं नाल सुखमनि है-उस स्थान पर सुकीर्ति सेतु स्थित है-सत्रहवाँ नाम अनुपम एवं अर्चान्हा
है-जहाँ विश्व के समग्र ब्रह्मांड की रचना वर्तमान है॥
अठारहवीं नाल को देवगण 'विमल नाम से जानते हैं-जहाँ तैंतीस करोड़ देवता दरबानी करते रहते
हैं। उन्नीसवीं नाल 'भँवर मन्दाकी' है-जहाँ शरीर एवं पिंड एक होकर रहते हैं॥
बीसवाँ नाल अजोरक माली है-जहाँ सुरति शब्द सेतु तक चढ़, कर पहुँच गए हैं? इक्कीसवें नाल
का नाम हंसदेव है-वहाँ मुक्ता तथा मानसरोवर दोनों हैं॥
बाइसवीं नाल 'सत अंकित' है-जहाँ अशोक वन में सीता है। तेइसवीं नाल नगर में 'एक बार' है-
जहाँ यमराज कोई मार्ग नहीं रोकता। चौबीसवाँ, विषम नाल है-जहाँ उसके धाम में कमल के पास
भ्रमर गुंजरित होते रहते हैं॥ पच्चीसवाँ नाल पद्म सुर है-जहाँ पंचेन्द्रियों वाले रूप नहीं होते॥
छब्बीसवें नाल का नाम गोधरगढ़ है-जहाँ खाइयों का अवरोध पार करते ही शून्य द्वार (फाटक)
में समा जाते हैं। सत्ताइसवीं नाल त्रिकुटी पर है, लंका उसका नाम है- जहाँ रावण ब्रह्मा से निर्भय नि-
शंक भाव से निवास करता है॥
अट्ठाइसवाँ द्वार श्वेत द्वार है-जहाँ दूरबीन है और वहाँ से सात समुन्दर पार स्थित किसी को पहचान
लेता है। उन्नीसवाँ नाम 'शिखर पर शैल' है जो अन्तर बिना अक्षर (नाम का) दुर्लभ तत्त्व है॥
तीसवाँ नाल 'अधर रस' के रूप में रोकी हुई है-जहाँ निरंजन ब्रह्म चौकी पर बैठे हुए हैं।
इकतीसवीं नाल सुरति स्थान पर है-जिसका वर्णन कई सज्जन या साधुजन ही कर सकता है॥
हे सखी! बत्तीसवें नाल के शब्दों को सुने-वह मुकुट पर लगी हुई झाईं की भाँति हैं-जो उस पर
चढ़ने से छूटती है।
बत्तीसवाँ नाल अनुपम वर्णन का है-उसे कोई देवता, मुनि या राजा नहीं पा पाते॥
इन समस्त नालों की अवस्थाओ को मैंने बताया है-इन्हें सभी साधक अपने शरीर के भीतर देखते
हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि संतों की शरण में रहकर मैंने इनके नाम, स्थान तथा गुणों का वर्णन
किया है॥
मैंने बत्तीस नालों का वर्णन करके समझा दिया है। शेष मुनियों द्वारा वर्णित 'एक नाल' अपहृत है।
उसका नाम बंक नाल है। तीनों लोकों में उसका रहस्य समझा नहीं जा सका है॥