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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

५६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
आदि अंत का भेद, तुलसी तन भीतर लखा।
सुरति सब्द परकास, ज्यों अकास सर सैल करि ॥
अर्थ-उसके आदि और अन्त के रहस्य को तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने पिंड के भीतर देखा है-
जैसे शून्याकाश सरोवर एवं पर्वत है, ठीक उसी प्रकार सुरति शब्द का प्रकाश है। हे सन्तगण! आप
लोग उसका आनन्द लें।
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भेद कहों अनुसारा। लेकर ज्ञान बान भ्रम जारा ॥
ज्ञान रतन की आँखी होई। जब जम जाल देखिये सोई ॥ १ ॥
सत मत गत अभि अंतर देखै। तत मत अष्ट कँवल में पेखै ॥
सुरति सुहागिन होइ अगमानी। तुरतैं मिली सत्त की बानी ॥ २ ॥
अरध उरध बिच बैठे माधो। तत उनमुनी लगाइ समाधौ ॥
तारी उलटि तत्त में लावै। रहस नाल मधि जाइ समावै ॥
तुलसी मुद्रा जोग समाधा। आगे भाखों भेद अगाधा ॥ ३ ॥
अर्थ-अब मैं भेदों के अनुसार वर्णन करता हूँ। ज्ञान के गण को लेकर समस्त भ्रमों को जला
दिया। ज्ञान आध्यात्मिक रत्न की आँख है। उससे देखना हो तो यम के माया जाल को देखा जा सकता
है ॥
सत्यमत के ज्ञान को अभ्यन्तर में योगिजन देखते हैं- उस मत को पिंड के अन्तर्गत अष्ट कमल में
भी देखते हैं ॥ सुरति रूपी सौभागिंनी आगे-आगे होकर तुरन्त ही सत्य की वाणी से मिल जाती है ॥
अर्ध एवं ऊर्ध्व के बीच ब्रह्म ( माधव ) बैठे हैं और उन्होंने अपनी उन्मनी समाधि भी लगा रखी है ॥
तालु ( तारी ) को उलटकर तत्त्व को मन में लाते हैं और रहस नाल में जाकर समा जाते हैं। तुलसी
साहब कहते हैं कि यही समाधि की योगमुद्रा है-आगे उसके अनन्त भेदों का वर्णन करता हूँ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी तन के माहि, पंथ भेद साधू सही ॥
तत मत तोल अँकाइ, घरघर जाइ जिन जिन कही ॥
अर्थ-साधुगण सही कहते हैं कि शरीर के मध्य में अनेक पंथभेद हैं। घर घर जाकर जिन सन्तों ने
जो-जो बताया है, उस उस तत्त्व का मूल्यांकन वहाँ किया जा सकता है ॥
॥ चौपाई ॥
ये सब काल जाल रस रीती। भौ कृत खान जानि जम प्रीती ॥
गगन के मँडल काल अस्थाना। पाँच भूत विधि जाइ समाना ॥
पाँच पचीस तीन मन मैला। सब जानौ वा को निज खेला ॥
काल जाल जग खाइ बढ़ाया। रिखी मुनी कोइ भेद न पाया ॥
उलटा चलै गगन को धाई। ता से काल रहै मुरझाई ॥
सतगुरु साहिब संत लखावैं। तब घट भीतर परचा पावैं ॥