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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

घट रामायण / ५
॥ दोहा ॥
निरगुन ज्ञान बिचारिया, सुरति राखिये पास।
तुलसीदास जहँ बासकर, जीव न जाइ निरास॥
घट रामायन सार, यह घट माहिं घटाइया।
घट का मथन बिचार, भिन्न भिन्न करि डारिया॥
अर्थ-सुरति को अपने पास रखकर उसके द्वारा निर्गुण ज्ञान को देखें। तुलसी साहब कहते हैं, वहाँ
निवास करो-जहाँ उसके पास कोई जीव न जा सके ॥
यह घट रामायण का सार तत्त्व है और इसे घट रामायण पर घटाया गया है-इस घट के विचार
मंथन ने इसके स्वरूप को भिन्न-भिन्न कर डाला है।
॥ सोरठा ॥
निरगुन निरखि निहारि, ता से गुरुपद भिन्न है।
चौथे पद जद जाइ, पद प्रयाग सतगुरु लखै॥
अर्थ-निर्गुण ब्रह्म को भलीभाँति निरख कर देखो, सद्गुरु उससे भिन्न है यदि चौथे पद पर पहुँचौं
तब सतगुरु का चरण रूपी प्रयाग दिखाई पड़ेगा॥
॥ दोहा॥
तीन लोक के माहिं, निरगुन सरगुन रचि रह्यौ ॥
सतगुरु इनके पार, सो तुलसी घट लखि पर्यौ ॥
अर्थ-तीनों लोकों के बीच में निर्गुण तथा सगुण रचा हुआ है-सतगुरु इनके उस पार हैं और वही
(सतगुरु) घट (पिंड) के भीतर भी दिखाई पड़ता है।
॥ छन्द ॥
घट भीतर जानी आदि बखानी। सुरति समानी सब्द मई॥
देखा निज नैना कहौं मुख बैना। सत्त नाम का मर्म यही ॥ १ ॥
नहिं राम अरु रावन यह गति पावन। अगुन सगुन गुन नाहिं कही॥
कहि अकथ कहानी अगम की बानी। बेद भेद गति नाहिं लई ॥ २ ॥
सुर नर मुनि ज्ञानी उनहुँ न जानी। पँडित भेष सब कहँ कही॥
तुलसी मत भारी यह गति न्यारी। बूझेंगे कोई संत सही ॥ ३ ॥
अर्थ-इस पिंड के भीतर आदि तत्त्व समाया हुआ कहा जाता है, और सुरति ज्ञान उसमें शब्द बनकर
छिपा हुआ है। मैंने उसे अपने नेत्रों से देखा है, मुख-वाणी से कहता हूँ-यही सत्यनाम का मर्म है॥ १॥
यह राम और रावन नहीं है, यह अध्यात्म की पवित्र गति (ज्ञान) है-इसे अगुण, सगुण एवं गुण
रूप नहीं कहा गया है। इसकी कथा अकथ्य है, यह अगम्य वाणी है, वेद ने इस भेद के लक्षणों को
नहीं माना है॥ २ ॥
देवता, मुनि, ज्ञानी मनुष्य आदि ने उसके ज्ञान को नहीं समझा है। नाना भेषधारी पंडितजन भी जो
कहा गया है, उसी को ही कहते हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि यह मत सर्वाधिक भारी (गम्भीर) है,
उसका ज्ञान विलक्षण है, उसे कोई संतजन ही सही-सही समझेंगे ॥ ३ ॥