घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ / घट रामायण
सुरति ज्ञान से जिन-जिन पर्वतों से साक्षात्कार किया-उन्होंने सोलह आकाशों के विषय में बता दिया
है। जो इस सोलह आकाश का वर्णन करता है, वही सज्जन है, वही सच्चा साधु है॥
मैं सोलह आकाशों का वर्णन भिन्न-भिन्न रूपों में कर रहा हूँ। गगन (आकाश) का नाम देकर
एक भी न छोड़ूँगा। उनके विधि-विधि नामों को मैं समझाकर बताऊँगा। हे श्रोतागण! ध्यान देकर
आकाश की भाँति स्थिर चित्त से सुनो॥
॥ गगन के नाम। चौपाई॥
परथम गगन निसाधर मोषा। दूसर गगन पृथी पद पोषा॥
तीसर गगन बिरिछ सुर सोषा। चौथा गगन दिलंभी गोषा॥
पंचम गगन हिरा पद स्यामा। षष्टम गगन निरंजन नामा॥
सप्तम गगन पुलंधर चीन्हा। अष्टम गगन सफानल कीन्हा॥
कदलीकंद नवीं कर नामा। दसवीं गगन जमरस के ठामा॥
एकादस गगन हरि हिरदे नामा। द्वादस गगन अधर परमाना॥
तेरा गगन कलंगी रूपा। चौधा गगन है धुंध सरूपा॥
पद्रा गगन मुक्ति कर नामा। सोला गगन गुप्त निज धामा १ ॥
इतने गगन काया के माईं। सज्जन साध खोज कोइ पाई॥
सोला का कोई भेद बतावै। सोइ सोइ गगन गिरा गति गावै॥
तुलसी निरखि कहा निज लेखा। बूझि साध कोइ करै बिबेका॥
घट भीतर सब गगन बताया। भिनि भिनि नाम गगन गति गाया॥
इतने की कोइ जानै साधा। सो नहिं परै काल के फंदा॥
आगे भेद जो कहौं अनूपा। भँवर गुफा में जोति सरूपा॥
भँवर गुफा छै भाखि सुनाऊँ। जाकौ भिनि भिनि भेद बताऊँ॥
अर्थ-आकाश का प्रथम नाम निशाकर कहा गया है-दूसरा आकाश पृथ्वीपद बताया गया है।
तीसरा आकाश देववृक्ष सोषता है और चौथा गगन दिलंभी है-जो आकाश को प्रतिबिम्बित करता है॥
पंचम आकाश श्यामवर्ण का हीरापद है और छठें आकाश का निरंजन नाम है। सातवें आकाश को
'पुलंधर' के रूप में पहचाना है और आठवें आकाश का नाम सफानल है॥
नवें का नाम कंदली कंद है और दसवाँ गगन 'जमरस' के पास है। एकादश गगन का हृदय नाम है
और द्वादश आकाश अधर है। तेरहवाँ आकाश 'तेलंगी' रूप है-चौदहवाँ आकाश धुंध की भाँति है॥
पन्द्रहवाँ आकाश मुक्ति के नाम का है-सोलहवें गगन का धाम गुप्त है। इतने आकाश शरीर के
मध्य हैं। विरले सज्जन तथा साधु इसे खोज पाते हैं। जो आकाश में स्थित नाद की ध्वनि का गान करता
है, वही कोई विरला ही सोलह आकाश का भेद बता सकता है॥
तुलसी साहब ने उन्हें भलीभाँति देखकर अपना लेखा कहा है-कोई साधुजन ही इसको समझ कर
इसका विवेक कर सकता है। इसी घट के भीतर समस्त आकाश को बताया गया है। गगन की गति के
अनुसार साधुजनों ने उसका भिन्न-भिन्न नाम बताया है॥
१. मु० दे० प्र० की पुस्तक में कड़ी ८ में 'गुप्त निज' की जगह 'मुक्ति कर' छपा है (जो कि ठीक नहीं हो
सकता क्योंकि वहीं नाम पंद्रहवें गगन का है)।