घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
४० / घट रामायण
भिनि भिनि नाम बिधी बतलाऊँ। पवन पचासी बरनि सुनाऊँ॥
पिंड में पवन पचासी बासा। सो निज भाखौं भेद खुलासा ॥
॥ नीर के नाम ॥
अर्थ-प्रथम 'अजीत' जल का वर्णन करता हूँ। दूसरे जल का नाम 'कर्त्ता' जल है। तीसरा जल,
अनूप है। चौथा पहचाना गया जल 'मुक्ति' जल है। पाँचवाँ जल 'पुरइन' के नाम से प्रमाण रखता है
और छठाँ जल 'अंबुज' जल कहा गया है। सातवाँ जल 'विषया' है और आठवाँ जल 'अटला सुर' है॥
नवा नीर दुख को नष्ट करने वाला 'नाटक' है। दसवाँ जल दसों द्वारों को छेदने वाला है। एकादश
नीर काल है-बारहवाँ जल जहाँ जीव प्रस्थान करता है (या जीव जल है)।।
तेरहवाँ जल 'पुरुष' का ध्यान है-जो उसे बूझता है, उसे पिंड का ज्ञान हो जाता है। चौदहवें जल में
जीव की संसक्ति है पन्द्रहवाँ जल वह है जिससे लोकपीड़ा झेली जाती है॥
सोलहवाँ जल स्वर्ण का साथी है और सत्रहवां जल रूपरस का आनन्द है। अट्ठारहवाँ जल 'बोल'
है और उन्नीसवाँ जल पुष्प रंग से श्रेष्ठ है। बीसवें जल की 'कलंगी' के नाम से पुकारा जाता है और
उसका परिचय अपने शरीर के भीतर ही होता है। इक्कीसवाँ जल सुख सागर धाम का है, उस स्थान पर
'भ्रमर-कमल' दोनों उलझे हैं॥
बाइसवाँ जल घट मूल का राजा है और तेईसवाँ जल निराशा में बजता रहता है। चौबीसवाँ जल
चतुर सुजान है और पच्चीसवाँ जल बादल का प्रमाण है॥
तीसवाँ जल बल का भार है और इकतीसवाँ जल संसारी है। बत्तीसवाँ जल निर्गुण ब्रह्म की सृष्टि
है और तैंसवाँ जल आलस नाम का मीठा जल है। चौंतीसवें जल का 'सरोसिल' नाम है और पृथ्वी को
पैंतीसवाँ जल बताता हूँ॥ छत्तीसवें जल में 'कामिनी' का निवास है-वह ब्रह्मा और विष्णु का भोग
विलास है॥
जीव जन्तुओं का जल जीवन में निवास है-ये सभी काल के वश में होते हैं। छत्तीस जलों का इस
प्रकार नाम निर्धारित है और इन पर बिरला साधु ही विचार करता है॥
आगे में पचासी वायु का वर्णन करता हूँ-उनका नाम तथा भेद यहाँ वर्णित है। उनके भिन्न-भिन्न
नाम और भेद यहाँ बतलाये गये हैं-उन पचासी वायुओं का वर्णन करके सुनाता हूँ।
इस पिंड के भीतर पचासी पवनों का निवास है। मैं उनका स्पष्ट भेद करके वर्णन करता हूँ॥
पवन के नाम
१. रजलाय पवन १४. उपजीत पवन २६. सुख रोग पवन
२. केदार पवन १५. जगजीत पवन २७. ज्ञान कुंभ पवन
३. विलंभ पवन १६. पर राज पवन २८. मैना ऊँचा पवन
४. समीर पवन १७. बलकुंभ पवन २९. त्रिकोध पवन
५. गुरभो पवन १८. पतराज पवन ३०. किवलास पवन
७. श्रुतिअंध पवन १९. बलभेद पवन ३१. करनास पवन
८. नलपती पवन २०. बारुन पवन ३२. रस नाग पवन
९. ब्रह्मराज पवन २१. कुभेर पवन ३३. जनजीत पवन
१०. मंदोष पवन २२. जगजाय पवन ३४. सकरीत पवन
११. सकल तेज पवन २३. बेधुन्ध पवन ३५. बेलोक पवन
१२. मन सोत पवन २४. सकलंध पवन ३६. मनमोष पवन
१३. जग जोत पवन २५. सल सोख पवन ३७. बेरूप पवन
घट रामायण-भाग १ / ४१
३८. सतसूक पवन ५४. उपमीत पवन ७०. पदमूर पवन
३९. बीज बन्द पवन ५५. दरतीत पवन ७१. करकीत पवन
४०. बीज बन्द पवन ५६. उपमार पवन ७२. धरजीत पवन
४१. अज सार पवन ५७. अभियार पवन ७३. मनमास पवन
४२. नितनाल पवन ५८. अतरीत पवन ७४. सरसूत पवन
४३. शब्दाल पवन ५९. ताइंत पवन ७५. अवधूत पवन
४४. गिरनाल पवन ६०. सुषमंद पवन ७६. आकाश पवन
४५. शुषपाल पवन ६१. असमद पवन ७७. जगबास पवन
४६. रूपान पवन ६२. सोराठ पवन ७८. सुनसूत पवन
४७. विधान पवन ६३. लैघाद पवन ७९. मनभूत पवन
४८. सुभपती पवन ६४. करिहाट पवन ८०. निरधार पवन
४९. छेरती पवन ६५. करुनाट पवन ८१. सतसार पवन
५०. उतरंग पवन ६६. बैराग पवन ८२. आसोग पवन
५१. तितरंत पवन ६७. लैजार पवन ८३. तन भोग पवन
५२. पुरवो पवन ६८. लैलार पवन ८४. जग जोग पवन
५३. सरभो पवन ६९. नदमूर पवन ८५. मन रोग पवन
।। चौपाई ।।
पवन पचासी भाखि सुनाई। कोइ साधू घट भीतर पाई॥
घट में पवन पचासी जाना। निरखा नैन सैन धरि ध्याना॥
साधु आदि कोई करै बिबेका। सोइ निज सार पवन का लेखा॥
तुलसी जिन जिन नैन निहारा। पवन पचासी बरनि सिहारा॥
जिन जिन घट की सैल सँवारा। पवन भवन सोइ गवन गुहारा॥
आगे सुनहु गगन का लेखा। सोला गगन पिंड में देखा॥
जिन जिन सैल सुरति से कीन्हा। सोला गगन भाखितेहि दीन्हा॥
जो सोला का भेद बतावै। सोह सज्जन सत साध कहावै॥
भिन्न भिन्न सोला बिधि भाखों। गगन नाम निज एक न राखौं॥
बिधि बिधि नाम कहौं समझाई। चित दे सुनौं गगन कर नाई॥
अर्थ-पचासी पवनों को कहकर बताया है। इसे कोई कोई साधु ही घट के भीतर प्राप्त करता है घट
पवनों को संख्या पचासी समझो। नेत्र दृष्टि पर ध्यान लगा कर ही इसे मैंने देखा या समझा था॥
कोई विलक्षण साधु ही इसका ज्ञान करता है-वही अपनी साधना के सार तत्त्व पवन का लेखा-
जोखा भी करता है। तुलसी साहब कहते हैं कि जिन-जिन इसे नेत्रों से देखा है-पचासी पवनों का वर्णन
करके वह आनन्दित होता है॥
जिस-जिस पिंड का पर्वत शिखर सँवारा गया है-उसी-उसी ने वायु स्थल के गमन को पुकारा है-
(वर्णन किया है) आगे आकाश का वर्णन देखो-मैंने सोलह आकाश इसी पिंड में देखा है॥१३॥
४२ / घट रामायण
सुरति ज्ञान से जिन-जिन पर्वतों से साक्षात्कार किया-उन्होंने सोलह आकाशों के विषय में बता दिया
है। जो इस सोलह आकाश का वर्णन करता है, वही सज्जन है, वही सच्चा साधु है॥
मैं सोलह आकाशों का वर्णन भिन्न-भिन्न रूपों में कर रहा हूँ। गगन (आकाश) का नाम देकर
एक भी न छोड़ूँगा। उनके विधि-विधि नामों को मैं समझाकर बताऊँगा। हे श्रोतागण! ध्यान देकर
आकाश की भाँति स्थिर चित्त से सुनो॥
॥ गगन के नाम। चौपाई॥
परथम गगन निसाधर मोषा। दूसर गगन पृथी पद पोषा॥
तीसर गगन बिरिछ सुर सोषा। चौथा गगन दिलंभी गोषा॥
पंचम गगन हिरा पद स्यामा। षष्टम गगन निरंजन नामा॥
सप्तम गगन पुलंधर चीन्हा। अष्टम गगन सफानल कीन्हा॥
कदलीकंद नवीं कर नामा। दसवीं गगन जमरस के ठामा॥
एकादस गगन हरि हिरदे नामा। द्वादस गगन अधर परमाना॥
तेरा गगन कलंगी रूपा। चौधा गगन है धुंध सरूपा॥
पद्रा गगन मुक्ति कर नामा। सोला गगन गुप्त निज धामा १ ॥
इतने गगन काया के माईं। सज्जन साध खोज कोइ पाई॥
सोला का कोई भेद बतावै। सोइ सोइ गगन गिरा गति गावै॥
तुलसी निरखि कहा निज लेखा। बूझि साध कोइ करै बिबेका॥
घट भीतर सब गगन बताया। भिनि भिनि नाम गगन गति गाया॥
इतने की कोइ जानै साधा। सो नहिं परै काल के फंदा॥
आगे भेद जो कहौं अनूपा। भँवर गुफा में जोति सरूपा॥
भँवर गुफा छै भाखि सुनाऊँ। जाकौ भिनि भिनि भेद बताऊँ॥
अर्थ-आकाश का प्रथम नाम निशाकर कहा गया है-दूसरा आकाश पृथ्वीपद बताया गया है।
तीसरा आकाश देववृक्ष सोषता है और चौथा गगन दिलंभी है-जो आकाश को प्रतिबिम्बित करता है॥
पंचम आकाश श्यामवर्ण का हीरापद है और छठें आकाश का निरंजन नाम है। सातवें आकाश को
'पुलंधर' के रूप में पहचाना है और आठवें आकाश का नाम सफानल है॥
नवें का नाम कंदली कंद है और दसवाँ गगन 'जमरस' के पास है। एकादश गगन का हृदय नाम है
और द्वादश आकाश अधर है। तेरहवाँ आकाश 'तेलंगी' रूप है-चौदहवाँ आकाश धुंध की भाँति है॥
पन्द्रहवाँ आकाश मुक्ति के नाम का है-सोलहवें गगन का धाम गुप्त है। इतने आकाश शरीर के
मध्य हैं। विरले सज्जन तथा साधु इसे खोज पाते हैं। जो आकाश में स्थित नाद की ध्वनि का गान करता
है, वही कोई विरला ही सोलह आकाश का भेद बता सकता है॥
तुलसी साहब ने उन्हें भलीभाँति देखकर अपना लेखा कहा है-कोई साधुजन ही इसको समझ कर
इसका विवेक कर सकता है। इसी घट के भीतर समस्त आकाश को बताया गया है। गगन की गति के
अनुसार साधुजनों ने उसका भिन्न-भिन्न नाम बताया है॥
१. मु० दे० प्र० की पुस्तक में कड़ी ८ में 'गुप्त निज' की जगह 'मुक्ति कर' छपा है (जो कि ठीक नहीं हो
सकता क्योंकि वहीं नाम पंद्रहवें गगन का है)।
घट रामायण / ४३
कई साधु इतने तत्त्वों का जब ज्ञान कर लेता है तो वह काल के फंदे में नहीं पड़ता। आगे जो उसके
अनुपम भेदों का वर्णन करेगा-वह भ्रमर गुफा में ज्योति स्वरूप समझा जाएगा। मैं अब छः भ्रमर
गुफाओं का वर्णन करता हुआ उनके भिन्न-भिन्न भेदों को बता रहा हूँ॥
॥ भँवर गुफा के नाम ॥
परथम बेहद नाम सुनइया। भँवर गुफा बिच बास करइया ॥
दूसर नाम निरखि निरधारी। तीसर नाम मुक्ति पद प्यारी ॥
चौथा नाम उनमुनी स्यामा। सोइ सब जोगिन का बिसरामा ॥
पंचम नाम हरी हद सूना। छठवाँ चदर अधर पर धूना ॥
छई छर भँवर गुफा दरसाई। तुलसी नैन नजरि में आई ॥
आगे भाखों भेद निहारा। छै त्रिकुटी घट माहिं सिहारा ॥
जा कौ नाम ठाम दरसाऊँ। भिनि भिनि भाव भेद समझाऊँ ॥
अर्थ-भ्रमर गुफा का प्रथम नाम 'बेहद' सुना गया है-वह भ्रमर गुफा के बीच निवास करता है।
दूसरा भेद 'नरधारी' नाम से समझो। तीसरा नाम 'प्रिय' मुक्तिपद है। चौथा नाम भेद श्यामल उनमनी है-
वही सम्पूर्ण योगियों के लिए विश्राम स्वरूप है। पाँचवाँ नाम ( भेद ) हरीहद शून्य है। छठवाँ 'चंदर' है-
जिसका स्थल ओष्ठ है। छठवाँ भँवर गुफा में 'छर' के रूप में दिखाई पड़ता है-तुलसी साहब कहते हैं
कि वह निरन्तर दृष्टि में आती रहती है।
घट के भीतर स्थित छः त्रिकुटियों का वर्णन करता हूँ आगे मैं उनके भेदों को देखकर वर्णन कर
रहा हूँ। मैं इन त्रिकुटियों का नाम तथा स्थान बताऊँगा और उनके भिन्न-भिन्न भाव भेदों को भी
समझाऊँगा ॥
॥ त्रिकुटी के नाम - चौपाई ॥
प्रथम कहौं रुकमन्दर नाऊँ। काल कौ चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
दूसर बली बिजै बल सोई। षटदल कँवल फूल जहँ होई ॥
तीसर नाम मुकर मनि जोई। मन बुधि निद्रा से सुख सोई ॥
चौथा नाम सब्दनी होई। नौ नाड़ी सुपने दे सोई ॥
पंचम नाम गोमती गाऊँ। अठदल कँवल फूल तेहि ठाऊँ ॥
हंसमुखी छठवीं कर नामा। हंस बिहंग बसै तेहि ठामा ॥
अर्थ-प्रथम त्रिकुटी का नाम एकमन्दर है। उस स्थान पर काल चक्र विचरण करता रहता है। दूसरे
का नाम बली है जो अपने विजय बल से युक्त है तथा उसके पास ही घट दल कमल पुष्प स्थित
है ॥ १॥
तीसरे का नाम 'मुकुरमणि' है, जहाँ मन और बुद्धि निद्रा में सुखपूर्वक सोते रहते हैं। चौथी त्रिकुटी
का नाम शब्दनी है-वह नौ नाड़ियों को स्वप्न में रखकर सोती रहती है। ॥२॥
पाँचवाँ नाम गोमती है, उस स्थान पर अष्ट दल कमल फूल के रहता है। छठें का नाम हंस मुखी
है-उस स्थान पर 'हंस पक्षी' निवास करते हैं ॥ ३ ॥
॥ दोहा ॥
छै त्रिकुटी बिधि बिध कही, दृग निज नैन निहार।
तुलसिदास घट भीतरे, देखि कही सब सार ॥
४४ / घट रामायण
अर्थ-जैसा विधिपूर्वक बताया गया है, उस प्रकार की छः त्रिकुटियों का वर्णन अपने नेत्रों से
देखकर किया है। तुलसी साहब कहते हैं कि इन सबके सार तत्त्वों को इस पिंड के भीतर देखकर
उनका वर्णन करते हैं॥
॥ चौपाई ॥
त्रिकुटी छई नाम निज गाया। तुलसी भिन भिन भेद लखाया॥
जोगी जीत रीत कोई जानै। त्रिकुटी चढ़ै भेद पहिचाने॥
आगे सतमत द्वार लखाऊँ। सुकिरत सेत द्वार दरसाऊँ॥
जौन दिसा सुकिरत है भाई। तौन दिसा सत द्वार लखाई॥
अष्ट कँवल दल दरपन माई। नाभि सेत नल मध के ठाई॥
नल नागिनि करि बैठी भेषा। जीव भखन वो करै अनेका॥
पुनि सरवर तेहि पास बिराजै। ता पर बैठि सभा बहु गाजै॥
तेहि सरवर जल नीर अपारा। जीव उतरि कोइ जाइ न पारा॥
कौन दिसा नागिनि रस रूखा। कौन दिशा सरवर रहै सूखा॥
अभि अंतर सुकिरत सत बासा। करिया कँवल में काल निवास॥
अष्ट कँवल नागिनि रस रूखा। सरवर बिरह कँवल में सूखा॥
यह सत रीति द्वार दरसाई। अब मैं कहौं सुनो तुम भाई॥
आगे तरवर भेद अपारा। चारि बिरछ पर सुरति सम्हारा॥
जीव पैठि सोइ मारग पावै। गगन कँवल भीतर चलि आवै॥
उलटै चक्र सुन्न में धावै। सिध साधक जहँ ध्यान लगावै॥
बिरछ चारि सोइ कहौं बुझाई। जाकर नाम ठाम गति गाई॥
जहँवाँ कागभसुण्ड कहु काला। बट पीपर पाकरी रसाला॥
कागभसुण्ड काया के माईं। तन मन बिरछ संत समझाई॥
बिरछा ऊपर तालबिराजै। निरखत काल कला सब भाजै॥
अर्थ-मैंने अपनी छः त्रिकुटियों के नामों का वर्णन किया है और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को
दिखाया। कोई योगी ही इस संसार की जीत की रीति को जानता है, तो वही त्रिकुटी पर चढ़कर उनके
भेदों को समझेगा॥
आगे सतमत का द्वार दिखाऊँगा-ये सुकीर्ति के द्वार हैं। हे भाई जिस दिशा में जिस दिशा में वह
सुकीर्ति है-उसी दिशा में 'सत' द्वार हैं॥
जहाँ अष्ट दल कमल दर्पण की भाँति हैं-वह स्थान नाभि के श्वेत नाम से मध्य में है। उसी नाल में
नागिन वेषबदल कर बैठी है-जो अनेक जीवों का भक्षण कर लेती है॥
पुनः उसके पास एक सरोवर है-वहाँ बैठकर आत्मनिष्ठ अनेक सभाएँ करता है। उस सरोवर का
जल अगाध है-उसको पार करके कोई जीव जा नहीं सकता॥
किस दिशा में नागिन रस से रुष्ट रहती है, किस दिशा में सरोवर सूखा रहता है। उस सरोवर के
मध्य में सुकीर्ति धर्मी सत् निवास करते हैं। काले कमल में यहाँ काल निवास करता है॥
घट रामायण / ४५
अष्ट कमल में नागिन रसरुष्ट रहती है-सरोवर कमल के वियोग में सूखा रहता है। मैंने इस 'सत'
रीति का द्वार दरसाया है-अब आगे जो मैं कहता हूँ, हे भाई! तुम सुनो॥
उस सरोवर के आगे वृक्षों के अनेकभेद हैं-इनमें से चार वृक्षों पर सुरति संभली हुई हैं। जीव वहाँ
प्रवेश करके आगे का मार्ग प्राप्त करता है और वह (आगे) गगन कमल के भीतर प्रवेश कर जाता है॥
यह चक्र उलटकर शून्य में चक्कर लगाता है (दौड़ता है) और वहाँ सिद्ध एवं साधक ध्यान
लगाते हैं। वहाँ स्थित उन चार वृक्षों के विषय में मैं समझा कर कहता हूँ-मैंने स्वयं वहाँ जाकर उनके
नाम, स्थान तथा स्वरूप ज्ञान का गान किया है॥
जहाँ कुछ समय तक कागभुशुण्डि रहे हैं-वे वट, पीपल, पाकर एवं आम्रवृक्ष हैं। कागभुशुंडि की
काया के मध्य में तन, मन एवं वृक्ष तीनों को सन्तों ने समझाया है।।
इस वृक्ष के ऊपर एक एक सरोवर शोभित है-और उसे देखते ही काल की सम्पूर्ण कलाएँ
भागकर (तिरोहित हो) जाती हैं।
॥ सोरठा ॥
बिरछा ऊपर ताल, जहाँ काल करकै नहीं।
तुलसी संत दयाल, दिया भेद भिनि भिनि लखा॥
अर्थ-चारों वृक्षों के ऊपर सरोवर है, जहाँ काल हिल नहीं सकता (करके नहीं)। तुलसी साहब
कहते हैं कि दयालु संतों ने यह भेद दिया (बताया) है, उसे भिन्न-भिन्न रूपों में देखा भी है॥
॥ कहेरा ॥
सखी री बिरछ पै ताला, जहँ करकै न काल।
बिरछा के जड़ नहिं पाती, वा की दुरि दुरि१ डाल ॥ टेक ॥
सर मैं सुरति न्हावावई, कागा किये हैं मराल।
संतों पंथ पिया पाये, गुरु भये हैं दयाल ॥ १ ॥
अठमें अटारी माहीं, परे सुनि पिया हाल।
हरखा बंक सुर नाला, चढ़ी चट चट चाल ॥ २ ॥
सुरति गगन घन छाई, पिया परे परे ख्याल।
तुलसी तरक तत तारी, भारी काटी भ्रम जाल ॥ ३ ॥
अर्थ-हे सखी! इन वृक्षों के ऊपर एक सरोवर है-जहाँ काल भी हिलडुल नहीं सकता। इस वृक्ष
की न जड़ है, न पत्ता है-उसकी झुकी-झुकी डालियाँ हैं ॥ १ ॥
इसी सरोवर में मैंने सुरति को स्नान कराया, इसने इस काग शरीर को हंस बना दिया। संतों के इस
मार्ग पर मैंने पति आत्मब्रह्म को प्राप्त कर लिया-मेरे गुरु कितने दयावान् हो गए ॥ २ ॥
आठवीं अटारी पर मेरी आत्मा का समाचार सुनो। उसमें जाने पर बंक नाल हर्षित हो उठा और
आत्मा आगे चटाचट चाल से चढ़ती गई ॥ ३ ॥
सुरति में शून्याकाश की गहन छाया छा गई और मेरे पति (आत्म ब्रह्म) उसी में अनुरक्त है। तुलसी
साहब कहते हैं कि तत्काल ही उस परम तत्त्व ने उनके भारी भ्रमजाल को काटकर मुझे मुक्त कर
दिया ॥ ४ ॥
१. झुकी हुई।
४६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
कहों अब बिधि बरतंत, संत कहनि मन मत गही।
लही जो तुलसी अंत, ज्ञान चक्र चित चेति कै ॥
अर्थ-मैं अब विधिपूर्वक समस्त वृतान्त ( बरतंत ) का वर्णन करता हूँ क्योंकि मेरी मति 'सत' कहने
के प्रति प्रतिबद्ध हुई है। चित्त में ज्ञान चक्र को समझकर तुलसी साहब ने जो कुछ कहा है, वही उनकी
परमार्थ ज्ञान की प्राप्ति का अन्तिम सत्य है ॥
॥ चौपाई ॥
अब सोई बिधि बरतंत सुनाऊँ। राह रीति मन मत दरसाऊँ ॥
मन मत चक्र घेर के मारा। ज्ञान चक्र जब जीव सम्हारा ॥
काल मारि मुख फेरि चलावै। काल भागि त्रिकुटी में आवै ॥
जीव सब्द गहि खेदि चलाई। अधर कँवल बिच काल छिपाई ॥
भर्म चक्र जब काल चलावा। भरमित जीव भरम जब आवा ॥
संसय सोग जीव उपजाई। साहेब सब्द बिसरि गयो भाई ॥
भगिया जीव गगन मग माहीं। यह कोड काल गहैगो नाहीं ॥
जीव वहाँ से निसरि पसाई। नाल बंक में जाइ समाई ॥
बंकै नाल काल गति लइया। जीव भागि आगे चलि गइया ॥
परम कँवल में जीव छिपाना। वहाँ काल जो जाइ समाना ॥
सोला गगन जीव फिरि आई। तहाँ काल पुनि खेदत धाई ॥
अर्थ-अब मैं उसी प्रकार वृत्तान्त सुनाता हूँ तथा मन की गति के अनुसार मार्ग तथा इस साधना की
प्रणाली का वर्णन करता हूँ। जब से जीव ने ज्ञान चक्र को सम्भाला, तभी से अज्ञान को (मन गति) को
चक्र से मार कर नष्ट कर दिया ॥
काल को मार कर पुनः मुख दूसरी तरफ करके उस चक्र को चलाया गया। भयवश काल भाग
कर त्रिकुटी में छिप गया ॥ जीव ( अज्ञानी जीव ) को पकड़कर पुनः उस पर चलाया गया। अधर कमल
के बीच पुनः काल जाकर छिप गया ॥
जब काल ने भ्रम चक्र चलाया-भ्रमित जीव, उस समय भ्रमवणित हो उठा। जीव में उस समय
संशय योग उत्पन्न हुआ और वह जीव साहेब ( परमात्मा ) शब्द भूल गया ॥
जीव भाग कर पुनः गगन में गाया और बोला इस काल को कोई नियंत्रित करेगा (गहौंगो) या
नहीं। जीव वहाँ से भागा और नाल बंक में जाकर घुस गया ॥
काल की गति ने बंकनाल को भी वश में ले लिया फलतः जीव भाग कर आगे चला गया। परम
कमल में जीव जाकर छिप बैठा-वहाँ भी काल जाकर समा गया। सोलह आकाशों में जाकर जीव
भागकर लौट आया और वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ वहाँ काल उसे खदेड़ता रहा ॥
॥ सोरठा ॥
सोला गगन मँझार, जीव काल खेदत फिरै।
बूझै बूझनहार, घट निहारि अंदर लखै ॥
घट रामायण / ४७
अर्थ—सोलह आकाशों के मध्य में जीव को काल खदेड़ता फिरता रहा। अपने घट के अन्दर देखो,
इसे समझो, कोई बूझने वाला ही इसे बूझता है॥
॥ चौपाई ॥
वहाँ जीव कोइ बचन न पावै। रहस नाल जिव पैठि समावै॥
वहँ कहुँ काल सुनन जब पावै। समाधान होइ काल सिधावै॥
रहस नाल से भागि पराई। भँवर गुफा में जाइ छिपाई॥
आपै काल ध्यान धर कीन्हा। अपनी सुरति गुफा में दीन्हा॥
सूरति जीव काल पर आवै। काल आप पर ध्यान लगावै॥
अपनी सुरति गुफा में लावै। भीतर सुरति जीव समावै॥
अपना घर बिधि काल न पावै। पीछे काल तहाँ लगि धावै॥
तब लग काल जीव को घेरा। घर सुधि बिन जो फिरै अनेरा॥
धनि वे जीव आप को जानी। उलटि काल को बाँधै तानी॥
जानै जीव जो नाम सहाई। नाम निअच्छर जाइ समाई॥
पुरुष नाम जीव लखि पावै। जीव नाम लखि ब्रह्म कहावै॥
नाम छाँड़ि जग जीव कहाये। भरम भरम भौसागर आये॥
अभि अंतर जिव पैठे जाई। राई के दस भाग समाई॥
अंतर काल बड़ा मग लागा। एक राई का दसवाँ भागा॥
अंतर बड़ा जीव को सोका। काल की आँखि तीनों लोका॥
जीव की आँखि पुरुष को देखा। काल दृष्टि जब होय बिसेषा॥
आँखी जीव चकोर समाना। पाँचों करै दृष्टि जस बाना॥
धरती दृष्टि प्रकिरती उद्गा। दृष्टि अकास करै नर मुद्रा॥
तत्त पाँच पाचौं हैं नारी। बचै नाम निज सुरति बिचारी॥
अर्थ—वहाँ कोई जीव बचने नहीं पाता। जीव रहस्य नाल में प्रवेश करके उसी में समा जाता
(समावै) है। जब वहाँ स्थित जीव के विषय में सुन पाता है तो सावधान होकर काल चल देता है॥
जीव रहस नाल से दौड़ भागता है और भ्रमर गुफा में जाकर छिप जाता है तब काल स्वयं का ही
ध्यान धारण करके अपनी सुरति गुफा में देता है॥
सूरति समाधि में जीव भी काल पर आता है और काल भी स्वयं पर ध्यान लगाए हुए हैं। काल
अपनी सुरति गुफा में लगाए हुए हैं और गुफा के भीतर जीव सुरति ध्यान में खो गया है। विधाता का
काल अपना घर यहाँ नहीं पाता—पीछे-पीछे यद्यपि काल यहाँ तक दौड़ा (आया है)॥
तभी तक काल जीव को घेरता है—जब तक अपने घर (भ्रमर गुफा) की याद के बिना अकेला
(अनेक) घूमता रहता है। वह जीव धन्य है—जिसने अपने को जान लिया है, वह जानने वाला जीव
उलट कर काल को ही कस कर बाँध लेता है॥
अपनी सहायता करने वाले का नाम जीव जब जान लेता है, तब वह उसी अक्षरविहीन नाम में
आकर समा जाता है। मनुष्य नाम से जीव की प्रतीति होती है—जीव ब्रह्म का नाम जानकर ब्रह्म
कहलाता है॥
४८ / घट रामायण
ब्रह्म का नाम छोड़कर मनुष्य इस संसार में जीव कहा जाता है और अनेक योगियों में भ्रमण करता
हुआ वह भवसागर में रहता है॥ ब्रह्म के अभ्यन्तर में जीव जाकर उस प्रकार बैठ जाता है, जैसे राई
(छोटी सरसों) के दसवें भाग में समा गया हो॥
यह एक राई का दसवाँ भाग अपने अन्तर काल में एक लम्बा रास्ता-सा लगता है। इस बड़े अन्तर
को देखकर जीव को बड़ा शोक होता रहता है-तीनों लोक तो काल की आँखें हैं॥
जीव की आँखें उस समय पुरुष को देखती रहती हैं क्योंकि अब काल की दृष्टि विशेष हो गई है-
वह पुरानी दृष्टि नहीं रह गई है। जीव की आँख में चकोर (प्रभु संसक्ति हो गई) समाविष्ट हो गया और
पाँचों इन्द्रियाँ दृष्टि (देखते) जैसा व्यवहार (बाना) करने लगती हैं॥
प्रकृति में आवेग (उद्गा) आ गया, पृथ्वी दृष्टिमती हो गई और यह दृष्टि शून्याकाश में मनुष्य जैसी
मुद्रा करने लगी। पंच तत्त्व पाँचों नारी जैसे प्रभु में समर्पित हो उठे और मूरति साधना के बीच केवल
नाम ही बच पाता है॥
॥ दोहा ॥
काल करै जिव हानि, तुलसीदास तत सम रहौ॥
घट रामायन सार, मथि काया बिच घट कह्यो॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि काल ही जीव की हानि कर सकता है, अतः तत सम (संसक्ति
रहित निरपेक्ष) होकर जीवन यापन करो। इस घट रामायण में काया के बीच पिंड को मथकर तत्त्व-
चिन्तन किया गया है-(उसे समझो)॥
॥ सोरठा ॥
भिनि भिनि कहौं बखान, आदि अंत घट भेद बिधि॥
तुलसी तनहिं बिचार, घट निरखो निज नैन से॥
अर्थ-पिंडभेद के विधियों को आदि से अन्त तक भिन्न भिन्न रूपों में बताया गया है। तुलसी साहब
कहते हैं कि शरीर पर विचार करते हुए अपने नेत्रों से इस पिंड को देखो॥
॥ चौपाई ॥
आगे घट का भेद बखाना। बतिस नाल घट भीतर जाना॥
नाल भेद बिधि कहौं बुझाई। जिन जानी घट परचे पाई॥
अर्थ-आगे घट में भेदों का वर्णन किया गया है। इस घट के भीतर बत्तीस नाल जानिये। मैं
समझाकर नाल भेद विधिपूर्वक कहता हूँ। जिन्होंने इसे जाना, उसे घट का परिचय प्राप्त हो गया।
॥ नाल के नाम – चौपाई ॥
प्रथम नाल की बिधी बताऊँ। अभया तेज ताहि कर नाऊँ॥
दूसर रहस नाल जो गावा। चौदल कँवल फूल तेहि ठाँवा॥
कँवल चार दल भँवर उड़ाना। चढ़ि अकास बिधि जाइ समाना॥
कनक नाल तीसर कर नामा। चौंसठ जोगिनि बसै तेहि ठामा॥
चौथी नाल बिकट थिर थाना। कोठा नाल बहत्तर जाना॥
धुन्धर नाल पाँचवीं होई। काल सिंहासन बैठा सोई॥
छठवीं नाल रूपरम नामा। निरगुन रूप बसै तेहि ठामा॥
घट रामायण / ४९
नाल सातवीं सेत बताई। गन की कला बसै तेहि माईं॥
नाल आठ अभया मत नाँऊँ। कामिनि चारि बसै तेहि ठाऊँ॥
नाल मुकरमा नौवीं नामा। द्वादस दूत बसै तहि ठामा॥
हरि संग्रह दसवीं दरसाई। लछमन राम बसै जेहि माईं॥
मुक्तामनि एकादस सोई। कलसर दूत बैठ बल जई॥
द्वादस नाल पोहप पट माईं। नभ नल द्वार सब्द गोहराई॥
तेरहवीं नाल निकट नट नौली। बचन बिदेह बाक बिन बोली॥
चतुरदसि नाल नटवर नामा। मेधा छपन कोटि बिसरामा॥
पंद्रा गगन नाल निरबानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
सोला सुखमनि नाल कहाई। सुकिरत सेत बसै तेहि ठाईं॥
सत्रह नाल अनूप अचीन्हा। अंडा बिदित बिस्व रचि लीन्हा॥
अठारा नाल बिमल सुर ज्ञानी। तैंतिस कोटि देव दरबानी॥
उन्निंस नाल भँवर मन्दा की। अंडा कुम्भ रहै मन छाकी॥
बिसवीं नाल अजोरक माली। सूरत सब्द सेत चढ़ि चाली॥
इक्विस नाल हंसदे नाऊँ। मुक्ता मानसरोवर ठाऊँ॥
बाइस नाल सत अंकित होई। बन अशोक सीता जहँ होई॥
तेइस नाल नगर एक बाटा। जहाँ को जम रोकै नहिं घाटा॥
चौबिस बिखम नाल निजधामा। गुंजे भँवर कंज के ठामा॥
पच्चिस नाल पदम सुर सोई। पचरँग रूप जहाँ नहिं होई॥
छबिस नाल गढ़ गोधर नाईं। अटक पार चढ़ फटक समाई॥
सताइस नाल त्रिकुट पर लंका। जहँ रावन बसै ब्रह्म निसंका॥
अठाइस सेत द्वार दुरबीना। समुन्दर सात पार कोइ चीन्हा॥
उंतिस नाल सिखर पर सैला। अच्छर अंदर अगम दुहैला॥
तिसवीं नाल अधर रस रोकी। जहाँ निरंजन बैठे चौकी॥
इकतिस सुरति कँवल अस्थाना। कोइ सज्जन सत साध बखाना॥
बत्तिस नाल सब्द सुन माईं। मुकर द्वार चढ़ि छूटै झाईं॥
बत्तिस नाली बरन अनूपा। सुर नर मुनि नहिं पाव भूपा॥
ये सब नाल चाल दरसाई। सो सब देखे घट के माईं॥
जिनके नाम ठाम गुन बरना। कहै तुलसी संतन के सरना॥
बत्तिस नाल बरनि समझाई। वाकी मुनि हर एक रहाई॥
बंक नाल है वा को नाँवा। तीनों भवन भेद नहिं पावा॥
घट में बत्तिस नाल बखाना। काया सोध साध कोइ जाना॥
५० / घट रामायण
अर्थ-अब मैं प्रथम नाल के विषय में बताता हूँ, उसका नाम अभया तेज है॥ १॥ दूसरे नाल 'रह्म'
का जो गान करते हैं-उसके स्थान चार दल वाले कमल के फूल पर होते हैं॥ १॥ इसके चार दलों से
भ्रमर उड़ते हैं और वे आकाश में चढ़कर विधाना (ब्रह्मा) में प्रवेश कर जाते हैं॥ १२/२॥ कनक नाल
तीसरा नाम है-यहाँ चौंसठ योगिनियाँ निवास करती हैं॥
चौथा नाल विकट नाल है। उसका स्थान स्थिर है, और इसमें बहत्तर कोठा नाल हैं। पाँचवीं नाल
धुन्धुर नाल है और वह काल के सिंहासन पर बैठा हुआ है।
छठी नाल का नाम 'रूपरम' है-और यहाँ निर्गुण रूप का निवास होते होता है। सातवीं नाल मेन
बताई गई है, उसमें मन की समस्त कलाएँ निवास करती हैं॥
आठवीं नाल का नाम अभयामत है-जिसके पास चार कामिनियाँ निवास करती हैं। नवीं नाल का
नाम मुकरमा है, उसके पास बारह दूत निवास करते हैं॥
हरिसंग्रह दसवीं नाल कही गई है-जिसमें राम-लक्ष्मण बैठे हुए हैं। एकादश नाल मुक्तामणि है-
जहाँ कलसर दूत बलपूर्वक बैठे हुए हैं॥
हे सखी! बारहवीं नाल पोहप पट है, यह नाल द्वारा आकाश में शब्दों को बुझाता है। तेरहवीं नाल
नौली नाम की सन्निकट ही है-यह वचन विदेह एवं वाणी बिना बोली के हो जाया करती है॥
चौदहवीं नाल का नटवर नाम है, जहाँ छप्पन कोटि मेधा (प्रतिभा) विश्राम करती हैं। पन्द्रहवीं
नाल का नाम निरवानी है-जहाँ 'उल्टा कूप' का जल झर झर कर चूता रहता है॥
सोलहवीं नाल सुखमनि है-उस स्थान पर सुकीर्ति सेतु स्थित है-सत्रहवाँ नाम अनुपम एवं अर्चान्हा
है-जहाँ विश्व के समग्र ब्रह्मांड की रचना वर्तमान है॥
अठारहवीं नाल को देवगण 'विमल नाम से जानते हैं-जहाँ तैंतीस करोड़ देवता दरबानी करते रहते
हैं। उन्नीसवीं नाल 'भँवर मन्दाकी' है-जहाँ शरीर एवं पिंड एक होकर रहते हैं॥
बीसवाँ नाल अजोरक माली है-जहाँ सुरति शब्द सेतु तक चढ़, कर पहुँच गए हैं? इक्कीसवें नाल
का नाम हंसदेव है-वहाँ मुक्ता तथा मानसरोवर दोनों हैं॥
बाइसवीं नाल 'सत अंकित' है-जहाँ अशोक वन में सीता है। तेइसवीं नाल नगर में 'एक बार' है-
जहाँ यमराज कोई मार्ग नहीं रोकता। चौबीसवाँ, विषम नाल है-जहाँ उसके धाम में कमल के पास
भ्रमर गुंजरित होते रहते हैं॥ पच्चीसवाँ नाल पद्म सुर है-जहाँ पंचेन्द्रियों वाले रूप नहीं होते॥
छब्बीसवें नाल का नाम गोधरगढ़ है-जहाँ खाइयों का अवरोध पार करते ही शून्य द्वार (फाटक)
में समा जाते हैं। सत्ताइसवीं नाल त्रिकुटी पर है, लंका उसका नाम है- जहाँ रावण ब्रह्मा से निर्भय नि-
शंक भाव से निवास करता है॥
अट्ठाइसवाँ द्वार श्वेत द्वार है-जहाँ दूरबीन है और वहाँ से सात समुन्दर पार स्थित किसी को पहचान
लेता है। उन्नीसवाँ नाम 'शिखर पर शैल' है जो अन्तर बिना अक्षर (नाम का) दुर्लभ तत्त्व है॥
तीसवाँ नाल 'अधर रस' के रूप में रोकी हुई है-जहाँ निरंजन ब्रह्म चौकी पर बैठे हुए हैं।
इकतीसवीं नाल सुरति स्थान पर है-जिसका वर्णन कई सज्जन या साधुजन ही कर सकता है॥
हे सखी! बत्तीसवें नाल के शब्दों को सुने-वह मुकुट पर लगी हुई झाईं की भाँति हैं-जो उस पर
चढ़ने से छूटती है।
बत्तीसवाँ नाल अनुपम वर्णन का है-उसे कोई देवता, मुनि या राजा नहीं पा पाते॥
इन समस्त नालों की अवस्थाओ को मैंने बताया है-इन्हें सभी साधक अपने शरीर के भीतर देखते
हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि संतों की शरण में रहकर मैंने इनके नाम, स्थान तथा गुणों का वर्णन
किया है॥
मैंने बत्तीस नालों का वर्णन करके समझा दिया है। शेष मुनियों द्वारा वर्णित 'एक नाल' अपहृत है।
उसका नाम बंक नाल है। तीनों लोकों में उसका रहस्य समझा नहीं जा सका है॥
घट रामायण / ५१
इस पिंड के अन्तर्गत मैंने बत्तीस नालों का वर्णन किया है कोई साधु ही अपनी काया (पिंड) का
शोधन करके इसे समझ सकता है ॥
॥ दोहा॥
बत्तिस नाल निहारि कै, तुलसी कहा बिचारि ॥
घट घट अंदर देखि कै, साध करै निरवार ॥
अर्थ-बत्तीस नालों को देखकर तुलसी साहब ने उसे विचार करके बताया है। इन्हें पिंड-पिंड के
अन्दर देख करके साधुजन इनका निर्धारण करेंगे ॥
॥ चौपाई ॥
सत्त बचन साधू परमाना। भीतर भेद सत्त पहिचाना ॥
काया खोज नहीं जिन पाया। जाके सदा हिये तम छाया ॥
काया खोज किया नहि भाई। सुकदेव रहे भूल के माइ॥
ब्यास जनक नारद नहिं पाई। कथि पुरान आतम गति गाई ॥
अर्थ-सत्य वाणी के लिए साधुजन ही प्रमाण हैं। पिंड के भीतर के भेद ही सत्य की पहचान है।
जिसने इन तत्त्वों को शरीर में खोजकर नहीं प्राप्त किया-उनके चित्त पर सदैव अंधकार छाया रहेगा ॥
हे सखी! जिन्होंने काया में इसकी खोज नहीं की, ऐसे शुकदेव भूल में पड़े रहे। व्यास, राजा जनक
तथा नारद ने भी इसे प्राप्त नहीं किया और पुराणों का कथन करते हुए आत्मा के ज्ञान को गाते रहे ॥
॥ दोहा ॥
ज्ञानी भूले भर्म में, परम हंस ब्रह्मचार।
सास्तर संघ बिचारिया, बहै कर्म की धार ॥
अर्थ-परम सिद्ध (हंस) के ब्रह्माचरण को ज्ञानी भ्रम में पड़कर भूल गए। वे उसे शास्त्रों में विचार
करते हुए कर्म की धारा में बह गए ॥
॥ सुन्न भेद । चौपाई ॥
आगे कहो सुन्न बिस्वासा। बिना सुन्न गये जीव निरासा ॥
अब निज कहौं सुन्न में स्वाँसा। बिना सुन्न जिव काल निवासा ॥
सुन्न दिसा बिधि कहौं बुझाई। बूझै साध सुन्न जिन पाई ॥
बिरला सुन्न भेद को पावै। सुन्न दीप सोइ सब्द कहावै ॥
सुन्न की सोत धुन्न में लागी। धुन की सोत गगन में जागी ॥
गगन के ऊपर पवन रहाई। निरगुन पावन भवन के माई ॥
निरखि कँवल साधै कोइ साधू। मिटि जाइ काल कष्ट की ब्याधू ॥
मूल कँवल के ऊपर देखो। घट में सत्त सब्द ले पेखो ॥
अष्ट कँवल ओंकार का बासा। सो निज बूझो काल तमासा ॥
षोड़स कँवल को ध्यान लगावै। जोगी करै भेद सोइ पावै ॥
पवन जोग-जोगी गति गाई। त्रिकुटी निज धुनि कँवल कहाई ॥
मन थिर होइ सुरति ठहरावै। त्रिकुटी कँवल पवन लै आवै ॥
५२ / घट रामायण
देखै अवर पवन हिये माई। चमकै जोति दृष्टि में आई॥
जीव पवन जब चलै अघाई। सेत पवन से मारि चलाई॥
करिया पवन भई बलहीना। नाखौ पवन जीव जब चीन्हा॥
नाखौ पवन भरोसा मोरा। सेत कँवल से बाँधौ डोरा॥
सेत कँवल सुकिरत की होई। सत मत द्वार जानिये सोई॥
सत्त सुकृत की एकै बानी। ताकी गति बिरलै पहिचानी॥
कदली सब्द लाभ जिन देखा। मुक्ति अमी तहँ पियै अलेखा॥
जहाँ निरंजन बसै निदाना। सहस कँवल जोगी बिधि जाना॥
द्वादस आगे इमृत बासा। निगुरा नर सो मरै पियासा॥
सगुरा होइ सोई निज पावै। भर-भर मुख इमृत भल खावै॥
पीवै अमी लोक को जाई। घट भीतर निज खोज लगाई॥
पाँजी खोज हाथ अनुसरई। सो जिव सहजै से भौ सरई॥
झिलिमिल झरै सुन्न के माहीं। गंगा जमुना सरसुति राही॥
गङ्गा जमुना सरसुति होई। तिरबेनी संगम है सोई॥
त्रिकुटी संगम बेनी घाटा। बसै जीव सत पावै बाटा॥
बंक नाल होइ गंगा जाई। जमुना सुन्न गुफा से धाई॥
सरसुति सेत कँवल से आई। मन जोगी बिधि बास कराई॥
गंगा गहै करै असनाना। जमुना दूरि मुक्ति कर थाना॥
तीनौ नदी तीनि हैं धारा। आप आप में देखि निहारा॥
यह तीनों हैं अगम अपारा। बिरले साधू उतरै पारा॥
तिन में रहै त्रिभवनी घाटा। ब्रह्मा बिसनु न पाँवै बाटा॥
संकर जोगो सिद्ध अनूपा। उनहूँ न पायौ आपन रूपा॥
निराकार अभि अंतर भाई। ता का भेद कहूँ समझाई॥
सुरति निरति करि खोजै आपू। सुन्न सिखिर चढ़ि खैंचै चाँपू॥
महि ऊपर ब्रहांड की तारी। द्वै पट भीतर सुरति सम्हारी॥
दहिने बाँयें सिला पहारा। जहँ की बाट न कोइ निहारा॥
जहँ सत द्वार बैठ सत यारा। अगम अगाध अजर का द्वारा॥
इमृत पीवें जीव बिचारा। जा से कटै काल की जारा॥
अर्थ—आगे मैं शून्य के विषय में वर्णन करता हूँ। बिना शून्य में प्रवेश के जीव निराश रहता है। अब
अपने शून्य में स्थित श्वास का वर्णन करता हूँ। बिना शून्य के जीव का काल में निवास है॥
मैं शून्य की दिशा को विधिपूर्वक समझाता हूँ। जिन साधुओं ने शून्य को प्राप्त कर लिया है, वे इसे
समझेंगे। बिरला साधु ही शून्यभेद को समझता है। शून्य दीप में स्थित 'सोऽहम्' शब्द ही 'सबद' के नाम
से पुकारा जाता है॥
घट रामायण / ५३
शून्य का स्रोता ध्वनि में लगता है, ध्वनि का स्रोत आकाश में जाता है। आकाश के ऊपर वायु है
और इस प्रकार मूलभवन में निर्गुण वायु है॥
वहाँ आकाश में कमल देखकर कोई-कोई साधु उसे साधता है और उससे काल कष्ट की व्याधि
मिट जाती है। उस कमल के मूल के ऊपर इस पिंड में स्थित 'सत' शब्द को लेकर देखो॥
अष्ट कमल दल में ॐकार का निवास है। उसे काल की क्रीड़ा समझो। इसके बाद षोड्श कमल
का ध्यान लगाओ-योगी जन स्वार्थ तथा परमार्थ में जो भेद करते हैं, वह उसे प्राप्त कर लेता है॥
पवन के योग का ज्ञान योगियों ने गया है। त्रिकुटी के बीच अपनी ध्वनि का श्रवण 'कमल' है। मन
को स्थिर करके यहाँ जो सुरति ध्यान को एकाग्र करता है, वह उस त्रिकुटी के बीच कमल-पवन में ले
आता है॥
हृदय में आए हुए अन्य पवनों को भी वह देखता है, और उस अपूर्व ब्रह्म की ज्योति दृष्टि में आकर
चमकती है। जीव पवन जब सन्तुष्ट (अघाई) हो जाए तो उसे श्वेत पवन से मार कर चला देना चाहिए।
करिया पवन जब बलहीन हो उठता है, तब नाखों पवन को जीव पहचानने लगता है। यही नाखों
पवन मेरा विश्वसनीय भरोसा है, यही श्वेत कमल से डोरी बाँधकर एकतान करता है॥
श्वेत कमल सुकीर्ति से सम्बद्ध है और वही 'संत' मत का द्वार है-संत द्वार एवं पुण्य की एक ही
भाषा है, उसका ज्ञान कोई विरला साधु ही जानता है॥
कदली वन में जिन्होंने 'शब्द' का लाभ पाया है-वही साधु अलक्ष्य मुक्ति रूपी अमृत का पान
करता है। जहाँ केवल (निदाना) निरंजन निवास करते हैं, वहाँ सहस्रार कमल है-जिसे योगी विशेष
योगविधि से जानते हैं॥
द्वादश कमल के आगे अमृत का वास है। गुरुविहीन व्यक्ति यहां प्यास से मरता रहता है। जो
सतगुरु के साहचर्य में होगा, वही, निजत्व को प्राप्त करेगा-और वह मुख में पवित्र अमृत भर-भरकर
खाता रहता है॥
वह अमृत पीकर मुक्ति लोक को जाता है-(यह वह है) जिसे इसी घट के भीतर उसकी खोज की
है। जो अमृत (पाँजी) की खोज में निरन्तर हाथ फैलाए रहता है, वह जीव सहज भी भवसागर तर जाता
है॥
शून्य गगन में झिलमिलाता हुआ, वह झरता रहता है-'गंगा, यमुना' एवं सरस्वती का योगी राही है।
जहाँ गंगा, यमुना एवं सरस्वती है-वही त्रिवेणी का संगम है॥
त्रिकुटी में संगम की त्रिवेणी का घाट है-सत जीव वहाँ निवास करके मुक्ति मार्ग प्राप्त करता है।
बंकनाल से होकर गंगा जाती हैं और शून्य गुफा में यमुना दौड़ती (बहती) रहती हैं॥
सरस्वती श्वेत कमल में आती हैं-योगी अपने मन को विधिपूर्वक वास कराता है। गंगा को ग्रहण
करके उसमें समान करोष यमुना तो दूर से ही मुक्ति की स्थान है॥
तीनों नदियाँ तीन धाराएँ हैं और इन्हें अपने-अपने पिंड में निहार कर देखो। ये तीनों अगम्य और
अपार हैं, विरले साधुजन ही इन नदियों के पार उतरते हैं।
इन तीनों त्रिभवनी घाट है-जहाँ ब्रह्मा तथा विष्णु भी मार्ग नहीं प्राप्त करते। शिव तथा अन्य अनूप
(विलक्षण) योगिजन ने भी अपने स्वरूप को वहाँ समझ नहीं पाए या देख नहीं पाये॥
हे भाई! वह सब निराकार रूप में अभ्यन्तर में वर्तमान है, उनका भेद मैं समझाकर कहता हूँ। सुरति
एवं निरति ज्ञान द्वारा स्वयं खोज करो और शून्य शिखर पर चढ़कर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ॥
वहाँ पृथ्वी के ऊपर ब्रह्मांड की ताली (तारी) है और दो कपाटों (पट) के भीतर सुरति ज्ञान
सम्हाली हुई है-उसके दाहिने बाएँ पत्थर की शिलाएँ तथा पहाड़ हैं-जिसमें स्थित मार्ग कोई नहीं देख
पाता॥
उस अगम्य, अगाध, अमरणधर्मा के शत द्वार पर जहाँ 'सत' में समाविष्ट योगिजन (यारा) बैठे हैं।
वहीं यह बेचारा जीव अमृत पान करता है; जिससे काल का जंजाल (जारा) कट जाता है॥
५४ / घट रामायण
॥ दोहा ॥
जोग बिधी बेनी कही, सुन्न जोग बिधि गाड़।
काल कला परचंड यों, ठग ठग सब को खाड़॥
अर्थ- योग विधि से त्रिवेणी बताई गई है, और वहीं शून्य योग विधि भी गाकर बताई गई है। काल
की प्रचंड कलाएँ इस प्रकार (जो इनके ज्ञान से अपरिचित हैं) ठग-ठग कर सबको खाती रहती हैं॥
॥ चौपाई ॥
अब बेनी संतन की गाऊँ। या से भिन्न भेद दरसाऊँ ॥
संतन की बेनी बिधि न्यारी। तुलसी भाखी देख निहारी ॥
अगम द्वार बेनी असनाना। सो बेनी संतन की जाना ॥
मंजै जोड़ अगम गति जानी। वह प्रयाग सब संत बखानी ॥
अर्थ-अब संतों की त्रिवेणी का वर्णन करता हूँ। पूर्व कथित त्रिवेणी से भिन्न उसके भेद का वर्णन
करता हूँ। संतों की त्रिवेणी प्रक्रिया विलक्षण है। तुलसी साहब कहते हैं कि उनको मैंने भलीभाँति निहार
कर देख लिया है॥
अगम द्वार पर त्रिवेणी का स्नान है, वही सन्तों की त्रिवेणी समझो। जो उस अगमन की गति जानता
हैं, वही वहाँ स्नान करता है, उस प्रयाग का वर्णन सारे सन्तगण करते हैं।
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अपार, जहँ बेनी मंजन कियौ।
सतगुरु पदम प्रयाग, करि अगाध गति जिन कही॥
अर्थ-जहाँ त्रिवेणी में स्नान किया, वह अगम्य तथा अपार हैं-मेरे सद्गुरु ही मेरे पद्म प्रयाग हैं।
जिन्होंने प्रयाग की अगाध गति का वर्णन किया है॥
॥ चौपाई ॥
अब तेहि राह रीति दरसाऊँ। भिनि भिनि पंथ मता गति गाऊँ ॥
सरगुन से निरगुन बिधि बानी। भिनि भिनि राह रीति सब छानी ॥
परथम दृग दुरबीन लगावै। मन चित सुरति ताहि पर छावै ॥
देखै ता के बीच मँझारा। जगमग जोति होत उजियारा ॥
निरखा निरगुन पुरुष निहारा। जहवाँ सुनै सब्द झनकारा ॥
सेत दीप जिव पहुँचै पारा। कोटिन काल भये जरि छारा ॥
अर्थ-अब मैं उस मार्ग की रीति का वर्णन करता हूँ-इससे जुड़े भिन्न-भिन्न पंथ और मतों की गति
का गान कर रहा हूँ। सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म की व्याख्या भिन्न है- उनके भिन्न मार्ग हैं तथा रीति
अलग-अलग कही गई हैं॥
सर्वप्रथम अन्तः दृगों में दूरबीन लगाओ और साधक के मन, चित्त एवं स्मृति उस पर छा जाए। तब
उसके मध्य उस ज्योति को देखें-जिसमें ज्योति जगमगा रही है-उजाल हो रहा है॥ २ ॥
वहाँ न्यारा निर्गुण पुरुष को मुक्त साधक ने देखा, और वहाँ अनाहद नाद की झंकार का शब्द
सुने। जीव संतों के द्वीप में उस पर पहुँचता है-जहाँ कोटि-कोटि काल जल कर छार हुए हैं॥ ३ ॥
घट रामायण / ५
॥ दोहा ॥
निरगुन ज्ञान बिचारिया, सुरति राखिये पास।
तुलसीदास जहँ बासकर, जीव न जाइ निरास॥
घट रामायन सार, यह घट माहिं घटाइया।
घट का मथन बिचार, भिन्न भिन्न करि डारिया॥
अर्थ-सुरति को अपने पास रखकर उसके द्वारा निर्गुण ज्ञान को देखें। तुलसी साहब कहते हैं, वहाँ
निवास करो-जहाँ उसके पास कोई जीव न जा सके ॥
यह घट रामायण का सार तत्त्व है और इसे घट रामायण पर घटाया गया है-इस घट के विचार
मंथन ने इसके स्वरूप को भिन्न-भिन्न कर डाला है।
॥ सोरठा ॥
निरगुन निरखि निहारि, ता से गुरुपद भिन्न है।
चौथे पद जद जाइ, पद प्रयाग सतगुरु लखै॥
अर्थ-निर्गुण ब्रह्म को भलीभाँति निरख कर देखो, सद्गुरु उससे भिन्न है यदि चौथे पद पर पहुँचौं
तब सतगुरु का चरण रूपी प्रयाग दिखाई पड़ेगा॥
॥ दोहा॥
तीन लोक के माहिं, निरगुन सरगुन रचि रह्यौ ॥
सतगुरु इनके पार, सो तुलसी घट लखि पर्यौ ॥
अर्थ-तीनों लोकों के बीच में निर्गुण तथा सगुण रचा हुआ है-सतगुरु इनके उस पार हैं और वही
(सतगुरु) घट (पिंड) के भीतर भी दिखाई पड़ता है।
॥ छन्द ॥
घट भीतर जानी आदि बखानी। सुरति समानी सब्द मई॥
देखा निज नैना कहौं मुख बैना। सत्त नाम का मर्म यही ॥ १ ॥
नहिं राम अरु रावन यह गति पावन। अगुन सगुन गुन नाहिं कही॥
कहि अकथ कहानी अगम की बानी। बेद भेद गति नाहिं लई ॥ २ ॥
सुर नर मुनि ज्ञानी उनहुँ न जानी। पँडित भेष सब कहँ कही॥
तुलसी मत भारी यह गति न्यारी। बूझेंगे कोई संत सही ॥ ३ ॥
अर्थ-इस पिंड के भीतर आदि तत्त्व समाया हुआ कहा जाता है, और सुरति ज्ञान उसमें शब्द बनकर
छिपा हुआ है। मैंने उसे अपने नेत्रों से देखा है, मुख-वाणी से कहता हूँ-यही सत्यनाम का मर्म है॥ १॥
यह राम और रावन नहीं है, यह अध्यात्म की पवित्र गति (ज्ञान) है-इसे अगुण, सगुण एवं गुण
रूप नहीं कहा गया है। इसकी कथा अकथ्य है, यह अगम्य वाणी है, वेद ने इस भेद के लक्षणों को
नहीं माना है॥ २ ॥
देवता, मुनि, ज्ञानी मनुष्य आदि ने उसके ज्ञान को नहीं समझा है। नाना भेषधारी पंडितजन भी जो
कहा गया है, उसी को ही कहते हैं, तुलसी साहब कहते हैं कि यह मत सर्वाधिक भारी (गम्भीर) है,
उसका ज्ञान विलक्षण है, उसे कोई संतजन ही सही-सही समझेंगे ॥ ३ ॥
५६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
आदि अंत का भेद, तुलसी तन भीतर लखा।
सुरति सब्द परकास, ज्यों अकास सर सैल करि ॥
अर्थ-उसके आदि और अन्त के रहस्य को तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने पिंड के भीतर देखा है-
जैसे शून्याकाश सरोवर एवं पर्वत है, ठीक उसी प्रकार सुरति शब्द का प्रकाश है। हे सन्तगण! आप
लोग उसका आनन्द लें।
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भेद कहों अनुसारा। लेकर ज्ञान बान भ्रम जारा ॥
ज्ञान रतन की आँखी होई। जब जम जाल देखिये सोई ॥ १ ॥
सत मत गत अभि अंतर देखै। तत मत अष्ट कँवल में पेखै ॥
सुरति सुहागिन होइ अगमानी। तुरतैं मिली सत्त की बानी ॥ २ ॥
अरध उरध बिच बैठे माधो। तत उनमुनी लगाइ समाधौ ॥
तारी उलटि तत्त में लावै। रहस नाल मधि जाइ समावै ॥
तुलसी मुद्रा जोग समाधा। आगे भाखों भेद अगाधा ॥ ३ ॥
अर्थ-अब मैं भेदों के अनुसार वर्णन करता हूँ। ज्ञान के गण को लेकर समस्त भ्रमों को जला
दिया। ज्ञान आध्यात्मिक रत्न की आँख है। उससे देखना हो तो यम के माया जाल को देखा जा सकता
है ॥
सत्यमत के ज्ञान को अभ्यन्तर में योगिजन देखते हैं- उस मत को पिंड के अन्तर्गत अष्ट कमल में
भी देखते हैं ॥ सुरति रूपी सौभागिंनी आगे-आगे होकर तुरन्त ही सत्य की वाणी से मिल जाती है ॥
अर्ध एवं ऊर्ध्व के बीच ब्रह्म ( माधव ) बैठे हैं और उन्होंने अपनी उन्मनी समाधि भी लगा रखी है ॥
तालु ( तारी ) को उलटकर तत्त्व को मन में लाते हैं और रहस नाल में जाकर समा जाते हैं। तुलसी
साहब कहते हैं कि यही समाधि की योगमुद्रा है-आगे उसके अनन्त भेदों का वर्णन करता हूँ ॥
॥ दोहा ॥
तुलसी तन के माहि, पंथ भेद साधू सही ॥
तत मत तोल अँकाइ, घरघर जाइ जिन जिन कही ॥
अर्थ-साधुगण सही कहते हैं कि शरीर के मध्य में अनेक पंथभेद हैं। घर घर जाकर जिन सन्तों ने
जो-जो बताया है, उस उस तत्त्व का मूल्यांकन वहाँ किया जा सकता है ॥
॥ चौपाई ॥
ये सब काल जाल रस रीती। भौ कृत खान जानि जम प्रीती ॥
गगन के मँडल काल अस्थाना। पाँच भूत विधि जाइ समाना ॥
पाँच पचीस तीन मन मैला। सब जानौ वा को निज खेला ॥
काल जाल जग खाइ बढ़ाया। रिखी मुनी कोइ भेद न पाया ॥
उलटा चलै गगन को धाई। ता से काल रहै मुरझाई ॥
सतगुरु साहिब संत लखावैं। तब घट भीतर परचा पावैं ॥
घट रामायण / ५७
जो जेड़ मूल भेद दरसावै। तब घट में अबिनासी पावै॥
सतसँग भक्ति हृदे बिच आवै। जब सतद्वार अगम लखि पावैं॥
हिरदै सत्त रहे लौ लाई। सब्द द्वार चढ़ि काल गिराई॥
मुक्ति ज्ञान पावै अबिनासी। अगम ज्ञान संग मूल निवासी॥
यह कोइ बिरला साधू पावै। अबिनासी गति अगम लखावै॥
सतगुरु कृपासिंधु कोइ जागै। आवा गवन भर्म भौ भागै॥
कीन्ही अगम नाम स्रुति सैला। चीन्हा अगम निगम तिन खेला॥
अधर सिखर पर तंबू तानै। जहाँ से देखै सकल जहानै॥
ब्रह्मांड द्वार एक है नाका। गहि दुरबीन सुरति से ताका॥
मकर तार पावै वह द्वारा। ता पर सुरति होय असवारा॥
सुरति जात लागै नहिं बारा। चली सुरति भड़ नाम अधारा॥
तब पहुँचै इक्किसवें द्वारा। सुन्न से परे सब्द है न्यारा॥
सुरति सब्द में जाइ समानी। निर सब्दी गति अगम लखानी॥
जहाँ नहिं पहुँचै मुक्ति पसारा। सोइ है आदि पुरुष दरबारा॥
मुनि अचार पावै नहिं कोई। सब भौ भर्म रहा जग सोई॥
अर्थ—आध्यात्मिक रस से रिक्त ये सब काल के जाल हैं। ये संसार की भौतिक लोक रचना की
खानि हैं और इन सबमें यमराज की प्रीति है, ऐसा जानो॥ शून्याकाश मंडल पर काल का स्थान है और
पंचमहाभूत तत्त्व विधिपूर्वक उसमें जाकर समा गए हैं। पंच महाभूत तत्त्व, पच्चीस तन्मात्राएँ तथा तीनों
गुणों का मन यहाँ मैला हो गया है—तुम सब यह उसी निर्गुण ब्रह्म का ही खेल समझो॥ काल ने माया
जाल को खाकर उसे और बढ़ा दिया—कोई ऋषि, मुनि उसके भेद को न समझ सका॥
जब साधक उल्टीरीति (मनोन्मनी द्वारा) शून्याकाश की ओर दौड़ता है फिर वहाँ काल मुरझा जाता
है। साहब सतगुरु जब मार्ग दर्शन कराते हैं तब पिंड के भीतर स्थित संसार का परिचय होता है। जो भी
साधक इस मूल तत्त्व का भेद बताता है तभी इस घट के अन्तर्गत कोई संत अविनाशी तत्त्व (निरंजन-
ब्रह्म) का परिचय प्राप्त करता है। जब अगम्य 'सत्' द्वार दिखाई पड़ेगा, तभी सत्संगति तथा भक्ति
हृदय के बीच आएगी॥
यदि हृदय में सत्य की लौ लगाए रहोगे तो शब्द के द्वार से चढ़कर काल को गिरा दोगे (नष्ट कर
दोगे)। अगम्य ज्ञान के साथ का मूल निवासी अविनाशी मुक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। इसे कोई विरला
साधु ही प्राप्त करता है। सतगुरु की कृपा-सिन्धु से ही कोई जागृति प्राप्त करता है, वह शून्याकाश में
आता है, तब उसका समस्त अज्ञानजनित संसारिक भ्रम भाग जाता है।
नामरूपी सुरति पर्वत को उसने अगम्य बना दिया है किन्तु जिन्होंने उस अगम्य। सुरति ज्ञान (तत्त्व)
तथा शास्त्र के ज्ञान तत्त्व को पहचान लिया है, वहाँ वही क्रीड़ा करता है।
अधर-शिखर पर वह तम्बू तानता है और वहाँ से वह सम्पूर्ण जगत को देखता रहता है। ब्रह्मांड द्वार
पर एक नाका है- (केन्द्र स्थान) वहाँ से वह सुरति रूपी दूरबीन से ताकता है। उस द्वार पर मकर तार
हैं उस पर सुरति सवार होती है। सुरति के चढ़कर जाने में देर नहीं लगती। यह सुरति वहाँ जाकर नाम
का आधार बन जाती है। तब इक्कीसवें द्वार पर पहुँचता है, जहाँ शून्य के अनाहत नाद से परे एक
विलक्षण शब्द है। जो सुरति ज्ञान में जाकर समा जाता है, उसे शब्दहीन सृष्टि की अगम्यगति दिखाई
५८ / घट रामायण
पड़ती हैं। मुक्ति का फैलाव जहाँ नहीं पहुँच पाता, वही आदि पुरुष का दरबार है—कोई भी मुनि इस
दरबार का आचरण नहीं जान पाता और इस संसार का सम्पूर्ण मर्म उसी में खोया (विलीन) रहता है॥
भँवर गुफा मारग चढ़ि देखा। जहँ जिव सत्त सुरत का लेखा॥
सुन्न सुन्न सब करत बखाना। सुन्न भेद कोइ बिरले जाना॥
कहीं बिस्तार सुन्न की जोई। ज्यों गूलर फल कीट समोई॥
फल जेते तेते ब्रह्मांडा। दीप दीप फल फल नौ खंडा॥
सुन्न अंड की करी बखाना। कहै तुलसी कोइ साधू जाना॥
अर्थ—भ्रमर गुफा के मार्ग पर चढ़कर देखा—जहाँ भी सत्य है और केवल वहाँ सुरति का ही तत्त्व
(लेख) है। शून्य-शून्य सभी कहते हैं किन्तु शून्य का भेद कोई विरले ही जानते हैं।। अब विस्तारपूर्वक
शून्य जो है उसका अर्थात् शून्य का वर्णन करता हूँ। मनुष्य शून्य में उसी प्रकार सन्निहित है, जैसे गूलर
फल में कीट। गूलर में जितने फल हैं, उतने ही ब्रह्मांड हैं फल ही सारे द्वीप हैं और वही द्वीपों के
नवखंड हैं। उसी क्रम में मैं शून्य में स्थित अंड (पिंडों) का वर्णन करता हूँ तुलसी साहब कहते हैं, इसे
कोई साधु-जन ही जानता है॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी सुन्न निवास, सब्द बास जिन घर किया।
जिमि गूलर फल तासु, जग भिनि भिनि जेहि लखि परा॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि शब्द मूल के निवास को जिसने अपना घर बना लिया है, उसी का
निवास शून्य में है—जैसे गूलर के फल जिन्हें-भिन-भिन जैसे भी लख पड़ा हो॥
॥ छन्द ॥
भये सुन्न निवासी सब सुख रासी। सुरति बिलासी सब्द मई॥
अनहद हद पारा अगम अपारा। अमी सिंधु स्रुति जाड़ लई॥ १॥
देखा उँजियारा घट घट प्यारा। निरखि निहारा पार कही॥
तुलसी तुल जावै दस दिस पावै। सिंध फोड़ि असमान गई॥ २॥
अर्थ—शून्य निवासी साधु सभी सुखों की राशि बन जाते हैं, वे सुरति ज्ञान के विलासी तथा अनाहत
शब्द मय हैं। इस अनाहत नाद के पार अपार और अगम्य अमृत सिंधु है—जिसे सुरति में जाकर प्राप्त
करता है॥ १॥
चारों ओर घट-घट में प्यारा उजाला देखा उसे देखकर, दूर कहीं उसके पार देखा। तुलसी साहब
कहते हैं कि उसके पास (तुल) जाकर दसों दिशाओं को प्राप्त करता है—लगता है, यह मनोन्मनी सिन्धु
को फाड़कर आकाश में पहुँच गई है॥ २॥
॥ दोहा ॥
सुन्न महल अजपा जपै, समुँद सिखरि के पार।
टूटी गगन गिरा भई, सत्त सब्द झनकार॥
त्रिकुटी टाटी टूटि कै, सुन्न अंड भिनि बास।
घट भीतर परिचय भई, देखा अजर निवास॥
घट रामायण / ५९
अर्थ—समुद्र के शिखर के पार शून्याकाश में साधु का महल है और साधु जन यहां अजपाजाप
करते रहते हैं। यह शून्याकाश भी जब टूट जाता है, साधक की वाणी 'सत्य' शब्द की झंकार
(झंकृति) बन जाती है।
इस सिद्धावस्था में त्रिकुटी के टट्टर टूट कर शून्य पिंडाकाश में विचित्र सुगंधि से सुवासित
(भिनि) हो जाते हैं। इस घट के भीतर उस निरंकार से परिचय हो जाता है—इस प्रकार मैंने उस अजिर
ब्रह्म का निवास देखा है॥
॥ कँवल भेद॥ चौपाई॥
घट में सोधि कँवल जिन गाई। लखै कँवल बिरला कोइ भाई॥
अंकुर उतपति कँवल मँझारा। सत्त नाम पद तिनके पारा॥
ऊँच नीच परबत बिच बाटा। काल जहाँ रोकै नहिं घाटा॥
ता के दहिने मारग माई। दामिनि पाँच छेकि नियराई॥
देवै दानी दान चुकाही। पावै जीव अगम की राही॥
दानी कहै जीव सुनि बाता। बिना दान करिहौं मैं घाता॥
जब जिव कहै समझ सुन भाई। करौ घात केहि कारन जाई॥
अर्थ—इसी पिंड में अन्वेषण करके जिन्होंने कमल का वर्णन किया है, (वैसा वर्णन) कोई बिरला
बंधु ही कर सकता है। 'सत्तनाम' जिनके वश (पारा) में है, वे ही जानते हैं कि कमल के मध्य में
अंकुर की उत्पत्ति होती है। ऐसे जन, ऊँचे-नीचे पर्वत के बीच अपना सिद्धि मार्ग पा जाते हैं और वहाँ
काल घाट नहीं रोकता॥ हे सखी! उसी के दाहिने मूल मार्ग है, और वहाँ समीप आते ही पाँच बिजलियाँ
रास्ता रोक लेती हैं। यहाँ दानी साधु सर्वस्व दान चुकाकर, (वह जीव) अगम्य की राह प्राप्त करता है।
दानी कहता है कि हे जीव! मेरी बात तो सुनो-मैं बिना दान के घात करूँगा। तब जीव कहता है कि हे
भाई सुनो, किस कारण वहाँ जाकर घात करोगे?
॥ भेद पिंड और ब्रह्माण्ड का॥
अंतर गुफा तहाँ चलि जाऊँ। जहाँ साहिब के दरसन पाऊँ॥
पाँचौ नाम जीव जब भाखा। छठवाँ नाम गुप्त करि राखा॥
पाँचौ नाम काल के जानौ। तब दानी मन संका आनौ॥
निरगुन निराकार निरबानी। धर्मराय यों पाँच बखानी॥
जीव नाम निज कहै बिचारी। जानि बूझि दानी झख मारी॥
जाव जीव यह राह तुम्हारी। हम नहिं रोकैं बात बिचारी॥
पोचं पाँच हमहूँ सुनि पाई। हम नहिं निकट तुम्हारे आई॥
पोचं चोर रहे अलगाई। होइ निरभै जिव आगे जाई॥
आगे सात सुमेर उँचाई। नौ नाटक तापर रहैं भाई॥
नौ नाटक पूछन चले आगे। कहौ जीव केहि मारग लागे॥
हम यहि घाट बाट रखवारी। यहाँ न अदली चलै तुम्हारी॥
कहै जीव दृग दानी भाई। हम चलि जाइ नाम चित लाई॥