घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ / घट रामायण
देखै अवर पवन हिये माई। चमकै जोति दृष्टि में आई॥
जीव पवन जब चलै अघाई। सेत पवन से मारि चलाई॥
करिया पवन भई बलहीना। नाखौ पवन जीव जब चीन्हा॥
नाखौ पवन भरोसा मोरा। सेत कँवल से बाँधौ डोरा॥
सेत कँवल सुकिरत की होई। सत मत द्वार जानिये सोई॥
सत्त सुकृत की एकै बानी। ताकी गति बिरलै पहिचानी॥
कदली सब्द लाभ जिन देखा। मुक्ति अमी तहँ पियै अलेखा॥
जहाँ निरंजन बसै निदाना। सहस कँवल जोगी बिधि जाना॥
द्वादस आगे इमृत बासा। निगुरा नर सो मरै पियासा॥
सगुरा होइ सोई निज पावै। भर-भर मुख इमृत भल खावै॥
पीवै अमी लोक को जाई। घट भीतर निज खोज लगाई॥
पाँजी खोज हाथ अनुसरई। सो जिव सहजै से भौ सरई॥
झिलिमिल झरै सुन्न के माहीं। गंगा जमुना सरसुति राही॥
गङ्गा जमुना सरसुति होई। तिरबेनी संगम है सोई॥
त्रिकुटी संगम बेनी घाटा। बसै जीव सत पावै बाटा॥
बंक नाल होइ गंगा जाई। जमुना सुन्न गुफा से धाई॥
सरसुति सेत कँवल से आई। मन जोगी बिधि बास कराई॥
गंगा गहै करै असनाना। जमुना दूरि मुक्ति कर थाना॥
तीनौ नदी तीनि हैं धारा। आप आप में देखि निहारा॥
यह तीनों हैं अगम अपारा। बिरले साधू उतरै पारा॥
तिन में रहै त्रिभवनी घाटा। ब्रह्मा बिसनु न पाँवै बाटा॥
संकर जोगो सिद्ध अनूपा। उनहूँ न पायौ आपन रूपा॥
निराकार अभि अंतर भाई। ता का भेद कहूँ समझाई॥
सुरति निरति करि खोजै आपू। सुन्न सिखिर चढ़ि खैंचै चाँपू॥
महि ऊपर ब्रहांड की तारी। द्वै पट भीतर सुरति सम्हारी॥
दहिने बाँयें सिला पहारा। जहँ की बाट न कोइ निहारा॥
जहँ सत द्वार बैठ सत यारा। अगम अगाध अजर का द्वारा॥
इमृत पीवें जीव बिचारा। जा से कटै काल की जारा॥
अर्थ—आगे मैं शून्य के विषय में वर्णन करता हूँ। बिना शून्य में प्रवेश के जीव निराश रहता है। अब
अपने शून्य में स्थित श्वास का वर्णन करता हूँ। बिना शून्य के जीव का काल में निवास है॥
मैं शून्य की दिशा को विधिपूर्वक समझाता हूँ। जिन साधुओं ने शून्य को प्राप्त कर लिया है, वे इसे
समझेंगे। बिरला साधु ही शून्यभेद को समझता है। शून्य दीप में स्थित 'सोऽहम्' शब्द ही 'सबद' के नाम
से पुकारा जाता है॥