घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ५३
शून्य का स्रोता ध्वनि में लगता है, ध्वनि का स्रोत आकाश में जाता है। आकाश के ऊपर वायु है
और इस प्रकार मूलभवन में निर्गुण वायु है॥
वहाँ आकाश में कमल देखकर कोई-कोई साधु उसे साधता है और उससे काल कष्ट की व्याधि
मिट जाती है। उस कमल के मूल के ऊपर इस पिंड में स्थित 'सत' शब्द को लेकर देखो॥
अष्ट कमल दल में ॐकार का निवास है। उसे काल की क्रीड़ा समझो। इसके बाद षोड्श कमल
का ध्यान लगाओ-योगी जन स्वार्थ तथा परमार्थ में जो भेद करते हैं, वह उसे प्राप्त कर लेता है॥
पवन के योग का ज्ञान योगियों ने गया है। त्रिकुटी के बीच अपनी ध्वनि का श्रवण 'कमल' है। मन
को स्थिर करके यहाँ जो सुरति ध्यान को एकाग्र करता है, वह उस त्रिकुटी के बीच कमल-पवन में ले
आता है॥
हृदय में आए हुए अन्य पवनों को भी वह देखता है, और उस अपूर्व ब्रह्म की ज्योति दृष्टि में आकर
चमकती है। जीव पवन जब सन्तुष्ट (अघाई) हो जाए तो उसे श्वेत पवन से मार कर चला देना चाहिए।
करिया पवन जब बलहीन हो उठता है, तब नाखों पवन को जीव पहचानने लगता है। यही नाखों
पवन मेरा विश्वसनीय भरोसा है, यही श्वेत कमल से डोरी बाँधकर एकतान करता है॥
श्वेत कमल सुकीर्ति से सम्बद्ध है और वही 'संत' मत का द्वार है-संत द्वार एवं पुण्य की एक ही
भाषा है, उसका ज्ञान कोई विरला साधु ही जानता है॥
कदली वन में जिन्होंने 'शब्द' का लाभ पाया है-वही साधु अलक्ष्य मुक्ति रूपी अमृत का पान
करता है। जहाँ केवल (निदाना) निरंजन निवास करते हैं, वहाँ सहस्रार कमल है-जिसे योगी विशेष
योगविधि से जानते हैं॥
द्वादश कमल के आगे अमृत का वास है। गुरुविहीन व्यक्ति यहां प्यास से मरता रहता है। जो
सतगुरु के साहचर्य में होगा, वही, निजत्व को प्राप्त करेगा-और वह मुख में पवित्र अमृत भर-भरकर
खाता रहता है॥
वह अमृत पीकर मुक्ति लोक को जाता है-(यह वह है) जिसे इसी घट के भीतर उसकी खोज की
है। जो अमृत (पाँजी) की खोज में निरन्तर हाथ फैलाए रहता है, वह जीव सहज भी भवसागर तर जाता
है॥
शून्य गगन में झिलमिलाता हुआ, वह झरता रहता है-'गंगा, यमुना' एवं सरस्वती का योगी राही है।
जहाँ गंगा, यमुना एवं सरस्वती है-वही त्रिवेणी का संगम है॥
त्रिकुटी में संगम की त्रिवेणी का घाट है-सत जीव वहाँ निवास करके मुक्ति मार्ग प्राप्त करता है।
बंकनाल से होकर गंगा जाती हैं और शून्य गुफा में यमुना दौड़ती (बहती) रहती हैं॥
सरस्वती श्वेत कमल में आती हैं-योगी अपने मन को विधिपूर्वक वास कराता है। गंगा को ग्रहण
करके उसमें समान करोष यमुना तो दूर से ही मुक्ति की स्थान है॥
तीनों नदियाँ तीन धाराएँ हैं और इन्हें अपने-अपने पिंड में निहार कर देखो। ये तीनों अगम्य और
अपार हैं, विरले साधुजन ही इन नदियों के पार उतरते हैं।
इन तीनों त्रिभवनी घाट है-जहाँ ब्रह्मा तथा विष्णु भी मार्ग नहीं प्राप्त करते। शिव तथा अन्य अनूप
(विलक्षण) योगिजन ने भी अपने स्वरूप को वहाँ समझ नहीं पाए या देख नहीं पाये॥
हे भाई! वह सब निराकार रूप में अभ्यन्तर में वर्तमान है, उनका भेद मैं समझाकर कहता हूँ। सुरति
एवं निरति ज्ञान द्वारा स्वयं खोज करो और शून्य शिखर पर चढ़कर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ॥
वहाँ पृथ्वी के ऊपर ब्रह्मांड की ताली (तारी) है और दो कपाटों (पट) के भीतर सुरति ज्ञान
सम्हाली हुई है-उसके दाहिने बाएँ पत्थर की शिलाएँ तथा पहाड़ हैं-जिसमें स्थित मार्ग कोई नहीं देख
पाता॥
उस अगम्य, अगाध, अमरणधर्मा के शत द्वार पर जहाँ 'सत' में समाविष्ट योगिजन (यारा) बैठे हैं।
वहीं यह बेचारा जीव अमृत पान करता है; जिससे काल का जंजाल (जारा) कट जाता है॥