घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / ४५
अष्ट कमल में नागिन रसरुष्ट रहती है-सरोवर कमल के वियोग में सूखा रहता है। मैंने इस 'सत'
रीति का द्वार दरसाया है-अब आगे जो मैं कहता हूँ, हे भाई! तुम सुनो॥
उस सरोवर के आगे वृक्षों के अनेकभेद हैं-इनमें से चार वृक्षों पर सुरति संभली हुई हैं। जीव वहाँ
प्रवेश करके आगे का मार्ग प्राप्त करता है और वह (आगे) गगन कमल के भीतर प्रवेश कर जाता है॥
यह चक्र उलटकर शून्य में चक्कर लगाता है (दौड़ता है) और वहाँ सिद्ध एवं साधक ध्यान
लगाते हैं। वहाँ स्थित उन चार वृक्षों के विषय में मैं समझा कर कहता हूँ-मैंने स्वयं वहाँ जाकर उनके
नाम, स्थान तथा स्वरूप ज्ञान का गान किया है॥
जहाँ कुछ समय तक कागभुशुण्डि रहे हैं-वे वट, पीपल, पाकर एवं आम्रवृक्ष हैं। कागभुशुंडि की
काया के मध्य में तन, मन एवं वृक्ष तीनों को सन्तों ने समझाया है।।
इस वृक्ष के ऊपर एक एक सरोवर शोभित है-और उसे देखते ही काल की सम्पूर्ण कलाएँ
भागकर (तिरोहित हो) जाती हैं।
॥ सोरठा ॥
बिरछा ऊपर ताल, जहाँ काल करकै नहीं।
तुलसी संत दयाल, दिया भेद भिनि भिनि लखा॥
अर्थ-चारों वृक्षों के ऊपर सरोवर है, जहाँ काल हिल नहीं सकता (करके नहीं)। तुलसी साहब
कहते हैं कि दयालु संतों ने यह भेद दिया (बताया) है, उसे भिन्न-भिन्न रूपों में देखा भी है॥
॥ कहेरा ॥
सखी री बिरछ पै ताला, जहँ करकै न काल।
बिरछा के जड़ नहिं पाती, वा की दुरि दुरि१ डाल ॥ टेक ॥
सर मैं सुरति न्हावावई, कागा किये हैं मराल।
संतों पंथ पिया पाये, गुरु भये हैं दयाल ॥ १ ॥
अठमें अटारी माहीं, परे सुनि पिया हाल।
हरखा बंक सुर नाला, चढ़ी चट चट चाल ॥ २ ॥
सुरति गगन घन छाई, पिया परे परे ख्याल।
तुलसी तरक तत तारी, भारी काटी भ्रम जाल ॥ ३ ॥
अर्थ-हे सखी! इन वृक्षों के ऊपर एक सरोवर है-जहाँ काल भी हिलडुल नहीं सकता। इस वृक्ष
की न जड़ है, न पत्ता है-उसकी झुकी-झुकी डालियाँ हैं ॥ १ ॥
इसी सरोवर में मैंने सुरति को स्नान कराया, इसने इस काग शरीर को हंस बना दिया। संतों के इस
मार्ग पर मैंने पति आत्मब्रह्म को प्राप्त कर लिया-मेरे गुरु कितने दयावान् हो गए ॥ २ ॥
आठवीं अटारी पर मेरी आत्मा का समाचार सुनो। उसमें जाने पर बंक नाल हर्षित हो उठा और
आत्मा आगे चटाचट चाल से चढ़ती गई ॥ ३ ॥
सुरति में शून्याकाश की गहन छाया छा गई और मेरे पति (आत्म ब्रह्म) उसी में अनुरक्त है। तुलसी
साहब कहते हैं कि तत्काल ही उस परम तत्त्व ने उनके भारी भ्रमजाल को काटकर मुझे मुक्त कर
दिया ॥ ४ ॥
१. झुकी हुई।